वॉशिंगटन/तेहरान। पिछले कई महीनों से जारी अमेरिका और ईरान के बीच का तनाव अब शांत होता दिख रहा है। दोनों देशों के बीच महीनों से चली आ रही तनातनी और सैन्य टकराव की आशंकाओं के बीच अब कूटनीतिक गलियारों से राहत की खबरें आने लगी हैं। कई मोर्चों पर जारी बातचीत के बाद दोनों देशों के कड़े तेवरों में नरमी के साफ संकेत मिल रहे हैं। पूरी दुनिया इस समय थमे हुए कदमों से इन दोनों देशों की हर हलचल पर नजरें टिकाए बैठी है, क्योंकि यहां होने वाली एक छोटी सी हलचल भी वैश्विक बाजार की दिशा बदल देती है।इस बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के एक ताजा बयान ने दुनिया भर के नीति-नियंताओं को चौंकाने के साथ-साथ राहत भी दी है।
ट्रंप ने व्हाइट हाउस में पत्रकारों से बात करते हुए दावा किया कि अमेरिका और ईरान एक ऐतिहासिक “समझौते के बेहद करीब” पहुंच चुके हैं। वाशिंगटन के इस सकारात्मक रुख पर तेहरान ने भी सधी हुई प्रतिक्रिया दी है। ईरानी विदेश मंत्रालय की ओर से संकेत दिए गए हैं कि दोनों पक्षों के बीच जारी मैराथन बैठकों में मतभेदों की खाई पहले के मुकाबले काफी कम हुई है। कूटनीतिक जानकारों का मानना है कि यदि आने वाले दिनों में यह बातचीत किसी ठोस नतीजे पर पहुंचती है, तो मध्य पूर्व को एक बड़े युद्ध के मुहाने से वापस लाया जा सकेगा।
पर्दे के पीछे की कूटनीति और पाकिस्तान की भूमिका
इस पूरे मामले में सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि यह बातचीत अचानक नहीं शुरू हुई। राजनयिक सूत्रों के मुताबिक, पिछले कुछ हफ्तों से दोनों देशों के शीर्ष अधिकारी अलग-अलग गुप्त माध्यमों से लगातार एक-दूसरे के संपर्क में थे। इस गुप्त बातचीत के एजेंडे में मुख्य रूप से तीन बातें शामिल हैं— सीमा पर तत्काल युद्धविराम, खाड़ी क्षेत्र में सैन्य तनाव को कम करना और ईरान का विवादित परमाणु कार्यक्रम।इस बड़ी कूटनीतिक बिसात पर पड़ोसी देश पाकिस्तान एक अहम मध्यस्थ की भूमिका निभाता नजर आ रहा है। रक्षा मामलों के जानकारों के अनुसार, पाकिस्तान के सेना प्रमुख जनरल आसिम मुनीर ने हाल ही में तेहरान का एक महत्वपूर्ण और संवेदनशील दौरा किया था। वहां उन्होंने ईरानी शीर्ष नेतृत्व और सैन्य अधिकारियों से मुलाकात की। माना जा रहा है कि इसी मुलाकात के बाद दोनों देशों के बीच रुकी हुई बातचीत की गाड़ी अचानक पटरी पर लौट आई और ट्रंप के बयानों में भी नरमी देखी गई।
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ट्रंप के बदले सुर और ईरान की घरेलू मजबूरी
अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने मीडिया से बातचीत में कहा कि अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत सही दिशा में आगे बढ़ रही है। उन्होंने कहा कि दोनों पक्ष “काफी करीब” हैं और जल्द कोई सकारात्मक नतीजा सामने आ सकता है।हालांकि ट्रंप ने यह भी साफ किया कि अमेरिका अपनी सुरक्षा और परमाणु मुद्दे पर किसी तरह का खतरा स्वीकार नहीं करेगा। उन्होंने कहा कि अगर बातचीत विफल होती है तो अमेरिका अपने हितों की रक्षा के लिए जरूरी कदम उठाएगा।ट्रंप के बयान को इसलिए भी अहम माना जा रहा है क्योंकि पिछले कुछ महीनों में उन्होंने कई बार ईरान को लेकर सख्त बयान दिए थे। ऐसे में उनका नरम रुख नई उम्मीद पैदा कर रहा है।ईरान की ओर से भी इस बार बातचीत को लेकर पहले से नरम रुख दिखाई दिया है। ईरानी अधिकारियों ने कहा है कि अगर अमेरिका ईमानदारी से बातचीत करता है तो समाधान निकल सकता है।हालांकि ईरान ने यह भी कहा कि वह अपने राष्ट्रीय हितों से समझौता नहीं करेगा। ईरान लंबे समय से कहता रहा है कि उसका परमाणु कार्यक्रम शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए है और वह किसी परमाणु हथियार की तैयारी नहीं कर रहा।
यूरेनियम संवर्धन और होर्मुज जलडमरूमध्य का पेंच
इस पूरी बातचीत का सबसे संवेदनशील और पेचीदा हिस्सा ईरान का परमाणु कार्यक्रम ही है। सूत्रों की मानें तो पर्दे के पीछे चल रही इस बातचीत में एक बीच का रास्ता निकालने की कोशिश की जा रही है। इसके तहत ईरान को यूरेनियम संवर्धन की एक निश्चित सीमा तय करने के लिए राजी किया जा रहा है। साथ ही, उसके परमाणु ठिकानों पर अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी की निगरानी बढ़ाने पर भी सहमति बनाने के प्रयास जारी हैं। इसके बदले में अमेरिका ईरान पर लगे कुछ कड़े आर्थिक प्रतिबंधों को धीरे-धीरे हटाने की शुरुआत कर सकता है।इस तनाव का सबसे ज्यादा असर ‘होर्मुज जलडमरूमध्य’ पर देखने को मिल रहा था। यह समुद्र का वह संकरा रास्ता है जहां से दुनिया के एक-तिहाई तेल का व्यापार होता है। युद्ध की आशंका मात्र से अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें आसमान छूने लगी थीं।
अविश्वास की गहरी खाई, पर उम्मीदें बरकरार
वैश्विक मामलों के विशेषज्ञों का कहना है कि भले ही दोनों देशों के बीच अविश्वास की खाई दशकों पुरानी और बहुत गहरी है, जिसे रातों-रात पाटना नामुमकिन है, लेकिन इस समय बातचीत का दौर शुरू होना ही अपने आप में एक बड़ी जीत है। यदि यह समझौता सिरे चढ़ता है, तो न केवल तेल बाजार स्थिर होगा, बल्कि मंदी की मार झेल रही वैश्विक अर्थव्यवस्था को भी एक नई संजीवनी मिलेगी। अब देखना यह है कि आने वाले दिनों में दोनों देश इस शुरुआती नरमी को एक स्थायी शांति समझौते में बदल पाते हैं या नहीं।







