अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ‘टैरिफ कूटनीति’ (Tariff Diplomacy) और यूरोपीय संघ (EU) के बीच जारी यह व्यापारिक संघर्ष वर्तमान में वैश्विक राजनीति और अर्थशास्त्र का सबसे चर्चित विषय बना हुआ है। हालिया घटनाक्रमों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि जब 27 देशों का एक शक्तिशाली ब्लॉक एकजुट होता है, तो वह दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था के प्रमुख को भी अपनी नीतियों पर पुनर्विचार करने के लिए मजबूर कर सकता है।
ट्रंप की टैरिफ नीति और ‘ग्रीनलैंड’ विवाद
डोनाल्ड ट्रंप ने अपने दूसरे कार्यकाल में भी “अमेरिका फर्स्ट” (America First) की नीति को केंद्र में रखा है। इस बार उनका मुख्य हथियार ‘पारस्परिक टैरिफ’ (Reciprocal Tariffs) रहा है। विवाद की शुरुआत तब हुई जब ट्रंप ने एक बार फिर ग्रीनलैंड (Greenland) को खरीदने की इच्छा जताई।
- मुख्य मांग – ट्रंप ने डेनमार्क के स्वायत्त क्षेत्र ग्रीनलैंड को अमेरिका के लिए रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण बताया।
- दबाव की रणनीति – जब डेनमार्क और यूरोपीय संघ ने इस प्रस्ताव को खारिज कर दिया, तो ट्रंप ने व्यापार को हथियार बनाया।
- टैरिफ की घोषणा – जनवरी 2026 में, ट्रंप ने घोषणा की कि वे डेनमार्क, फ्रांस, जर्मनी, नीदरलैंड और स्वीडन सहित 8 प्रमुख यूरोपीय देशों पर 10% अतिरिक्त टैरिफ लगाएंगे। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि जून 2026 तक “ग्रीनलैंड डील” पर बात नहीं बनी, तो इसे बढ़ाकर 25% कर दिया जाएगा।
यूरोपीय संघ (EU) की एकजुटता – 27 देशों का ‘ट्रेड बैजूका’
यूरोपीय संघ की सबसे बड़ी ताकत उसकी एकल बाजार (Single Market) शक्ति है। जब ट्रंप ने चुनिंदा देशों को निशाना बनाया, तो यूरोपीय संघ ने इसे पूरे ब्लॉक पर हमला माना।
EU की जवाबी रणनीति
- टर्नबेरी समझौते (Turnberry Deal) को रोकना: जुलाई 2025 में ट्रंप और उर्सुला वॉन डेर लेयेन के बीच एक व्यापारिक समझौता हुआ था, जिसे EU संसद ने ट्रंप की धमकियों के बाद निलंबित कर दिया।
- एंटी-कोर्शन इंस्ट्रूमेंट (ACI): EU ने अपने सबसे शक्तिशाली आर्थिक हथियार ‘ACI’ को सक्रिय करने की धमकी दी। इसे ‘ट्रेड बैजूका’ कहा जाता है। इसके तहत EU अमेरिकी कंपनियों (जैसे Apple, Google और Netflix) पर प्रतिबंध लगा सकता है और $100 बिलियन से अधिक के अमेरिकी निर्यात पर जवाबी टैक्स थोप सकता है।
- सामूहिक प्रतिक्रिया: EU ने स्पष्ट किया कि वह अलग-अलग देशों के साथ द्विपक्षीय बातचीत नहीं करेगा, बल्कि 27 देश एक इकाई के रूप में जवाब देंगे।
ट्रंप का “पीछे हटना” या कूटनीतिक बदलाव?
वैश्विक मीडिया में इसे ट्रंप का ‘झुकना’ कहा जा रहा है, क्योंकि उन्होंने जनवरी 2026 के आसपास अपने कड़े रुख में कुछ नरमी के संकेत दिए।
समझौते के मुख्य बिंदु
- टैरिफ में कमी – ट्रंप प्रशासन ने 25% तक जाने वाली धमकी को फिलहाल टाल दिया और कुछ प्रमुख औद्योगिक वस्तुओं पर प्रस्तावित 10% टैरिफ को घटाकर या ‘सस्पेंड’ कर दिया।
- भारत और अन्य देशों का प्रभाव – इसी दौरान भारत के साथ भी EU की बड़ी डील (Mother of all deals) की खबरें आईं, जिससे अमेरिका पर दबाव बढ़ा कि वह यूरोप को चीन या भारत की तरफ अधिक झुकाव करने के लिए मजबूर न करे।
- आर्थिक वास्तविकता – विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप को अहसास हुआ कि यूरोप पर भारी टैरिफ लगाने से अमेरिकी उपभोक्ताओं के लिए भी कीमतें बढ़ेंगी (लगभग $1,300 प्रति परिवार सालाना बोझ), जो उनके घरेलू समर्थन को नुकसान पहुँचा सकता था।
आर्थिक और रणनीतिक प्रभाव (Analysis)
- व्यापार की मात्रा – EU और अमेरिका के बीच सालाना लगभग €1.1 ट्रिलियन का व्यापार होता है। टैरिफ युद्ध इसे 20% तक कम कर सकता था।
- मुद्रा बाजार – तनाव कम होने के बाद यूरो (Euro) में मजबूती देखी गई और अमेरिकी डॉलर की अस्थिरता कम हुई।
- NATO और सुरक्षा – व्यापारिक विवाद ने रक्षा सहयोग पर भी सवाल उठाए थे, लेकिन तनाव कम होने से NATO की एकता बनी रही।
भविष्य की राह – क्या यह स्थायी शांति है
यूरोपीय संघ ने यह साबित कर दिया है कि एकजुटता किसी भी आर्थिक दबाव का सामना कर सकती है। हालांकि, ट्रंप की कार्यशैली को देखते हुए यह कहना कठिन है कि यह विवाद पूरी तरह समाप्त हो गया है।
- EU की तैयारी – भविष्य में ऐसे झटकों से बचने के लिए यूरोप अब अमेरिकी गैस और तकनीक पर अपनी निर्भरता कम कर रहा है।
- अमेरिका की नीति – ट्रंप का लक्ष्य व्यापार घाटे को कम करना है, इसलिए वे ‘टैरिफ’ का उपयोग एक सौदेबाजी के चिप (Bargaining Chip) के रूप में करते रहेंगे।
ट्रंप की 10% टैरिफ की धमकी और फिर उस पर पीछे हटना या कमी करना यह दर्शाता है कि दुनिया अब ‘एकध्रुवीय’ नहीं रही। 27 देशों के संगठन ने अपनी सामूहिक शक्ति से यह संदेश दिया है कि आर्थिक संप्रभुता के साथ समझौता नहीं किया जाएगा। यह वैश्विक व्यापार के इतिहास में एक महत्वपूर्ण अध्याय है जहाँ ‘टैरिफ का डर’ एकजुटता के आगे कमजोर पड़ गया।







