वॉशिंगटन और तेहरान के बीच लंबे समय से चली आ रही सुलह की कोशिशों को गहरा झटका लगा है। महीनों की कूटनीतिक माथापच्ची के बाद दोनों देशों के बीच चल रही शांति वार्ता अचानक ठप हो गई है। जैसे ही यह खबर अंतरराष्ट्रीय मीडिया में आई, वैश्विक तेल बाजार में मानो हड़कंप मच गया। कच्चे तेल की कीमतों में देखते ही देखते दो प्रतिशत का उछाल दर्ज किया गया, जिसने न केवल विकसित देशों बल्कि भारत जैसी उभरती अर्थव्यवस्थाओं की भी नींद उड़ा दी है।
आम लोगों को डर है कि अगर यह कूटनीतिक गतिरोध लंबा खिंचा, तो आने वाले दिनों में पेट्रोल, डीजल और रसोई गैस की कीमतें उनके घर का बजट बिगाड़ सकती हैं,पिछले कुछ महीनों से दुनिया भर के अर्थशास्त्री और बाजार विशेषज्ञ इस उम्मीद में बैठे थे कि अमेरिका और ईरान के बीच कोई बीच का रास्ता निकल आएगा। माना जा रहा था कि अगर दोनों देश किसी समझौते पर पहुंचते हैं, तो ईरान पर लगे कड़े आर्थिक प्रतिबंधों में ढील दी जाएगी। ऐसा होने पर ईरान का करोड़ों बैरल तेल अंतरराष्ट्रीय बाजार में आसानी से उपलब्ध हो जाता, जिससे कीमतों में गिरावट आने की पूरी संभावना थी। लेकिन अब बातचीत रुकने के बाद बाजार में भविष्य को लेकर अनिश्चितता का माहौल बन गया है।
निवेशकों को लग रहा है कि अब निकट भविष्य में तेल की सप्लाई बढ़ने वाली नहीं है, इसलिए वे पहले से ही ऊंचे दामों पर तेल की खरीदारी कर रहे हैं। यही वजह है कि अंतरराष्ट्रीय बेंचमार्क ब्रेंट क्रूड के दाम लगातार ऊपर की ओर भाग रहे हैं।
भारत पर असर
अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दामों का बढ़ना भारत जैसे देश के लिए किसी संकट से कम नहीं है,भारत अपनी खपत का लगभग 85 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है ,यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दाम ऐसे ही बढ़ते रहे, तो भारत का विदेशी मुद्रा भंडार तेजी से कम होगा और रुपया डॉलर के मुकाबले कमजोर हो जाएगा। डॉलर के महंगा होने का मतलब है कि हमारे लिए हर चीज का आयात महंगा हो जाएगा। सरकार के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह घरेलू बाजार में तेल की कीमतों को कैसे स्थिर रखे। चुनाव और अन्य राजनीतिक कारणों से अक्सर सरकार कीमतों को बढ़ने से रोकने की कोशिश करती है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय दबाव बढ़ने पर यह संतुलन बनाए रखना बेहद मुश्किल हो जाता है।
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उद्योगों पर असर
महंगे तेल की मार केवल आम आदमी पर ही नहीं, बल्कि छोटे-बड़े सभी उद्योगों पर पड़ती है। फैक्ट्रियों में चलने वाली मशीनों से लेकर प्लास्टिक और पेंट बनाने वाली कंपनियों तक, कच्चा तेल हर जगह एक बुनियादी जरूरत है। जब इन उद्योगों की लागत बढ़ती है, तो कंपनियां अपना घाटा कम करने के लिए उत्पादों की कीमतें बढ़ा देती हैं। इसका असर बाजार में मांग और आपूर्ति पर पड़ता है। छोटे कारोबारी, जिनके पास ज्यादा पूंजी नहीं होती, वे इस बढ़ी हुई लागत को झेल नहीं पाते और उनके व्यापार पर संकट खड़ा हो जाता है। शेयर बाजार में भी इस समय इसी वजह से गिरावट देखी जा रही है क्योंकि निवेशकों को डर है कि कंपनियों का मुनाफा कम होगा और आर्थिक विकास की रफ्तार धीमी पड़ जाएगी।
क्या अभी भी कोई उम्मीद बाकी है ?
भले ही इस समय हालात बेहद तनावपूर्ण दिख रहे हों, लेकिन अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार मानते हैं कि कूटनीति में ‘अंतिम शब्द’ जैसा कुछ नहीं होता। अक्सर दबाव बनाने के लिए भी बातचीत को बीच में रोका जाता है। दुनिया के कई बड़े देश, जिनमें यूरोपीय यूनियन और कुछ खाड़ी देश शामिल हैं, इस कोशिश में जुटे हैं कि दोनों पक्षों को फिर से बातचीत के लिए राजी किया जाए। अगर पर्दे के पीछे की यह कूटनीति सफल रहती है, तो शायद तेल की कीमतों में आई यह उछाल कुछ समय बाद थम जाए। लेकिन फिलहाल के लिए, बाजार और दुनिया भर की सरकारें अभी घटनाक्रमों पर नजर बनाए हुए हैं ।
कुल मिलाकर देखें तो अमेरिका-ईरान वार्ता का विफल होना एक बड़े आर्थिक खतरे का संकेत है। तेल की बढ़ती कीमतें एक ऐसी चुनौती हैं जिससे कोई भी देश अछूता नहीं रह सकता। आने वाले दिनों में अगर तनाव और बढ़ता है, तो दुनिया भर के शेयर बाजारों में और गिरावट देखी जा सकती है और आम आदमी के लिए महंगाई एक बड़ी मुसीबत बन सकती है। फिलहाल सबकी नजरें ओपेक देशों और अमेरिका के अगले कूटनीतिक कदमों पर टिकी हैं। क्या वे उत्पादन बढ़ाकर बाजार को शांत करेंगे या फिर यह तनाव एक नए आर्थिक संकट की शुरुआत साबित होगा, यह आने वाला वक्त ही बताएगा। लेकिन इतना साफ है कि तेल के इस खेल ने पूरी दुनिया को एक अनचाही अनिश्चितता की खाई में धकेल दिया है।







