नई दिल्ली। पश्चिम एशिया में जारी ईरान युद्ध का असर अब भारत के रोजगार और उद्योग जगत पर साफ दिखाई देने लगा है। खाड़ी देशों में काम करने वाले हजारों भारतीय मजदूर रोजगार खोकर वापस लौट रहे हैं, जबकि देश के कई छोटे और मध्यम उद्योग भी अंतरराष्ट्रीय संकट की मार झेल रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि हालात जल्द सामान्य नहीं हुए तो बेरोजगारी, महंगाई और आर्थिक दबाव आने वाले महीनों में और बढ़ सकता है,भारत के लाखों लोग वर्षों से सऊदी अरब, यूएई, कतर और अन्य खाड़ी देशों में काम करते रहे हैं। वहां से भेजी जाने वाली रकम पर देश के कई परिवारों की आजीविका निर्भर करती है। लेकिन ईरान युद्ध के बाद खाड़ी क्षेत्र में व्यापार, निर्माण और परिवहन गतिविधियों पर असर पड़ा है। कई कंपनियों ने खर्च कम करने के लिए कर्मचारियों की संख्या घटानी शुरू कर दी है। इसका सीधा असर भारतीय कामगारों पर पड़ा है।
उत्तर प्रदेश, बिहार, केरल और तेलंगाना जैसे राज्यों से बड़ी संख्या में लोग खाड़ी देशों में काम करने जाते रहे हैं। अब इनमें से कई लोग वापस अपने गांव और शहर लौटने लगे हैं। लौटे हुए मजदूरों का कहना है कि वहां पहले जैसी नौकरी और आय अब नहीं बची। कुछ लोगों को महीनों से पूरा वेतन नहीं मिला, जबकि कई को अचानक काम बंद होने की सूचना दे दी गई।ऐसे ही एक मजदूर ने बताया कि वह कई वर्षों से खाड़ी देश में एक निजी कंपनी में काम कर रहा था। उसकी कमाई से परिवार का खर्च चलता था और बच्चों की पढ़ाई भी उसी पर निर्भर थी। लेकिन युद्ध के बाद कंपनी ने कर्मचारियों की संख्या घटा दी और उसे वापस भारत लौटना पड़ा।
अब गांव लौटने के बाद उसे स्थायी रोजगार नहीं मिल पा रहा है और परिवार की आर्थिक स्थिति कमजोर हो गई है,यह स्थिति केवल कुछ परिवारों के व्यक्तिगत संकट तक सीमित नहीं है, बल्कि देश के संपूर्ण रोजगार बाजार के लिए एक नई चुनौती है। भारत में पहले से ही रोजगार की स्थिति काफी संवेदनशील बनी हुई है, जहां हर साल लाखों नए युवा नौकरी की तलाश में आते हैं। ऐसे में अचानक विदेश से लौट रहे अनुभवी और अर्ध-कुशल कामगारों की इस नई भीड़ को घरेलू बाजार में खपाना सरकार और स्थानीय प्रशासनों के लिए एक अत्यंत जटिल कार्य साबित होने वाला है।
भारत के छोटे निर्यात उद्योग जैसे चमड़ा, कपड़ा, हस्तशिल्प और कालीन जैसे पारंपरिक उद्योगों पर इस अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक अनिश्चितता का सीधा असर देखा जा रहा है। वैश्विक स्तर पर परिवहन व्यवस्था बाधित होने से भारतीय सामानों के विदेशी ऑर्डर लगातार कम हो रहे हैं, जिससे उत्पादन की लागत में भारी बढ़ोतरी हुई है।कानपुर, चेन्नई, भदोही और सूरत जैसे प्रमुख औद्योगिक शहरों में कई छोटे कारखानों ने अपने यहां उत्पादन की क्षमता को आधा कर दिया है। उद्योग संचालकों का कहना है कि पहले जहां कारखाने पूरी क्षमता के साथ चलते थे, वहीं अब नए ऑर्डर न मिलने और पुराने भुगतानों के फंसने के कारण काम को रोकना पड़ रहा है। माल ढुलाई के बढ़े हुए भाड़े और कच्चे माल की आसमान छूती कीमतों ने स्थिति को और अधिक गंभीर बना दिया है। भविष्य को लेकर बनी इस अनिश्चितता के कारण कोई भी नया कारखाना संचालक नए कर्मचारियों की भर्ती करने का जोखिम नहीं उठाना चाहता।
कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें और महंगाई का डर
आर्थिक विश्लेषकों के अनुसार, इस पूरे घटनाक्रम का सबसे संवेदनशील हिस्सा कच्चे तेल का बाजार है। होर्मुज जलडमरूमध्य के आसपास बढ़ते सैन्य खतरों के कारण अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल की कीमतें लगातार बढ़ रही हैं। भारत अपनी जरूरत का एक बहुत बड़ा हिस्सा विदेशों से आयात करता है, इसलिए वैश्विक बाजार में तेल महंगा होने का सीधा असर घरेलू बाजार में पेट्रोल और डीजल की कीमतों पर पड़ता है।
ईंधन की कीमतें बढ़ने से देश के भीतर माल ढुलाई और परिवहन व्यवस्था महंगी हो जाती है। इसका सीधा असर आम उपभोक्ता की जेब पर पड़ता है क्योंकि फल, सब्जी, अनाज और रोजमर्रा की सभी आवश्यक वस्तुओं के दाम बढ़ने लगते हैं। एक तरफ आम जनता की आय कम हो रही है और दूसरी तरफ महंगाई बढ़ रही है, जिससे बाजार में सामानों की मांग कमजोर होने की आशंका है। यदि यह स्थिति लंबे समय तक बनी रही तो इसका असर छोटे व्यापारियों से लेकर बड़े विनिर्माण क्षेत्रों तक देखने को मिल सकता है।
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संकट से निपटने के लिए सरकारी प्रयासों की जरूरत
इस गंभीर आर्थिक चुनौती से निपटने के लिए विशेषज्ञों का मानना है कि सरकार को तुरंत कुछ ठोस कदम उठाने होंगे। सबसे पहले, खाड़ी देशों से लौट रहे प्रवासी मजदूरों के हुनर और कार्य अनुभव का एक डेटाबेस तैयार किया जाना चाहिए, ताकि उन्हें देश के भीतर चल रही बुनियादी ढांचा परियोजनाओं से जोड़ा जा सके। इसके साथ ही, मंदी की मार झेल रहे छोटे और मध्यम उद्योगों को बचाने के लिए बैंकों से सस्ती दर पर ऋण सुविधा और बिजली दरों में कुछ राहत जैसे कदम उठाने की जरूरत है। यदि समय रहते इन कामगारों और उद्योगों को संबल नहीं दिया गया, तो आने वाले महीनों में आर्थिक मंदी के साथ-साथ सामाजिक असंतोष की स्थिति भी पैदा हो सकती है। फिलहाल सभी की निगाहें पश्चिम एशिया के हालातों पर हैं कि वहां शांति कब बहाल होती है।







