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नवरात्रि में जवारे (जौ) का धार्मिक आध्यात्मिक और वैज्ञानिक महत्व क्यों है यह खास

नवरात्रि में जवारे (जौ) का धार्मिक आध्यात्मिक और वैज्ञानिक महत्व क्यों है यह खास
नवजोत कौर सिद्धू
On: मार्च 24, 2026 2:00 अपराह्न
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​हिंदू धर्म में चैत्र और शारदीय नवरात्रि का विशेष महत्व है। शक्ति की उपासना के इन नौ दिनों में मां दुर्गा के नौ रूपों की पूजा की जाती है। नवरात्रि की शुरुआत ‘कलश स्थापना’ (घटस्थापना) से होती है और इसी स्थापना के साथ एक अत्यंत महत्वपूर्ण परंपरा जुड़ी है जवारे बोना

जवारे जिन्हें ‘जौ’ (Barley) भी कहा जाता है  नवरात्रि के दौरान मिट्टी के पात्र में बोए जाते हैं। नौ दिनों तक इनकी विशेष सेवा और पूजा की जाती है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि मिट्टी के एक छोटे से बर्तन में उगने वाली ये कोमल हरी घास इतनी महत्वपूर्ण क्यों है? क्यों इसे “सृष्टि की पहली फसल” कहा जाता है?

​जवारे का धार्मिक और पौराणिक आधार

​हिंदू धर्म ग्रंथों और पुराणों के अनुसार जब ब्रह्मा जी ने इस सृष्टि की रचना की थी तब वनस्पतियों में सबसे पहले जौ (Barley) की उत्पत्ति हुई थी। यही कारण है कि किसी भी हवन, यज्ञ या पूजा-पाठ में जौ का प्रयोग अनिवार्य माना जाता है।

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​ब्रह्मा की पहली रचना

​धार्मिक मान्यताओं के अनुसार जौ को पूर्ण अन्न माना गया है। नवरात्रि के समय जवारे बोने का अर्थ है कि हम सृष्टि की पहली फसल के रूप में भगवान की रचना का सम्मान कर रहे हैं। इसे ‘सर्वोषधि’ भी कहा जाता है।

​अन्नपूर्णा का स्वरूप

​देवी दुर्गा को ‘अन्नपूर्णा’ भी कहा जाता है जो संसार के समस्त जीवों को भोजन प्रदान करती हैं। जवारे बोना इस बात का प्रतीक है कि हम आने वाले समय में धन-धान्य और खुशहाली की कामना कर रहे हैं। जवारे जितने अच्छे और हरे-भरे उगते हैं माना जाता है कि माता रानी की कृपा उतनी ही अधिक बरस रही है।

​जवारे बोने की विधि और परंपरा

​जवारे बोना केवल एक प्रक्रिया नहीं बल्कि एक अनुष्ठान है। इसे पूरी पवित्रता के साथ किया जाता है:

  • पात्र का चयन: मिट्टी का एक चौड़ा और उथला पात्र लिया जाता है, जिसे ‘वेदी’ या ‘खेती’ कहा जाता है।
  • पवित्र मिट्टी: गंगा जल छिड़ककर मिट्टी को शुद्ध किया जाता है।
  • जौ का रोपण: मिट्टी में जौ के दानों को समान रूप से फैलाया जाता है।
  • नियमित पूजन: प्रतिदिन जवारे को जल अर्पित किया जाता है और दीपक जलाकर उनकी आरती की जाती है।
  • विसर्जन: नवमी या दशमी के दिन इन जवारों को किसी पवित्र नदी या जलाशय में विसर्जित कर दिया जाता है, या कुछ लोग इन्हें प्रसाद के रूप में अपने पास रखते हैं।

​ जवारे के रंगों और विकास का ज्योतिषीय फल

​नवरात्रि के नौ दिनों में जवारे किस तरह उग रहे हैं उनका रंग कैसा है और उनकी ऊंचाई कितनी है इन संकेतों से भविष्य की घटनाओं का पूर्वानुमान लगाया जाता है।

​जवारे के संकेतों का विश्लेषण

जवारे की स्थितिभविष्य का संकेत (मान्यता अनुसार)
तेजी से बढ़नाघर में सुख-समृद्धि और उन्नति का प्रतीक।
सफेद या सुनहरे रंग के जवारेअत्यंत शुभ। यह मनोकामना पूर्ति और सौभाग्य का संकेत है।
नीचे से पीले और ऊपर से हरेवर्ष की शुरुआत थोड़ी कठिन हो सकती है, लेकिन बाद में सब ठीक हो जाएगा।
ऊपर से पीले और नीचे से हरेयह समय के उतार-चढ़ाव को दर्शाता है।
जौ का न उगना या सूख जानायह भविष्य में आने वाली बाधाओं या स्वास्थ्य समस्याओं के प्रति सचेत करता है।

विशेष नोट –  यदि जवारे अच्छे नहीं उगे हैं तो घबराना नहीं चाहिए। देवी मां से अपनी भूल-चूक की क्षमा मांगनी चाहिए और ‘दुर्गा सप्तशती’ का पाठ करना चाहिए। श्रद्धा ही सर्वोपरि है।

जवारे का आध्यात्मिक महत्व –  जीवन का दर्शन

​जवारे हमें जीवन के गहरे पाठ सिखाते हैं। जिस तरह एक छोटा सा बीज मिट्टी के अंधेरे को चीरकर बाहर निकलता है और सूरज की रोशनी की ओर बढ़ता है उसी तरह मनुष्य को भी अपने अज्ञान के अंधकार को त्यागकर ज्ञान के प्रकाश की ओर बढ़ना चाहिए।

  • धैर्य की सीख –  जवारे रातों-रात नहीं उगते। उन्हें सींचना पड़ता है, उनकी देखभाल करनी पड़ती है। यह हमें सिखाता है कि भक्ति और सफलता दोनों के लिए धैर्य अनिवार्य है।
  • प्रकृति से जुड़ाव – आज के आधुनिक युग में हम मिट्टी और प्रकृति से दूर होते जा रहे हैं। नवरात्रि के जवारे हमें फिर से अपनी जड़ों (मिट्टी) से जोड़ते हैं।

​ वैज्ञानिक दृष्टिकोण –  जवारे (Wheatgrass/Barley Grass) के लाभ

​सिर्फ धार्मिक ही नहीं जवारे का वैज्ञानिक और औषधीय महत्व भी बेजोड़ है। आयुर्वेद में जवारे के रस को ‘हरा रक्त’ (Green Blood) कहा गया है।

​पोषक तत्वों का भंडार

​जवारे में विटामिन A, C, E, K और बी-कॉम्प्लेक्स प्रचुर मात्रा में होते हैं। इसके अलावा इसमें मैग्नीशियम, कैल्शियम, आयरन और अमीनो एसिड भी पाए जाते हैं।

​क्लोरोफिल की शक्ति

​जवारे में क्लोरोफिल की मात्रा बहुत अधिक होती है जो हमारे रक्त में हीमोग्लोबिन की संरचना से काफी मिलती-जुलती है। यह शरीर को डिटॉक्स (विषमुक्त) करने में मदद करता है।

​स्वास्थ्य लाभ

  • रोग प्रतिरोधक क्षमता –  यह इम्यून सिस्टम को मजबूत बनाता है।
  • पाचन में सहायक –  यह मेटाबॉलिज्म को सुधारता है और कब्ज जैसी समस्याओं को दूर करता है।
  • रक्त शुद्धि –  जवारे का रस पीने से खून साफ होता है और एनीमिया की शिकायत दूर होती है।
  • कैंसर से बचाव –  शोध बताते हैं कि इसमें मौजूद एंटीऑक्सीडेंट्स कैंसर कोशिकाओं से लड़ने में सहायक हो सकते हैं।

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​जवारे और पर्यावरण का संबंध

​नवरात्रि साल में दो बार आती है एक ऋतु परिवर्तन के समय (वसंत और शरद)। इन दोनों ही समय में जवारे बोना हमारे पर्यावरण के प्रति प्रेम को दर्शाता है। यह एक संदेश है कि धरती माता हमें सब कुछ देती हैं और हमारा कर्तव्य है कि हम हरियाली का संरक्षण करें।

​अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

प्रश्न –  जवारे को सीधे धूप में रखना चाहिए या छाया में?

उत्तर – जवारे को बहुत तेज धूप से बचाना चाहिए। इन्हें मंदिर के पास या किसी ऐसे स्थान पर रखें जहाँ पर्याप्त रोशनी हो लेकिन सीधी चुभती हुई धूप न हो।

प्रश्न –  क्या जवारे के रस का सेवन हर कोई कर सकता है?

उत्तर – सामान्यतः हाँ लेकिन यदि किसी को विशेष एलर्जी है या कोई गंभीर बीमारी है तो आयुर्वेद चिकित्सक की सलाह लेना बेहतर है।

प्रश्न –  जवारे के खराब होने पर क्या करें?

उत्तर – यदि किसी कारणवश जवारे सूख जाएं  तो उन्हें अनादर के साथ न फेंकें। उन्हें विसर्जित कर दें और मां से प्रार्थना करें।

नवरात्रि में जवारे बोना मात्र एक कर्मकांड नहीं है बल्कि यह हमारे अस्तित्व, हमारी संस्कृति और प्रकृति के बीच के अटूट बंधन का उत्सव है। यह हमें सिखाता है कि खुशहाली के लिए मेहनत (बीज बोना), धैर्य (इंतजार करना) और भक्ति (पूजा करना) तीनों की आवश्यकता होती है।

Dr Pankaj Sharma

fitness coach and writer mainly work on sports, fitness, Religious, foreign news, and technology

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