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पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव –  ममता बनर्जी की पाटी टीएमसी (TMC) में बड़ा फेरबदल मौजूदा 74 से अधिक विधायकों की काटी टिकट

  ममता बनर्जी की पाटी टीएमसी (TMC) में बड़ा फेरबदल मौजूदा 74 से अधिक विधायकों की काटी टिकट
नवजोत कौर सिद्धू
On: मार्च 18, 2026 2:46 अपराह्न
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पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक बार फिर ‘खेला होबे’ की गूंज है। 2026 के विधानसभा चुनावों के लिए मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने अपनी पार्टी तृणमूल कांग्रेस (TMC) के उम्मीदवारों की जो सूची जारी की है उसने राजनीतिक गलियारों में हलचल पैदा कर दी है। यह केवल एक सूची नहीं, बल्कि दीदी का ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ माना जा रहा है।

​टीएमसी ने इस बार 74 मौजूदा विधायकों के टिकट काट दिए हैं और लगभग 15 विधायकों की सीटें बदल दी हैं। आखिर ममता बनर्जी ने इतना बड़ा जोखिम क्यों उठाया? क्या यह सत्ता विरोधी लहर (Anti-incumbency) का डर है या फिर अभिषेक बनर्जी के ‘युवा मॉडल’ की जीत?

​ बड़े नामों की छुट्टी –  किसे मिला और किसका कटा टिकट?

​ममता बनर्जी ने इस बार स्पष्ट संदेश दिया है कि पार्टी में नाम से ज्यादा काम की अहमियत है। टिकट कटने वालों में कई दिग्गज और ‘सेलिब्रिटी’ चेहरे भी शामिल हैं

  • दिग्गज जो बाहर हुए –  पूर्व मंत्री पार्थ चटर्जी (बेहला पश्चिम), परेश पाल (बेलियाघाटा), और असीत मजुमदार (चुंचुड़ा) जैसे कद्दावर नेताओं को इस बार मौका नहीं मिला है।
  • ग्लैमर का तड़का कम –  टॉलीवुड के सितारों में से अभिनेता कांचन मल्लिक (उत्तरपाड़ा) और चिरंजीत चक्रवर्ती (बारासात) का टिकट काट दिया गया है। पूर्व क्रिकेटर मनोज तिवारी (शिबपुर) का नाम भी इस बार गायब है।
  • दागी नेताओं पर गाज –  शिक्षक भर्ती घोटाले और अन्य भ्रष्टाचार के आरोपों में घिरे नेताओं को बाहर का रास्ता दिखाकर दीदी ने ‘क्लीन इमेज’ का दांव खेला है।

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​ममता दीदी के इस बड़े फैसले के पीछे के 5 मुख्य कारण

  • सत्ता विरोधी लहर (Anti-incumbency) को काटना – ​लगातार 15 वर्षों से सत्ता में रहने के कारण स्थानीय स्तर पर कई विधायकों के खिलाफ जनता में नाराजगी थी। आंतरिक सर्वे रिपोर्टों के अनुसार कई विधानसभा क्षेत्रों में संगठन तो मजबूत था लेकिन विधायक की व्यक्तिगत लोकप्रियता गिर चुकी थी। पुराने चेहरों को बदलकर ममता ने उस गुस्से को शांत करने की कोशिश की है।
  • अभिषेक बनर्जी का ‘नया तृणमूल’ विजन – ​टीएमसी के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी लंबे समय से ‘एक व्यक्ति एक पद’ और युवाओं को आगे लाने की वकालत कर रहे थे। इस बार की सूची में 45% उम्मीदवार 50 वर्ष से कम आयु के हैं। यह दर्शाता है कि अब पार्टी की कमान धीरे-धीरे नई पीढ़ी के हाथों में जा रही है।
  • भ्रष्टाचार के दाग धोना – ​हाल के वर्षों में टीएमसी के कई बड़े नेता केंद्रीय एजेंसियों (ED/CBI) की जांच के घेरे में आए हैं। 74 विधायकों को हटाकर ममता बनर्जी ने जनता को यह संदेश देने की कोशिश की है कि वे भ्रष्टाचार को बर्दाश्त नहीं करेंगी।
  • भाजपा के ‘हिंदुत्व’ और ‘युवा कार्ड’ की काट – ​भाजपा अक्सर टीएमसी पर तुष्टीकरण और बुजुर्गों की पार्टी होने का आरोप लगाती रही है। इस बार 95 उम्मीदवार SC/ST समुदाय से और बड़ी संख्या में युवाओं को उतारकर ममता ने भाजपा के वोट बैंक में सेंध लगाने की रणनीति बनाई है।
  • ​सांगठनिक अनुशासन – ​15 विधायकों की सीटें बदलना यह दर्शाता है कि पार्टी नेताओं को उनके ‘गढ़’ से निकालकर यह परखना चाहती है कि उनकी ताकत संगठन है या उनका व्यक्तिगत प्रभाव।

​ नया समीकरण –  युवाओं और जमीनी नेताओं का संगम

​इस बार टीएमसी ने ‘स्टार पावर’ की जगह ‘ग्राउंड पावर’ पर भरोसा किया है। सूची में कुछ महत्वपूर्ण बदलाव और नए चेहरे गौर करने लायक हैं

श्रेणीसंख्या / विवरण
कुल सीटें291 (3 सीटें सहयोगी दल BGPM के लिए छोड़ीं)
महिला उम्मीदवारकरीब 50+
युवा (30-40 वर्ष)13% (38 उम्मीदवार)
मुस्लिम चेहरे47
SC/ST उम्मीदवार95 (78 SC + 17 ST)

देवांशु भट्टाचार्य जैसे युवा प्रवक्ताओं को मैदान में उतारना यह साफ करता है कि पार्टी अब सोशल मीडिया और जमीनी विमर्श (Discourse) बदलने वाले नेताओं को प्राथमिकता दे रही है।

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​ क्या यह कदम आत्मघाती होगा या मास्टरस्ट्रोक?

  • चुनौतियां (Risks) – इतने बड़े पैमाने पर टिकट काटने से ‘भीतरघात’ का खतरा बढ़ जाता है। टिकट न मिलने से नाराज नेता निर्दलीय चुनाव लड़ सकते हैं या भाजपा/वाम दलों का दामन थाम सकते हैं। परेश पाल जैसे पुराने वफादारों ने हालांकि सार्वजनिक रूप से कहा है कि वे पार्टी के फैसले का सम्मान करते हैं लेकिन निचले स्तर के कार्यकर्ताओं को संभालना एक चुनौती होगी।
  • संभावनाएं (Opportunities) – नए चेहरों के आने से कार्यकर्ताओं में नया जोश आता है। यह ‘प्रो-इंकंबेंसी’ (Pro-incumbency) पैदा करने का एक तरीका है जहाँ जनता को लगता है कि सरकार भले ही पुरानी है लेकिन उनका प्रतिनिधि नया और ऊर्जावान है।

 दीदी का ‘मिशन 2026’

​ममता बनर्जी का यह फैसला बताता है कि वे 2026 की लड़ाई को हल्के में नहीं ले रही हैं। उन्होंने ‘भवानीपुर’ से खुद चुनाव लड़ने का फैसला कर यह साफ कर दिया है कि वे फ्रंट फुट पर खेलेंगी (जहाँ उनका मुकाबला शुभेंदु अधिकारी से होने की संभावना है)।

​यह फेरबदल केवल चुनाव जीतने के लिए नहीं है बल्कि यह टीएमसी के भविष्य का खाका है। अगर यह प्रयोग सफल रहा तो यह भारतीय राजनीति में ‘सत्ता विरोधी लहर’ को मात देने का एक नया मॉडल बन जाएगा।

Pradeep Pandey

A versatile writer mainly works on politics, business, crime, current affairs and entertainment

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