व्यापारभारतविदेशी समाचारखेलजीवन शैलीराजनीतिधर्मभौगोलिकसेलिब्रेटीज़शिक्षास्वास्थ्य

जानिए  चैत्र नवरात्रि में अष्टमी और नवमी की पूजा का क्या होता है महत्व 

जानिए  चैत्र नवरात्रि में अष्टमी और नवमी की पूजा का क्या होता है महत्व 
नवजोत कौर सिद्धू
On: मार्च 25, 2026 9:52 अपराह्न
Follow Us:

चैत्र नवरात्रि के पावन पर्व में अष्टमी (महाअष्टमी) और नवमी (महानवमी) का स्थान सबसे महत्वपूर्ण माना गया है। ये दो दिन देवी शक्ति की उपासना की पराकाष्ठा हैं। 

​चैत्र नवरात्रि –  अष्टमी और नवमी पूजन का आध्यात्मिक एवं शास्त्रीय महत्व

​चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से शुरू होने वाले इस पर्व का समापन कन्या पूजन और हवन के साथ इन्हीं दो तिथियों पर होता है। अष्टमी को ‘महाअष्टमी’ और नवमी को ‘राम नवमी’ के रूप में भी मनाया जाता है।

​महाअष्टमी (दुर्गा अष्टमी) का महत्व

​अष्टमी तिथि माँ दुर्गा के आठवें स्वरूप ‘माँ महागौरी’ को समर्पित है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार इसी दिन माँ ने चंड-मुंड नामक असुरों का संहार किया था।

  • संधि पूजा का महत्व –  अष्टमी के समाप्त होने और नवमी के शुरू होने के बीच के अंतिम 24 मिनट और शुरुआती 24 मिनट (कुल 48 मिनट) को ‘संधि काल’ कहा जाता है। इस समय देवी ‘चामुंडा’ का पूजन होता है। माना जाता है कि इसी समय माँ ने महिषासुर पर अंतिम प्रहार किया था।
  • महागौरी का स्वरूप –  इनका वर्ण पूर्णतः गौर है। ये श्वेत वस्त्र और बैल की सवारी करती हैं। इनकी उपासना से भक्तों के समस्त पाप धुल जाते हैं और अक्षय पुण्यों की प्राप्ति होती है।

​ महानवमी (सिद्धिदात्री पूजन) का महत्व

​नवमी तिथि नवरात्रि का अंतिम दिन होता है जो माँ के नौवें स्वरूप ‘माँ सिद्धिदात्री’ को समर्पित है।

  • सिद्धियों की प्राप्ति –  जैसा कि नाम से स्पष्ट है, माँ सिद्धिदात्री सभी प्रकार की सिद्धियाँ (अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व और वशित्व) प्रदान करने वाली हैं।
  • भगवान शिव का आधा शरीर –  मार्कण्डेय पुराण के अनुसार स्वयं भगवान शिव ने भी माँ सिद्धिदात्री की तपस्या करके ही समस्त सिद्धियाँ प्राप्त की थीं जिसके फलस्वरूप उनका आधा शरीर देवी का हुआ और वे ‘अर्धनारीश्वर’ कहलाए।
  • राम नवमी का संयोग –  चैत्र नवमी को ही मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम का जन्म हुआ था इसलिए यह दिन शक्ति और शील के संगम का प्रतीक बन जाता है।

read more :

​ कन्या पूजन –  एक अनिवार्य अनुष्ठान

​अष्टमी और नवमी दोनों ही दिनों में कन्या पूजन (कंजक) का विधान है। शास्त्रों में 2 से 10 वर्ष तक की कन्याओं को देवी का साक्षात रूप माना गया है।

कन्या की आयुपूजा का नामफल
2 वर्षकुमारीदुख और दरिद्रता का नाश
3 वर्षत्रिमूर्तिसुख-समृद्धि की प्राप्ति
4 वर्षकल्याणीविद्या और विजय
7 वर्षचंडिकाऐश्वर्य की प्राप्ति
9 वर्षदुर्गाशत्रुओं पर विजय

पूजन विधि और हवन

​इन दिनों में व्रत का पारण करने से पहले हवन करना अनिवार्य है। हवन के माध्यम से हम नवग्रहों, समस्त देवी-देवताओं और माता रानी को आहुति प्रदान करते हैं।

  • हवन सामग्री –  कपूर, गूगल, लोबान, घी, पंचमेवा, और अक्षत।
  • मंत्र –  “ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे स्वाहा” का जाप करते हुए आहुति देना सर्वश्रेष्ठ माना जाता है।

​आध्यात्मिक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण

  • मानसिक शुद्धि –  नौ दिनों का संयम और इन अंतिम दो दिनों की विशेष पूजा साधक के भीतर सात्विक ऊर्जा का संचार करती है।
  • ऋतु परिवर्तन – चैत्र नवरात्रि वसंत और ग्रीष्म ऋतु के संधिकाल पर आती है। उपवास और पूजा पद्धति शरीर को बदलते मौसम के अनुकूल ढालने और रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में सहायक होती है।

​अष्टमी और नवमी की विशेष कथा

​प्राचीन काल में रुरु नामक दैत्य का पुत्र महिषासुर ने स्वर्ग पर अधिकार कर लिया था। तब ब्रह्मा, विष्णु और महेश के तेज से माँ दुर्गा प्रकट हुईं। अष्टमी के दिन ही माँ ने अपनी शक्ति को पूर्ण रूप दिया था और नवमी तक आते-आते अधर्म का पूर्ण विनाश सुनिश्चित हुआ। इसलिए इन तिथियों को ‘विजय’ का प्रतीक माना जाता है।

​चैत्र नवरात्रि की अष्टमी और नवमी केवल धार्मिक कर्मकांड नहीं हैं, बल्कि यह स्वयं के भीतर की बुराइयों को समाप्त कर चेतना को जागृत करने का अवसर है। महाअष्टमी हमें पवित्रता (महागौरी) की ओर ले जाती है तो महानवमी हमें पूर्णता (सिद्धिदात्री) की प्राप्ति कराती है।

सावधानी – पूजा के दौरान सात्विकता बनाए रखें क्रोध का त्याग करें और ‘नारी शक्ति’ का सम्मान करें क्योंकि माँ उसी घर में वास करती हैं जहाँ कन्याओं और महिलाओं का आदर होता है।

Pradeep Pandey

A versatile writer mainly works on politics, business, crime, current affairs and entertainment

Join WhatsApp

Join Now

Join Telegram

Join Now

Leave a Comment