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ऊर्जा सुरक्षा- यूरोप जाने से पहले यूएई की यात्रा करेंगे पीएम मोदी तेल आपूर्ति पर सरकार की नजर

ऊर्जा सुरक्षा- यूरोप जाने से पहले यूएई की यात्रा करेंगे पीएम मोदी तेल आपूर्ति पर सरकार की नजर
नवजोत कौर सिद्धू
On: मई 10, 2026 12:01 अपराह्न
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नई दिल्ली। भारत सरकार ने पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच देश की ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए कड़वे कदम उठाने शुरू कर दिए हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने पूर्व निर्धारित यूरोप दौरे पर जाने से ठीक पहले संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) की यात्रा करेंगे। पीएम मोदी 15 मई को अबू धाबी पहुंचेंगे। वहां वे यूएई के राष्ट्रपति शेख मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान के साथ द्विपक्षीय वार्ता करेंगे। इस संक्षिप्त दौरे के तुरंत बाद वे नीदरलैंड, स्वीडन, नॉर्वे और इटली की यात्रा पर रवाना हो जाएंगे।प्रधानमंत्री का यह अचानक तय हुआ यूएई दौरा काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इसका सबसे बड़ा कारण खाड़ी क्षेत्र में बढ़ती अस्थिरता और कच्चा तेल (क्रूड ऑयल) की सप्लाई को लेकर पैदा हुई चिंताएं हैं। 

तेल आपूर्ति और समुद्री मार्गों की सुरक्षा

पिछले कुछ हफ्तों से पश्चिम एशिया के देशों के बीच आपसी विवाद और सैन्य हलचल बढ़ गई है। विशेष रूप से ईरान और उसके पड़ोसी देशों के बीच बढ़ते तनाव ने समुद्री व्यापार मार्गों पर खतरा पैदा कर दिया है। ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ के आसपास की स्थिति पर भारत की पैनी नजर है। यह रास्ता दुनिया भर में तेल की सप्लाई के लिए सबसे संवेदनशील और महत्वपूर्ण मार्ग है।भारत के नीति निर्माताओं को डर है कि यदि इस क्षेत्र में संघर्ष बढ़ता है, तो कच्चे तेल की कीमतों में भारी उछाल आ सकता है। कच्चे तेल के दाम बढ़ने का सीधा असर भारत की घरेलू अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। सरकार चाहती है कि ऐसी किसी भी स्थिति से निपटने के लिए पहले से ही वैकल्पिक इंतजाम और सहयोगियों के साथ पुख्ता बातचीत कर ली जाए।

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यूएई के साथ रणनीतिक संबंध

संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) भारत का केवल एक व्यापारिक भागीदार ही नहीं है, बल्कि वह एक प्रमुख रणनीतिक सहयोगी भी है। पिछले एक दशक में भारत और यूएई के बीच भरोसे का रिश्ता बहुत मजबूत हुआ है। यूएई भारत को तेल की निर्बाध आपूर्ति करने वाले प्रमुख देशों में से एक है। प्रधानमंत्री मोदी की इस यात्रा का मुख्य उद्देश्य यूएई के नेतृत्व से यह आश्वासन लेना है कि क्षेत्रीय तनाव के बावजूद भारत को होने वाली तेल और गैस की सप्लाई पर कोई आंच नहीं आएगी।इसके अलावा, यूएई में करीब 35 लाख भारतीय रहते हैं। वे वहां की अर्थव्यवस्था में बड़ा योगदान देते हैं और हर साल भारत को भारी मात्रा में विदेशी मुद्रा (रेमिटेंस) भेजते हैं। पश्चिम एशिया में किसी भी तरह की अशांति का सीधा असर इन भारतीयों की सुरक्षा और उनकी नौकरियों पर पड़ सकता है। प्रधानमंत्री अपनी बातचीत में भारतीय नागरिकों के हितों और उनकी सुरक्षा का मुद्दा भी उठा सकते हैं।

कूटनीतिक सक्रियता और एनएसए की भूमिका

प्रधानमंत्री की इस यात्रा की पृष्ठभूमि पहले ही तैयार की जा चुकी थी। हाल ही में भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल ने यूएई और सऊदी अरब का गुप्त दौरा किया था। डोभाल ने वहां के सुरक्षा अधिकारियों और राजनीतिक नेतृत्व के साथ लंबी चर्चा की थी। माना जा रहा है कि डोभाल की उस यात्रा के दौरान ही यह महसूस किया गया कि स्थिति की गंभीरता को देखते हुए प्रधानमंत्री स्तर की बातचीत जरूरी है।भारत इस समय ‘संतुलन की कूटनीति’ पर चल रहा है। भारत के रिश्ते इजरायल, यूएई और सऊदी अरब से जितने अच्छे हैं, उतने ही पुराने संबंध ईरान के साथ भी हैं। भारत का प्रयास है कि वह इस क्षेत्र में शांति बनाए रखने के लिए अपने प्रभाव का इस्तेमाल करे। सरकार के सूत्रों का कहना है कि उच्च स्तरीय बैठकों में तेल के रणनीतिक भंडार  को भरने और वैकल्पिक आपूर्ति लाइनों पर भी विचार किया गया है।

यूरोप दौरा और ग्लोबल एजेंडा

यूएई की अपनी यात्रा पूरी करने के बाद पीएम मोदी चार यूरोपीय देशों—नीदरलैंड, स्वीडन, नॉर्वे और इटली—के दौरे पर जाएंगे। यूरोप के इन देशों के साथ भारत के संबंध मुख्य रूप से तकनीक, हरित ऊर्जा और रक्षा क्षेत्र में केंद्रित हैं। यूरोप इस समय खुद ऊर्जा संकट से जूझ रहा है और वह भारत के साथ मिलकर अक्षय ऊर्जा के क्षेत्र में निवेश बढ़ाना चाहता है।लेकिन राजनीतिक जानकारों का कहना है कि प्रधानमंत्री के पूरे विदेश दौरे में सबसे ज्यादा ध्यान यूएई पर ही रहेगा। इसका कारण यह है कि यूरोप से मिलने वाली तकनीक लंबी अवधि का निवेश है, जबकि यूएई से मिलने वाला तेल हमारी तात्कालिक जरूरत है।

सक्रिय विदेश नीति का संदेश

 भारत की मौजूदा विदेश नीति बहुत व्यावहारिक हो गई है। भारत अब केवल घटनाओं के घटने का इंतजार नहीं करता, बल्कि संकट आने से पहले ही अपनी सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए सक्रिय कदम उठाता है। प्रधानमंत्री का यह दौरा दुनिया को यह संदेश भी देता है कि भारत अपने आर्थिक हितों और ऊर्जा सुरक्षा के लिए किसी भी देश के साथ मजबूती से बातचीत करने में सक्षम है।आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि प्रधानमंत्री मोदी की इस यात्रा के बाद तेल बाजार में क्या स्थिरता आती है और खाड़ी देशों के साथ भारत के व्यापारिक समीकरण अब किस प्रकार बदलते हैं। फिलहाल, नई दिल्ली में तेल मंत्रालय और विदेश मंत्रालय मिलकर हर गतिविधि पर नजर रखे हुए हैं।

Dr Pankaj Sharma

fitness coach and writer mainly work on sports, fitness, Religious, foreign news, and technology

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