ईरान सरकार ने देश की सीमाओं के भीतर काम कर रहे अंतरराष्ट्रीय मीडिया घरानों की घेराबंदी और सख्त कर दी है। राजधानी तेहरान से संचालित होने वाले तमाम विदेशी समाचार संगठनों के लिए अब अपनी कोई भी रिपोर्ट, ग्राउंड वीडियो या तस्वीरें देश से बाहर भेजने से पहले कुछ बेहद पेचीदा और कड़े नियमों से गुजरना होगा। ईरान के संस्कृति और इस्लामी मार्गदर्शन मंत्रालय की ओर से जारी इस ताजा फरमान ने वैश्विक मीडिया जगत में खलबली मचा दी है। नए आदेश के मुताबिक, ईरान की जमीन से तैयार की गई किसी भी कूटनीतिक या सामाजिक रिपोर्ट का इस्तेमाल इजरायली मीडिया या विदेशों से संचालित होने वाले फारसी भाषा के सैटेलाइट चैनल किसी भी सूरत में नहीं कर सकेंगे।यह पाबंदी ऐसे समय पर लगाई गई है जब मध्य पूर्व में बारूद के ढेर पर बैठी शांति वार्ता की खबरें तैर रही हैं।
वैश्विक समाचार एजेंसियों को मिला अल्टीमेटम
ईरान के संबंधित मंत्रालय द्वारा जो आधिकारिक नोटिस भेजा गया है, उसने स्वतंत्र पत्रकारिता के सामने एक नया संकट खड़ा कर दिया है। अब हर अंतरराष्ट्रीय न्यूज़ एजेंसी को अपनी हर छोटी-बड़ी रिपोर्ट, वीडियो फीड या फोटो गैलरी के साथ एक अनिवार्य ‘डिस्क्लेमर’ नत्थी करना होगा। इसमें साफ-साफ लिखना होगा कि इस कंटेंट का अधिकार किसी भी इजरायली टीवी नेटवर्क या पश्चिम समर्थित फारसी चैनलों के पास नहीं होगा।खबरों की मानें तो दशकों से ईरान में मौजूद एसोसिएटेड प्रेस जैसी दिग्गज वैश्विक एजेंसियों को यह आदेश सीधे तौर पर थमा दिया गया है। देखा जाए तो ईरान पहले भी बीबीसी पर्शियन, वॉइस ऑफ अमेरिका पर्शियन, मनोटो टीवी और ईरान इंटरनेशनल जैसे विरोधी रुख रखने वाले चैनलों को सामग्री देने पर पाबंदियां लगाता रहा है। लेकिन इस बार फर्क यह है कि सरकार ने इसे एक बेहद सख्त और कानूनी रूप दे दिया है, जिससे बचना विदेशी पत्रकारों के लिए आसान नहीं होगा।
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सुलगते मिडिल ईस्ट के बीच बढ़ती सेंसरशिप
भू-राजनीतिक मामलों के विशेषज्ञों का साफ कहना है कि ईरान के इस कदम को महज एक सामान्य प्रशासनिक नियंत्रण मान लेना बड़ी भूल होगी। इसका सीधा कनेक्शन इलाके में चल रहे मौजूदा सैन्य टकराव और मनोवैज्ञानिक युद्ध है। इस साल फरवरी के महीने से ही पूरे पश्चिम एशिया में हालात काबू से बाहर दिख रहे हैं। अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरानी ठिकानों को निशाना बनाने की धमकियां, होरमुज जलडमरूमध्य जैसी रणनीतिक समुद्री पट्टी पर जहाजों की धरपकड़ और ठंडे बस्ते में जा चुके परमाणु समझौते को लेकर मची खींचतान ने पूरे क्षेत्र को बारूद के मुहाने पर लाकर खड़ा कर दिया है।ऐसी नाजुक घड़ी में ईरान सरकार नहीं चाहती कि उसके देश के भीतर की कोई भी ऐसी कमजोरी या खबर बाहर जाए जिसका इस्तेमाल उसके दुश्मन देश प्रोपेगैंडा फैलाने के लिए कर सकें। यही वजह है कि पिछले कुछ महीनों में ईरान के भीतर इंटरनेट पर अघोषित ताला लगा दिया गया था।
ट्रंप की ‘डील’ और तेहरान की अपनी चाल
व्हाइट हाउस में बैठे अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप लगातार यह नैरेटिव सेट करने में जुटे हैं कि वे ईरान को बातचीत की मेज पर लाने में सफल रहे हैं। ट्रंप और उनके विदेश मंत्री मार्को रुबियो की जोड़ी बार-बार यह संदेश दे रही है कि ईरान के साथ एक ऐतिहासिक समझौता बहुत जल्द सामने आ सकता है। अमेरिकी कूटनीति इस समय यह दिखाने की कोशिश कर रही है कि उसके दबाव तंत्र के आगे ईरान झुक रहा है।हालांकि, तेहरान के हुक्मरान अमेरिका के इस गेम प्लान को अच्छी तरह समझते हैं। ईरानी अधिकारियों का कहना है कि वाशिंगटन एक तरफ तो शांति की बात करता है और दूसरी तरफ इजरायल की आक्रामक हरकतों को शह देता है। इस विरोधाभासी रवैये के कारण ईरान किसी भी जल्दबाजी में कोई समझौता करने के मूड में नहीं है। मीडिया पर लगाया गया यह नया प्रतिबंध असल में दुनिया को यह दिखाने की कोशिश भी है कि ईरान अपनी शर्तों पर झुकेगा, अमेरिका के दबाव में नहीं।
प्रेस की आजादी पर दुनिया में तीखी प्रतिक्रिया
ईरान की इस नई नीति पर दुनिया भर के मानवाधिकार संगठनों और ‘रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स’ जैसी मीडिया निगरानी संस्थाओं ने गहरी चिंता व्यक्त की है। इन संस्थाओं का तर्क है कि जब कोई देश युद्ध या भीषण आर्थिक संकट के दौर से गुजर रहा होता है, तब वहां स्वतंत्र और निष्पक्ष पत्रकारिता की सबसे ज्यादा जरूरत होती है। लेकिन ईरान लगातार सूचनाओं के स्वतंत्र प्रवाह का गला घोंटने की कोशिश कर रहा है।विश्लेषकों का मानना है कि ईरानी हुकूमत चाहती है कि दुनिया के सामने देश की सिर्फ वही तस्वीर जाए जो उनका सरकारी तंत्र दिखाना चाहता है। अगर विदेशी मीडिया पर इसी तरह की बंदिशें बढ़ती रहीं, तो आने वाले समय में ईरान के भीतर चल रहे जन-असंतोष, चरमराती अर्थव्यवस्था और क्षेत्रीय संघर्ष से जुड़ी जमीनी हकीकत दुनिया तक कभी नहीं पहुंच पाएगी। फिलहाल, पूरी दुनिया की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि क्या यह नया सेंसरशिप कानून विदेशी मीडिया को तेहरान छोड़ने पर मजबूर करेगा, या पत्रकार इन कठिन शर्तों के बीच ही काम करने का कोई नया रास्ता निकालेंगे।







