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Rare Disease Day ( रेयर डिजीज डे )-  हर साल फरवरी के आखिरी दिन 28 या 29 फरवरी को मनाया जाता है दुर्लभ रोग दिवस

हर साल फरवरी के आखिरी दिन 28 या 29 फरवरी को मनाया जाता है दुर्लभ रोग दिवस
नवजोत कौर सिद्धू
On: फ़रवरी 21, 2026 12:14 अपराह्न
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रेयर डिजीज डे (Rare Disease Day) हर साल फरवरी के आखिरी दिन मनाया जाता है। यह दिन उन लाखों लोगों के लिए आशा की किरण है जो ऐसी बीमारियों से जूझ रहे हैं जिनके बारे में दुनिया बहुत कम जानती है। इस दुर्लभ रोगों की हर पहलू वैज्ञानिक, सामाजिक, आर्थिक और मानवीय पर गहराई से चर्चा |

दुर्लभ रोग दिवस का परिचय और इतिहास

दुर्लभ रोग दिवस (Rare Disease Day) एक वैश्विक आंदोलन है जिसका उद्देश्य दुर्लभ बीमारियों से पीड़ित व्यक्तियों, उनके परिवारों और देखभाल करने वालों के लिए जागरूकता बढ़ाना और इक्विटी (समानता) लाना है।

तिथि का चयन (28 या 29 फरवरी)

फरवरी का आखिरी दिन चुनना अपने आप में एक प्रतीकात्मक निर्णय था। चूंकि फरवरी का महीना अपने आप में ‘दुर्लभ’ है (कभी 28 तो कभी 29 दिन), इसलिए इसे दुर्लभ बीमारियों का प्रतिनिधित्व करने के लिए सबसे उपयुक्त माना गया। 29 फरवरी को ‘सबसे दुर्लभ दिन’ के रूप में जाना जाता है।

इतिहास

इसकी शुरुआत 2008 में EURORDIS (यूरोपीय दुर्लभ रोग संगठन) द्वारा की गई थी। धीरे-धीरे यह आंदोलन यूरोप से बाहर निकला और आज 100 से अधिक देशों में मनाया जाता है। भारत में भी पिछले कुछ वर्षों में इसे लेकर सरकारी और सामाजिक स्तर पर काफी सक्रियता बढ़ी है।

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‘दुर्लभ रोग’ क्या है? (परिभाषा और वर्गीकरण)

किसी बीमारी को ‘दुर्लभ’ तब माना जाता है जब वह आबादी के एक बहुत छोटे हिस्से को प्रभावित करती है। हालांकि, इसकी कोई एक वैश्विक परिभाषा नहीं है:

  • विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) –  प्रति 1,000 व्यक्तियों में 0.65 से 1 व्यक्ति को प्रभावित करने वाली बीमारी।
  • भारत (स्वास्थ्य मंत्रालय) –  भारत में दुर्लभ बीमारियों को आमतौर पर उन बीमारियों के रूप में वर्गीकृत किया जाता है जो प्रति 5,000 व्यक्तियों में से 1 या उससे कम को प्रभावित करती हैं।
  • अमेरिका –  2,00,000 से कम लोगों को प्रभावित करने वाली स्थिति।

मुख्य विशेषताएं

  • आनुवंशिक मूल –  लगभग 80% दुर्लभ बीमारियाँ आनुवंशिक (Genetic) होती हैं।
  • बचपन से शुरुआत –  लगभग 50% मामले बच्चों में देखे जाते हैं।
  • जटिलता –  ये बीमारियाँ अक्सर पुराने और जीवन के लिए खतरा पैदा करने वाली होती हैं।

प्रमुख दुर्लभ बीमारियों के उदाहरण

दुनिया भर में लगभग 7,000 से अधिक दुर्लभ बीमारियों की पहचान की जा चुकी है। इनमें से कुछ प्रमुख निम्नलिखित हैं

  • Spinal Muscular Atrophy (SMA)  – मांसपेशियों की कमजोरी और तंत्रिका तंत्र की समस्या। 
  • Lysosomal Storage Disorders (LSD)  –  शरीर में एंजाइमों की कमी के कारण विषाक्त पदार्थों का जमा होना। 
  • Gaucher Disease  –  अंगों और हड्डियों में वसायुक्त पदार्थों का जमाव। 
  • Cystic Fibrosis – फेफड़ों और पाचन तंत्र को प्रभावित करने वाला आनुवंशिक रोग। 
  • Hemophilia  – रक्त के थक्के जमने की क्षमता का कम होना। 
  • Thalassemia  -”हीमोग्लोबिन की असामान्य कमी। 

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दुर्लभ रोगों की चुनौतियाँ –  “निदान से उपचार तक”

दुर्लभ रोग से पीड़ित मरीजों का रास्ता संघर्षों से भरा होता है, जिसे अक्सर “Diagnostic Odyssey” (निदान की लंबी यात्रा) कहा जाता है।

1 –  निदान में देरी

एक औसत दुर्लभ रोग के मरीज को सही निदान पाने में 5 से 7 साल का समय लग जाता है। इस दौरान मरीज कई डॉक्टरों के चक्कर लगाता है और अक्सर गलत इलाज का शिकार होता है।

2 –  दवाओं की उपलब्धता (Orphan Drugs)

दुर्लभ बीमारियों की दवाओं को ‘ऑर्फन ड्रग्स’ (Orphan Drugs) कहा जाता है। चूंकि मरीजों की संख्या कम होती है, इसलिए दवा कंपनियाँ इनके शोध और उत्पादन में निवेश करने से कतराती हैं क्योंकि इसमें मुनाफा कम होता है।

3 – अत्यधिक लागत

इन बीमारियों का इलाज इतना महंगा होता है कि आम आदमी की पहुंच से बाहर है। उदाहरण के लिए, SMA के लिए इस्तेमाल होने वाले इंजेक्शन की कीमत करोड़ों में हो सकती है।

भारत की राष्ट्रीय दुर्लभ रोग नीति (National Policy for Rare Diseases)

भारत सरकार ने 2021 में एक संशोधित नीति जारी की है, जिसके मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं

बीमारियों को तीन समूहों में बांटा गया है:

  • समूह 1  – एक बार के इलाज वाली बीमारियाँ।
  • समूह 2 –  दीर्घकालिक लेकिन कम लागत वाले उपचार वाली बीमारियाँ।
  • समूह 3 – बहुत महंगी और जीवन भर चलने वाले उपचार वाली बीमारियाँ।

वित्तीय सहायता –  सरकार समूह 1 की बीमारियों के लिए 50 लाख रुपये तक की सहायता प्रदान करती है।

उत्कृष्टता केंद्र (CoE) –  देश भर में कई अस्पतालों को दुर्लभ रोगों के निदान और उपचार के लिए केंद्र घोषित किया गया है।

क्राउडफंडिंग – सरकार ने गंभीर बीमारियों के इलाज के लिए धन जुटाने हेतु एक डिजिटल प्लेटफॉर्म भी लॉन्च किया है।

अनुसंधान और भविष्य की तकनीकें

विज्ञान की प्रगति ने दुर्लभ रोगों के क्षेत्र में नई उम्मीदें जगाई हैं

  • Gene Therapy (जीन थेरेपी) – दोषपूर्ण जीन को स्वस्थ जीन से बदलना। यह स्थायी इलाज की दिशा में सबसे बड़ा कदम है।
  • CRISPR Technology –  डीएनए में सटीक बदलाव करने की तकनीक।
  • AI (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) – दुर्लभ रोगों के लक्षणों की पहचान करने और डेटा विश्लेषण के माध्यम से त्वरित निदान में मदद करना।

समाज की भूमिका –  हम क्या कर सकते हैं?

जागरूकता केवल मरीजों के लिए नहीं, बल्कि समाज के लिए भी जरूरी है:

  • कलंक (Stigma) को खत्म करना –  दुर्लभ रोग से पीड़ित लोगों को सहानुभूति नहीं, बल्कि समान अवसर और सम्मान चाहिए।
  • रक्तदान और अंगदान –  कई बीमारियों (जैसे थैलेसीमिया) में नियमित रक्त की आवश्यकता होती है।
  • शिक्षा और स्क्रीनिंग –  विवाह पूर्व जेनेटिक काउंसलिंग और गर्भावस्था के दौरान स्क्रीनिंग से कई आनुवंशिक रोगों को रोका जा सकता है।

रेयर डिजीज डे केवल एक तारीख नहीं है, बल्कि एक वैश्विक आह्वान है। यह याद दिलाता है कि कोई भी बीमारी इतनी ‘दुर्लभ’ नहीं होनी चाहिए कि उसका इलाज न हो सके, और कोई भी मरीज इतना ‘छोटा’ नहीं होना चाहिए कि उसे अनदेखा कर दिया जाए।

“Rare is many. Rare is strong. Rare is proud.”

Pradeep Pandey

A versatile writer mainly works on politics, business, crime, current affairs and entertainment

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