भारत में कॉमर्शियल एलपीजी (LPG) सिलेंडर की किल्लत ने फूड सर्विस सेक्टर और उससे जुड़े लाखों गिग वर्कर्स (Gig Workers) की कमर तोड़ दी है। यह संकट केवल ईंधन की कमी तक सीमित नहीं है बल्कि इसने देश की डिजिटल इकोनॉमी के दो बड़े स्तंभों स्विगी (Swiggy) और जोमैटो (Zomato) के पहियों को भी धीमा कर दिया है।
संकट की पृष्ठभूमि – कॉमर्शियल सिलेंडर की किल्लत
भारत के कई राज्यों में पिछले कुछ हफ्तों से 19 किलोग्राम वाले नीले कॉमर्शियल सिलेंडर की आपूर्ति में भारी गिरावट देखी गई है। दिल्ली-एनसीआर, मुंबई, बेंगलुरु और कोलकाता जैसे महानगरों में रेस्टोरेंट संचालकों को सिलेंडर के लिए ब्लैक मार्केटिंग का सामना करना पड़ रहा है या फिर लंबी वेटिंग झेलनी पड़ रही है।
- आपूर्ति में कमी के कारण – रिफाइनरी में मेंटेनेंस कार्य अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल की कीमतों में अस्थिरता और लॉजिस्टिक्स संबंधी बाधाओं को इसका मुख्य कारण बताया जा रहा है।
- कीमतों में उछाल – किल्लत के चलते कई क्षेत्रों में सिलेंडर की कीमतें अनाधिकृत रूप से बढ़ा दी गई हैं जिससे छोटे रेस्टोरेंट के लिए परिचालन लागत (Operating Cost) असहनीय हो गई है।
रेस्टोरेंट और क्लाउड किचन पर प्रभाव
खाद्य उद्योग पूरी तरह से गैस पर निर्भर है। कॉमर्शियल गैस की कमी का सीधा असर उत्पादन पर पड़ा है
- शटर डाउन – छोटे और मध्यम स्तर के रेस्टोरेंट, जो रोजाना की कमाई पर निर्भर हैं सिलेंडर न होने के कारण अपनी रसोई बंद करने को मजबूर हैं।
- सीमित मेनू – कई आउटलेट्स ने उन डिशेज को मेनू से हटा दिया है जिन्हें पकाने में अधिक समय या गैस की खपत होती है।
- संचालन के घंटों में कटौती – गैस बचाने के लिए कई रेस्टोरेंट अब केवल ‘पीक आवर्स’ (दोपहर और रात के खाने के समय) में ही काम कर रहे हैं।
गिग वर्कर्स की आपबीती – 40 से घटकर 5 ऑर्डर
इस संकट का सबसे दर्दनाक चेहरा वे डिलीवरी पार्टनर्स हैं जो स्विगी और जोमैटो के लिए काम करते हैं। जब रेस्टोरेंट ही बंद रहेंगे या कम खाना बनाएंगे तो डिलीवरी के लिए ऑर्डर भी स्वाभाविक रूप से कम हो जाएंगे।
ऑर्डर्स में भारी गिरावट
गिग वर्कर्स के अनुसार स्थिति पहले के मुकाबले काफी खराब हो गई है
- पहले की स्थिति – एक डिलीवरी पार्टनर औसतन दिन भर में 30 से 40 ऑर्डर पूरे कर लेता था जिससे उसकी दैनिक आय ₹800 से ₹1200 के बीच होती थी।
- वर्तमान स्थिति – अब रेस्टोरेंट के पास ‘आउट ऑफ स्टॉक’ या ‘टेम्परेरी क्लोज्ड’ का बोर्ड लटका है। इसके कारण डिलीवरी पार्टनर्स को दिन भर में केवल 5 से 10 ऑर्डर मिल पा रहे हैं।
आय पर संकट
ऑर्डर कम होने का मतलब है इंसेंटिव (Incentive) का खत्म होना। अधिकांश प्लेटफॉर्म्स पर डिलीवरी पार्टनर्स को तब बोनस मिलता है जब वे एक निश्चित संख्या में ऑर्डर पूरे करते हैं। ऑर्डर कम होने से उनकी बुनियादी कमाई भी पेट्रोल के खर्च में निकल जा रही है।
तेल कंपनियों और प्रशासन का रुख
किल्लत के बीच तेल विपणन कंपनियों (OMCs) और विशेषज्ञों की ओर से कुछ ऐसे सुझाव आए हैं जिन्होंने विवाद को जन्म दिया है।
- तेल कंपनियों का तर्क – कंपनियों का कहना है कि वे उत्पादन बढ़ाने की कोशिश कर रही हैं लेकिन मांग और आपूर्ति के बीच के अंतर को कम करने में समय लगेगा।
- “घर से टिफिन लाएं” – सोशल मीडिया और स्थानीय खबरों में यह चर्चा रही है कि संकट को देखते हुए कार्यालय जाने वाले लोगों को सलाह दी जा रही है कि वे बाहर के खाने (ऑनलाइन डिलीवरी) पर निर्भर रहने के बजाय घर से टिफिन लाएं। यह सलाह रेस्टोरेंट उद्योग के लिए एक बड़ा झटका है।
अर्थव्यवस्था और उपभोक्ताओं पर असर
- उपभोक्ता – जो लोग काम के सिलसिले में घर से बाहर रहते हैं और पूरी तरह स्विगी-जोमैटो पर निर्भर हैं उनके सामने भोजन का संकट खड़ा हो गया है।
- डिलीवरी प्लेटफॉर्म – स्विगी और जोमैटो के रेवेन्यू में भारी गिरावट की संभावना है क्योंकि उनके प्लेटफॉर्म पर सक्रिय रेस्टोरेंट्स की संख्या कम हो गई है।
समाधान की राह
कॉमर्शियल एलपीजी की यह किल्लत केवल एक ऊर्जा संकट नहीं है बल्कि यह हज़ारों डिलीवरी बॉयज के चूल्हे ठंडे होने की वजह बन गई है।
आवश्यक कदम
- सरकार का हस्तक्षेप – सरकार को तत्काल हस्तक्षेप कर कॉमर्शियल गैस की सुचारू आपूर्ति सुनिश्चित करनी चाहिए।
- वैकल्पिक ऊर्जा – रेस्टोरेंट्स को धीरे-धीरे इलेक्ट्रिक कुकिंग (इंडक्शन और कमर्शियल ओवन) की ओर शिफ्ट होने के लिए सब्सिडी देनी चाहिए।
गिग वर्कर सुरक्षा – प्लेटफॉर्म कंपनियों को इस कठिन समय में डिलीवरी पार्टनर्स के लिए न्यूनतम ‘बेस पे’ सुनिश्चित करना चाहिए ताकि वे भुखमरी का शिकार न हों।







