पश्चिम अफ्रीकी राष्ट्र Guinea-Bissau में 26 नवम्बर 2025 को अचानक हुए तख्तापलट (coup d’état) ने पूरे देश की राजनीतिक कारगुजारियों को झकझोर दिया है। चुनाव की मतगणना से पहले सेना ने सत्ता अपने हाथ में ले ली, निर्वाचित राष्ट्रपति Umaro Sissoco Embaló और कई वरिष्ठ अधिकारियों को हिरासत में लिया गया। अगले ही दिन सेना के एक वरिष्ठ जनरल Horta Inta‑A Na Man को संक्रमणकालीन राष्ट्रपति (transitional president) घोषित किया गया है, और देश की लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर गंभीर संकट मंडरा रहा है।

इस लेख में मैं आपको विस्तार से बताऊँगा — क्या हुआ, क्यों हुआ, इसका असर क्या हो सकता है, और अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया कैसी रही है।
क्या हुआ — सेना ने कैसे कूदा सत्ता पर
- रविवार को राष्ट्रपति चुनाव हुआ था, लेकिन मतगणना पूरी होने से पहले ही दोनों मुख्य प्रत्याशियों — Embaló और उनके प्रतिद्वंद्वी — ने जीत का दावा कर दिया था।
- 26 नवम्बर की सुबह राजधानी से सटे सरकारी इलाकों में गोलीबारी की आवाजें होने लगीं। तुरंत बाद सेना ने टीवी पर घोषणा की कि उन्होंने “कुल नियंत्रण” (total control) हासिल कर लिया है, चुनाव प्रक्रिया स्थगित कर दी गई है, सीमाएँ बंद कर दी गई हैं और कर्फ्यू लागू कर दिया गया है।
- सेना ने खुद को “High Military Command for the Restoration of Order” नाम दिया और कहा कि देश की स्थिरता और सुरक्षा बनाए रखना उनका मकसद है।
- अगले दिन, 27 नवम्बर 2025 को, जनरल Horta Inta-A Na Man को संक्रमणकालीन राष्ट्रपति के रूप में शपथ दिलाई गई, और उन्होंने कहा कि ये सत्ता कम-से-कम एक साल के लिए होगी। सेना का तर्क — क्यों किया गया तख्तापलट
सेना का कहना है कि चुनाव प्रक्रिया “पूरी तरह से अस्थिर और गड़बड़” हो चुकी थी। उनपर आरोप था कि चुनाव परिणाम गड़बड़ाए जा रहे थे, राजनीतिक दल, ड्रग तस्करों और अन्य दलों द्वारा देश की लोकतांत्रिक प्रक्रिया को प्रभावित करने की कोशिश की जा रही थी। इसलिए देश की स्थिरता और सुरक्षा की खातिर सेना को हस्तक्षेप करना पड़ा। वे यह भी कहते हैं कि नागरिक हिंसा, सत्ता संघर्ष, और आपसी कलह देश को और गहराई में धकेल सकते थे, इसलिए अस्थायी सैन्य शासन ज़रूरी था।

Guinea-Bissau की झलक: अस्थिरता की लम्बी कहानी
Guinea-Bissau — 1974 में पुर्तगाल से स्वतंत्र हुआ — लोकतांत्रिक संस्थानों की बहुत नाज़ुकता, राजनीतिक अस्थिरता, ड्रग तस्करी और आर्थिक चुनौतियों का सामना करता रहा है। 2025 का यह तख्तापलट इस देश के इतिहास में अब तक का नवीनतम है — लेकिन पहले भी कई बार सैन्य हस्तक्षेप हुआ है। ऐसे में यह नया तख्तापलट, देश के लोकतंत्र और स्थिरता दोनों के लिए गंभीर चेतावनी है।
अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया और क्षेत्रीय दृष्टिकोण
- क्षेत्रीय संगठन ECOWAS और African Union (AU) ने मिलकर एक संयुक्त बयान जारी कर इस तख्तापलट की निंदा की है। उन्होंने सैन्य शासन को असंवैधानिक बताया है और तुरंत संवैधानिक शासन की वापसी की मांग की है।
- कई अफ्रीकी देशों — जैसे Ghana — ने खुल कर बयान दिया है कि यह कदम लोकतंत्र और मतदाताओं की इच्छा के खिलाफ है, और उन्होंने Guinea-Bissau में जल्द से जल्द चुनाव कराने की अपील की है।
- मीडिया एवं मानवाधिकार समूहों ने कहा है कि मीडिया पर लगाए गए प्रतिबंध, सूचना पर रोक और पत्रकारों की आवाज़ दबाने जैसी कार्रवाइयाँ लोकतांत्रिक शासन, अभिव्यक्ति अधिकार और पारदर्शिता के लिए खतरा हैं। इस कदम का असर क्या हो सकता है — चुनौतियाँ और संभावनाएँ
लोकतंत्र की धज्जियाँ
मानवाधिकार और लोकतांत्रिक संस्थान कमजोर हो सकते हैं। लंबे समय तक सैन्य शासन से नागरिकों की आवाज़ दब सकती है, और चुनिंदा नेतृत्व के हाथों शक्ति केंद्रीकृत हो सकती है।
स्थिरता या अधीरता?
सेना यदि वादा निभाए — सुरक्षा, अपराध नियंत्रण, भ्रष्टाचार से लड़ने, न्याय व्यवस्था सुधारने — तो देश में थोड़ी स्थिरता आ सकती है। लेकिन एक छोटे देश के होने के कारण, गलत दिशा में सैन्य शासन अर्थव्यवस्था, नागरिक स्वतंत्रता, और अंतरराष्ट्रीय छवि को नुकसान पहुँचा सकता है।
ड्रग तस्करी व अशांति
Guinea-Bissau पहले से ही ‘narco-state’ कहे जाने वाले अफ्रीकी देशों में था। सैन्य कब्ज़ा ड्रग तस्करी, अवैध व्यापार और अपराध पर लगाम लगाये या उसे और अधिक गहरा कर सकता है।
आंतर्राष्ट्रीय संघर्ष व प्रतिबंध
ECOWAS और AU के कदम, अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध, या Guinea-Bissau का राजनीतिक और आर्थिक बहिष्कार देश को आगे चल कर जटिल स्थिति में ला सकता है।

निष्कर्ष — एक बार फिर लोकतंत्र पर उठे सवाल
Guinea-Bissau में हुए तख्तापलट ने दिखाया है कि लोकतंत्र, आज़ादी और नागरिक अधिकार — अफ्रीका के कई हिस्सों में — कितने नाज़ुक हो सकते हैं।
जहाँ एक ओर सैन्य शासन देश को स्थिरता दिलाने की दलील देता है, वहीं दूसरी ओर वह लोकतांत्रिक मूल्यों, पारदर्शिता और नागरिक स्वतंत्रता को खतरे में डाल सकता है।
अंतरराष्ट्रीय समुदाय, क्षेत्रीय संगठन और स्थानीय जनता — सभी के लिए यह समय है — शांतिपूर्ण संवाद, संवैधानिक बहाली और लोकतांत्रिक प्रक्रिया की रक्षा सुनिश्चित करने का।






