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दस दिनों तक खामोश रहेंगे हथियार- इज़रायल-लेबनान संघर्ष थमा लेकिन खतरा बरकरार

दस दिनों तक खामोश रहेंगे हथियार- इज़रायल-लेबनान संघर्ष थमा लेकिन खतरा बरकरार
नवजोत कौर सिद्धू
On: अप्रैल 17, 2026 3:21 अपराह्न
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बीते करीब डेढ़ महीने से बारूद की गंध में जी रहे मध्य पूर्व के लिए एक राहत भरी खबर आई है। इज़रायल और लेबनान के बीच फिलहाल 10 दिनों के युद्धविराम पर मुहर लग गई है। खुद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस समझौते का ऐलान किया। गुरुवार रात से जैसे ही यह सीजफायर लागू हुआ, उन मासूमों ने एक लंबी और गहरी सांस ली, जो हफ्तों से मलबे के ढेर और सायरन की चीखों के बीच सो नहीं पा रहे थे।

खूनी मंजर जिसने दिल को हिला दिया

इस तबाही की पटकथा इसी साल 2 मार्च को लिखी गई थी। जब अमेरिका और इज़रायल ने ईरान पर हमला बोला, तो उसके ठीक दो दिन बाद लेबनान के हिज़्बुल्लाह ने जवाबी कार्रवाई के नाम पर उत्तरी इज़रायल को रॉकेटों से पाट दिया। हिज़्बुल्लाह का कहना था कि ये उनके रहनुमा अली खामेनेई की हत्या का हिसाब बराबर करना है।लेकिन इस रसूख और इंतकाम की लड़ाई में पिस गया वो आम आदमी, जिसका इस राजनीति से कोई लेना-देना नहीं था। लेबनान की धरती आज अपनों के खून से लाल है। 

रिपोर्टों की मानें तो 2,000 से ज्यादा लोग इस आग में भस्म हो चुके हैं। इनमें वो मासूम बच्चे भी थे जिनके हाथ में खिलौने होने चाहिए थे, पर आज वहां सिर्फ सफेद कफन और सन्नाटा है। करीब 10 लाख लोग अपने ही वतन में दर-बदर हो गए हैं। 

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इज़रायली शर्तें और हिज़्बुल्लाह का अड़ियल रुख

शांति की राह में सबसे बड़ा रोड़ा हमेशा ‘अहंकार’ और ‘शर्तें’ होती हैं। इज़रायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने सीजफायर को मंज़ूरी तो दे दी, मगर उनके लहजे में नरमी रत्ती भर भी नहीं है। उन्होंने दो टूक कह दिया है कि उनकी सेना दक्षिणी लेबनान के उन मोर्चों से टस से मस नहीं होगी जहाँ उसने अपने पैर जमा लिए हैं। इज़रायल इसे अपनी सुरक्षा की ‘लक्ष्मण रेखा’ बता रहा है।

दूसरी तरफ हिज़्बुल्लाह के खेमे में इस बात को लेकर भारी उबाल है। उनका तर्क है कि जब तक इज़रायली बूट्स लेबनान की मिट्टी को रौंद रहे हैं, तब तक ये शांति महज एक छलावा है। संगठन का साफ कहना है कि असली सीजफायर तब होगा जब इज़रायल अपनी फौज वापस बुलाएगा और हवाई हमले पूरी तरह बंद करेगा। यानी, समझौते पर दस्तखत भले हो गए हों, लेकिन दोनों तरफ नफरत की आग अब भी धधक रही है।

डोनाल्ड ट्रंप की कूटनीति और व्हाइट हाउस का न्योता

इस पूरी बिसात पर डोनाल्ड ट्रंप खुद को एक ‘मसीहा’ की तरह पेश कर रहे हैं। उन्होंने न केवल इस जंग को 10 दिन के लिए रुकवाया, बल्कि एक ऐसी चाल चली है जो दशकों बाद देखने को मिल रही है। ट्रंप ने इज़रायली पीएम और लेबनान के राष्ट्रपति जोसेफ औन को सीधे व्हाइट हाउस आने का न्योता दे दिया है।अगर ये दोनों नेता वाकई एक मेज पर बैठते हैं, तो ये साल 1983 के बाद की सबसे बड़ी कूटनीतिक हलचल होगी। लेकिन पर्दे के पीछे की कहानी कुछ और ही है। चर्चा है कि अमेरिका इस बहाने ईरान के साथ अपनी ‘परमाणु डील’ को लेकर भी कोई खिचड़ी पका रहा है। क्या ट्रंप वाकई इस इलाके में परमानेंट शांति चाहते हैं, या ये उनके अगले चुनाव या वैश्विक छवि चमकाने का कोई स्टंट है? 

ज़मीनी हकीकत: मलबे के बीच तलाशती ज़िंदगी

नेताओं के समझौते अपनी जगह हैं, लेकिन ज़मीन पर मंजर आज भी रूह कंपा देने वाला है। सीजफायर लागू होने से ठीक पहले इज़रायल ने अपना सबसे क्रूर दांव खेला और दक्षिणी लेबनान को जोड़ने वाले आखिरी महत्वपूर्ण पुल को तबाह कर दिया। इसका नतीजा ये हुआ कि वहां फंसी घायल और भूखी जनता तक मदद पहुंचने के सारे रास्ते बंद हो गए।

आज जब कुछ लोग अपनी उजड़ी हुई दुनिया देखने वापस लौट रहे हैं, तो वहां उन्हें सिर्फ राख और धुआं मिल रहा है। कोई मलबे में अपने बच्चों की किताबें ढूंढ रहा है, तो कोई अपने बुजुर्गों की आखिरी निशानी। उनके लिए ये 10 दिन का सुकून भी एक सजा जैसा है, क्योंकि उनके पास अब सिर छिपाने के लिए छत भी नहीं बची।

क्या वाकई दोबारा नहीं बरसेंगे बम?

इतिहास गवाह है कि मध्य पूर्व के इस हिस्से में युद्धविराम अक्सर ‘पानी के बुलबुले’ की तरह साबित हुए हैं। पहले भी कई बार संयुक्त राष्ट्र और अन्य देशों की मध्यस्थता से गोलियां चलना बंद हुईं, लेकिन वे समझौते कभी स्थायी नहीं हो पाए। 

समस्या की जड़ें बहुत गहरी हैं। सबसे बड़ा सवाल हिज़्बुल्लाह के हथियारों और इज़रायल की सुरक्षा चिंताओं का है।जब तक इन बुनियादी मसलों का कोई ठोस हल नहीं निकलता, तब तक हर युद्धविराम केवल एक ‘सांस लेने की जगह’ बनकर रह जाएगा। 

क्या हिज़्बुल्लाह पीछे हटेगा? क्या इज़रायल अपनी सेना वापस बुलाएगा? और सबसे महत्वपूर्ण बात, क्या ईरान इस क्षेत्र में अपनी भूमिका को सीमित करेगा? ये ऐसे सवाल हैं जिनके जवाब फिलहाल किसी के पास नहीं।

हालांकि यह संघर्षविराम फिलहाल राहत लेकर आया है, लेकिन कई बड़े सवाल अब भी अनसुलझे हैं—खासकर हिज़्बुल्लाह के हथियारों का भविष्य और इज़रायली सेना की मौजूदगी।इज़रायल और लेबनान के    बीच स्थायी शांति के लिए अभी लंबा रास्ता तय करना बाकी है। आने वाले दिनों में होने वाली कूटनीतिक बातचीत यह तय करेगी कि यह संघर्ष खत्म होगा या फिर एक बार फिर हिंसा का दौर शुरू होगा।

Dr Pankaj Sharma

fitness coach and writer mainly work on sports, fitness, Religious, foreign news, and technology

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