यह एक अत्यंत संवेदनशील और भावनात्मक विषय है। हरीश राणा का मामला भारत के चिकित्सा और कानूनी इतिहास में एक मील का पत्थर बन गया है।
कौन थे हरीश राणा? (जीवन परिचय)
हरीश राणा दिल्ली के एक मध्यमवर्गीय परिवार से ताल्लुक रखते थे। 13 साल पहले तक वह एक ऊर्जावान युवक थे जिनके सपने किसी भी अन्य नौजवान की तरह ऊंचे थे।
- पारिवारिक पृष्ठभूमि – हरीश के परिवार में उनके माता-पिता और भाई-बहन थे। उनके पिता एक साधारण कर्मचारी थे जिन्होंने अपने जीवन की जमा-पूंजी हरीश के इलाज में लगा दी।
- व्यक्तित्व – वह एक होनहार छात्र थे और अपने करियर को लेकर काफी गंभीर थे। दुर्घटना से पहले वह अपने भविष्य को संवारने के लिए कड़ी मेहनत कर रहे थे।
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वह भीषण हादसा – आखिर क्या हुआ था?
हरीश के जीवन की दुखांतिका अगस्त 2013 को चंडीगढ़ में बीटेक (B.Tech) के छात्र रहे हरीश राणा एक पेइंग गेस्ट आवास की चौथी मंजिल से नीचे गिर गए थे।
- चोट की गंभीरता – इस गिरने की वजह से उनके सिर में गंभीर चोटें आईं (Traumatic Brain Injury)।
- चिकित्सीय स्थिति – गिरने के तुरंत बाद उन्हें अस्पताल ले जाया गया लेकिन उनके मस्तिष्क ने काम करना बंद कर दिया था। डॉक्टरों ने बताया कि वह ‘परमानेंट वेजिटेटिव स्टेट’ (PVS) में चले गए हैं।
- 13 साल का कोमा – 2013 से लेकर 2026 तक हरीश बेड पर ही रहे। वह न बोल सकते थे न सुन सकते थे और न ही अपनी कोई जरूरत बता सकते थे। उन्हें पाइप के जरिए तरल भोजन दिया जाता था।
माता-पिता का संघर्ष और कोर्ट का दरवाजा
13 वर्षों तक हरीश के माता-पिता ने उनकी सेवा की। उन्होंने अपने घर को ही एक छोटा अस्पताल बना दिया था लेकिन समय के साथ उनकी उम्मीदें टूटने लगीं और आर्थिक स्थिति जर्जर हो गई।
- याचिका का आधार – माता-पिता ने दिल्ली हाई कोर्ट और फिर सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। उन्होंने दलील दी कि हरीश केवल मशीनों और पाइप के सहारे जीवित हैं। उनके ठीक होने की कोई गुंजाइश नहीं है और उनकी पीड़ा को अब और देखना उनके लिए असंभव है।
- गरिमापूर्ण मृत्यु – याचिका में कहा गया कि संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन का अधिकार) में ‘गरिमा के साथ मरने का अधिकार’ भी शामिल होना चाहिए जैसा कि 2018 के कॉमन कॉज बनाम भारत संघ मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था।
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कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला और अनुमति
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को संवेदनशीलता से देखा और एक मेडिकल बोर्ड का गठन किया।
बोर्ड की रिपोर्ट
एम्स (AIIMS) के डॉक्टरों के बोर्ड ने जांच के बाद पुष्टि की कि हरीश के मस्तिष्क में रिकवरी की 0% संभावना है। वह पूरी तरह से ‘लाइफ सपोर्ट’ पर थे।
कोर्ट का निर्णय
सुप्रीम कोर्ट ने ‘पैसिव यूथेनेशिया’ की अनुमति दी। इसके तहत
- जीवन रक्षक प्रणालियों (जैसे फीडिंग ट्यूब और दवाएं) को धीरे-धीरे हटाया जाना था।
- यह सुनिश्चित किया जाना था कि इस प्रक्रिया के दौरान उन्हें दर्द न हो।
- कोर्ट ने माना कि कृत्रिम रूप से उनके जीवन को खींचना उनकी गरिमा के खिलाफ है।
एम्स में अंतिम सांस
कोर्ट की अनुमति के बाद हरीश राणा को दिल्ली एम्स में भर्ती कराया गया। डॉक्टरों की निगरानी में प्रक्रिया शुरू हुई और 13 साल के लंबे और दर्दनाक इंतजार के बाद 31 वर्ष की आयु में हरीश ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया।
भारत में इच्छामृत्यु का कानून (महत्वपूर्ण बिंदु)
भारत में एक्टिव यूथेनेशिया (जहर का इंजेक्शन देना) अवैध है लेकिन पैसिव यूथेनेशिया (इलाज रोक देना) कानूनी है।
| विषय | विवरण |
| प्रकार | निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) |
| सुप्रीम कोर्ट गाइडलाइन | 2018 के फैसले के अनुसार ‘लिविंग विल’ और मेडिकल बोर्ड की मंजूरी अनिवार्य है। |
| हरीश राणा का केस | यह पहला ऐसा व्यावहारिक क्रियान्वयन बना जहाँ एक लंबे समय से कोमा में व्यक्ति को कानूनी रूप से विदा किया गया। |
हरीश राणा की कहानी केवल एक दुखद दुर्घटना की गाथा नहीं है, बल्कि यह मानवीय गरिमा और चिकित्सा नैतिकता के बीच के संघर्ष की दास्तां है। उनके माता-पिता के लिए यह ‘पुत्र वियोग’ के साथ-साथ उसे कष्टों से मुक्ति दिलाने का एक कठिन लेकिन जरूरी फैसला था।







