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बांग्लादेश में चुनावों से पहले बढ़ा तनाव  BNP-जमात कार्यकर्ताओं के बीच हुआ संघर्ष

बांग्लादेश में चुनावों से पहले बढ़ा तनाव  BNP-जमात कार्यकर्ताओं के बीच हुआ संघर्ष
नवजोत कौर सिद्धू
On: फ़रवरी 10, 2026 8:12 अपराह्न
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बांग्लादेश इस समय अपने राजनीतिक इतिहास के एक अत्यंत महत्वपूर्ण और संवेदनशील दौर से गुजर रहा है। 12 फरवरी 2026 को होने वाले आम चुनावों से ठीक पहले देश भर में तनाव का माहौल है। विशेष रूप से बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) और जमात-ए-इस्लामी के कार्यकर्ताओं के बीच हो रहे हिंसक संघर्षों ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय और आम नागरिकों की चिंता बढ़ा दी है।

नीचे इस संघर्ष के कारणों, वर्तमान स्थिति और इसके पीछे के गहरे राजनीतिक समीकरणों का विस्तृत विवरण दिया गया है।

वर्तमान स्थिति –  BNP और जमात के बीच संघर्ष क्या है?

बांग्लादेश में 12 फरवरी 2026 को होने वाले मतदान से पहले BNP और जमात-ए-इस्लामी के समर्थकों के बीच कई जिलों में हिंसक झड़पें हुई हैं। हालिया घटनाओं में पटुआखाली (Patuakhali) और ढाका के मीरपुर (Mirpur) जैसे इलाकों में भारी हिंसा देखी गई है।

  • ताजा विवाद का कारण –  पटुआखाली में हिंसा तब भड़की जब BNP कार्यकर्ताओं ने आरोप लगाया कि जमात-ए-इस्लामी के लोग देर रात एक कार्यक्रम में मतदाताओं को पैसे बांट रहे हैं। इस विरोध ने जल्द ही हिंसक रूप ले लिया, जिसमें 40 से अधिक लोग घायल हो गए।
  • मीरपुर में संघर्ष – चुनाव प्रचार के दौरान जमात की महिला कार्यकर्ताओं और BNP समर्थकों के बीच विवाद हुआ, जिसके बाद दोनों पक्षों के सैकड़ों कार्यकर्ता सड़कों पर उतर आए।
  • हिंसा का पैमाना –  मानवाधिकार समूहों के अनुसार, चुनाव की घोषणा के बाद से अब तक राजनीतिक हिंसा में लगभग 20 लोगों की जान जा चुकी है और हजारों लोग घायल हुए हैं।

यह संघर्ष क्यों हो रहा है? (मुख्य कारण)

कभी एक-दूसरे के सहयोगी रहे ये दोनों दल आज एक-दूसरे के कट्टर दुश्मन क्यों बन गए हैं? इसके पीछे कई गहरे राजनीतिक और रणनीतिक कारण हैं

1.  वैचारिक मतभेद और “न्यू बांग्लादेश” की छवि

2024 में शेख हसीना के पतन के बाद, बांग्लादेश एक बदलाव के दौर से गुजर रहा है। BNP खुद को एक उदारवादी राष्ट्रवादी दल के रूप में पेश कर रही है, जबकि जमात-ए-इस्लामी का एजेंडा कट्टरपंथी इस्लामी विचारधारा की ओर झुका हुआ है। BNP को डर है कि जमात के साथ जुड़ने से उसकी अंतरराष्ट्रीय छवि प्रभावित हो सकती है, वहीं जमात अपनी स्वतंत्र पहचान बनाने के लिए आक्रामक रुख अपनाए हुए है।

2.  सत्ता का शून्य (Political Vacuum)

शेख हसीना की ‘अवामी लीग’ के प्रतिबंधित होने या मुख्यधारा से बाहर होने के बाद देश में एक बड़ा राजनीतिक खालीपन पैदा हो गया है। अब मुकाबला मुख्य रूप से BNP और जमात-ए-इस्लामी के बीच है। दोनों दल यह साबित करना चाहते हैं कि वे ही ‘अवामी लीग’ का असली विकल्प हैं।

3.  सीटों का बंटवारा और वर्चस्व की लड़ाई

BNP और जमात के बीच पहले चुनावी गठबंधन हुआ करता था, लेकिन इस बार दोनों दल कई सीटों पर आमने-सामने हैं। स्थानीय स्तर पर वर्चस्व बनाए रखने और अपने उम्मीदवारों को जिताने के लिए कार्यकर्ता एक-दूसरे पर हमले कर रहे हैं।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि –  2024 से 2026 तक का सफर

बांग्लादेश की राजनीति में यह मोड़ 2024 के ‘छात्र आंदोलन’ (Monsoon Revolution) के बाद आया।

  • शेख हसीना का निष्कासन (अगस्त 2024) –  छात्रों के भारी विरोध के बाद 15 साल से सत्ता में रहीं शेख हसीना को देश छोड़कर भागना पड़ा।
  • अंतरिम सरकार –  नोबेल पुरस्कार विजेता मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व में एक अंतरिम सरकार बनाई गई, जिसका मुख्य कार्य देश में निष्पक्ष चुनाव कराना था।
  • जमात पर से प्रतिबंध हटना – शेख हसीना सरकार ने जमात-ए-इस्लामी पर प्रतिबंध लगा दिया था, जिसे अंतरिम सरकार ने हटा लिया। इसके बाद जमात एक नई ताकत के रूप में उभरी।

राजनीतिक समीकरण –  मुख्य खिलाड़ी

दल / गठबंधननेतृत्व मुख्य एजेंडा 
BNP तारिक रहमान (लंदन से)लोकतंत्र की बहाली, राष्ट्रवाद, अवामी लीग के दौर की नीतियों का अंत। 
जमात-ए-इस्लामीशफीकुर रहमानशरीयत आधारित शासन की वकालत, इस्लामी पहचान को मजबूत करना।
NCP (छात्र आंदोलन से उपजा दल)छात्र नेता  भ्रष्टाचार मुक्त ‘न्यू बांग्लादेश’, व्यवस्था परिवर्तन। 

हिंसा का प्रभाव और चुनौतियां

  • आम नागरिक में भय – लगातार हो रहे बम धमाकों और सड़कों पर गोलीबारी के कारण आम मतदाता डरा हुआ है। कई लोग मतदान केंद्र जाने से कतरा सकते हैं।
  • अर्थव्यवस्था पर चोट –  बांग्लादेश पहले से ही विदेशी मुद्रा भंडार की कमी और महंगाई से जूझ रहा है। राजनीतिक अस्थिरता ने निवेशकों का भरोसा तोड़ा है।
  • सुरक्षा बलों की भूमिका –  पुलिस और सेना के सामने चुनौती यह है कि वे किसी एक पक्ष का समर्थन करने के आरोपों से कैसे बचें।

भविष्य की राह

बांग्लादेश में 12 फरवरी का चुनाव केवल एक सरकार चुनने के लिए नहीं, बल्कि देश की भावी दिशा तय करने के लिए है। BNP और जमात के बीच बढ़ता यह टकराव यह संकेत दे रहा है कि शेख हसीना के जाने के बाद भी देश में स्थिरता आना अभी बाकी है। यदि यह हिंसा नहीं रुकी, तो चुनाव की निष्पक्षता पर सवाल उठ सकते हैं और देश फिर से लंबे समय तक अशांति की आग में झुलस सकता है।

आगे क्या हो सकता है?

सख्त सुरक्षा उपाय –  अंतरिम सरकार आने वाले दिनों में और अधिक सेना तैनात कर सकती है।

राजनीतिक समझौता –  यदि हिंसा असहनीय हो गई, तो मोहम्मद यूनुस दोनों पक्षों को बातचीत की मेज पर ला सकते हैं।

Pradeep Pandey

A versatile writer mainly works on politics, business, crime, current affairs and entertainment

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