नई दिल्ली। पिछले कुछ समय से मिडिल ईस्ट के देशों में जो तनाव और युद्ध जैसे हालात बने हुए हैं, उसका असर अब भारत के आर्थिक मोर्चे पर साफ नजर आने लगा है। कहने को तो युद्ध भारत से हजारों मील दूर लड़ा जा रहा है, लेकिन इसकी आंच हमारी सरकारी तेल कंपनियों की तिजोरी तक पहुँच चुकी है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में लगातार उछाल आ रहा है, लेकिन देश के भीतर पेट्रोल और डीजल के दाम जस के तस बने हुए हैं। आम जनता को महंगाई से बचाने की यह कोशिश सरकारी तेल कंपनियों के लिए भारी मुसीबत बन गई है। ताजा आंकड़ों के अनुसार, इंडियन ऑयल, भारत पेट्रोलियम और हिंदुस्तान पेट्रोलियम जैसी कंपनियों को हर महीने करीब 30 हजार करोड़ रुपये का नुकसान उठाना पड़ रहा है,वर्तमान स्थिति को देखें तो आम आदमी के लिए यह राहत की खबर जरूर है कि वैश्विक उठापटक के बावजूद देश में पेट्रोल-डीजल के दाम नहीं बढ़े हैं। रसोई गैस के दाम भी स्थिर हैं। लेकिन इस राहत के पीछे की कहानी काफी चिंताजनक है। तेल कंपनियां इस समय अंतरराष्ट्रीय बाजार से काफी ऊंची कीमतों पर कच्चा तेल खरीद रही हैं, लेकिन उन्हें वह तेल साफ करके (रिफाइन करके) घरेलू बाजार में पुरानी और कम कीमतों पर बेचना पड़ रहा है। स्थिति यह है कि हर लीटर की बिक्री पर कंपनियों को अपनी जेब से पैसा लगाना पड़ रहा है।
क्यों लग रहा है घाटे का अंबार?
पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष की वजह से पूरी दुनिया की आपूर्ति व्यवस्था चरमरा गई है। भारत अपनी जरूरत का 80 प्रतिशत से ज्यादा कच्चा तेल विदेशों से मंगवाता है और इसमें एक बड़ा हिस्सा खाड़ी देशों से आता है। इस क्षेत्र में तनाव बढ़ने से समुद्री रास्तों पर खतरा बढ़ गया है। लाल सागर के रास्ते होने वाला व्यापार अब जोखिम भरा हो गया है। जहाजों को अब लंबे रास्ते से आना पड़ रहा है, जिससे माल ढुलाई का किराया और बीमा की लागत कई गुना बढ़ गई है। सप्लाई रुकने के डर से अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड की कीमतें काफी ऊपर चली गई हैं। भारत के लिए यह दोहरा झटका है। एक तो तेल महंगा मिल रहा है और दूसरा, उसे भारत तक लाने का खर्च भी बढ़ गया है। इसके बावजूद, सरकार की ओर से तेल कंपनियों को निर्देश हैं कि खुदरा कीमतों में फिलहाल कोई बदलाव न किए जाएं,केंद्र सरकार फिलहाल ईंधन कीमतों को लेकर बेहद सतर्क दिखाई दे रही है। सरकार नहीं चाहती कि पेट्रोल और डीजल महंगे होने से परिवहन खर्च बढ़े और उसका असर रोजमर्रा की वस्तुओं की कीमतों पर पड़े। यही कारण है कि सरकार ने अभी तक खुदरा ईंधन कीमतों में बदलाव नहीं किया है।
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कंपनियों के भीतर बढ़ती चिंता
तेल कंपनियों के बड़े अधिकारियों का कहना है कि वे सरकार के साथ लगातार संवाद कर रहे हैं। उनका तर्क है कि अगर अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें इसी तरह ऊंची बनी रहीं, तो भविष्य में परिचालन जारी रखना मुश्किल होगा। कंपनियां चाहती हैं कि या तो सरकार तेल पर लगने वाले टैक्स (एक्साइज ड्यूटी) में कटौती करे या फिर कीमतों को धीरे-धीरे बढ़ाने की अनुमति दे।हालांकि, वित्त मंत्रालय के लिए टैक्स कम करना भी आसान नहीं है, क्योंकि इससे सरकार की कमाई कम हो जाएगी और देश के विकास कार्यों के लिए बजट की कमी हो सकती है। यह एक ऐसी उलझन है जिसका समाधान निकालना सरकार के लिए टेढ़ी खीर साबित हो रहा है।
भविष्य की राह और चुनौतियां
आने वाले दिनों में पेट्रोल और डीजल के दाम क्या रहेंगे, यह पूरी तरह से पश्चिम एशिया के हालात पर निर्भर करेगा। अगर वहां युद्ध की स्थिति शांत होती है और तेल की सप्लाई सामान्य हो जाती है, तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें नीचे आएंगी। इससे तेल कंपनियों का घाटा खुद-ब-खुद कम हो जाएगा और जनता पर भी बोझ नहीं पड़ेगा।लेकिन अगर तनाव और बढ़ता है, तो सरकार को आज नहीं तो कल कड़े फैसले लेने ही होंगे। विशेषज्ञों का कहना है कि सरकार एक साथ बड़ी बढ़ोतरी करने के बजाय, भविष्य में कुछ पैसों की मामूली वृद्धि का रास्ता चुन सकती है। फिलहाल, देश की नजरें अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रम और सरकार के अगले कदम पर टिकी हैं।
पश्चिम एशिया का संकट केवल एक भौगोलिक विवाद नहीं रह गया है, बल्कि यह सीधे तौर पर भारत की आर्थिक सेहत को प्रभावित कर रहा है। तेल कंपनियों का बढ़ता घाटा एक बड़ा अलार्म है। सरकार के लिए चुनौती यह है कि वह कैसे इन कंपनियों को दिवालिया होने से बचाए और साथ ही आम आदमी की रसोई का बजट भी न बिगड़ने दे। संतुलन की यह राह बहुत कठिन है, और इसका फैसला आने वाले कुछ हफ्तों के वैश्विक घटनाक्रमों से ही तय होगा। तब तक के लिए, भारतीय उपभोक्ताओं को मिल रही यह राहत किसी नाजुक धागे से बंधी हुई प्रतीत होती है।







