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चैत्र नवरात्र पारिवारिक परंपरा- कुलदेवी पूजा पद्धति और पंचांग अनुसार व्रत का समापन पूजन और हवन से जुड़ी संपूर्ण जानकारी 

चैत्र नवरात्र पारिवारिक परंपरा- कुलदेवी पूजा पद्धति और पंचांग अनुसार व्रत का समापन पूजन और हवन से जुड़ी संपूर्ण जानकारी 
नवजोत कौर सिद्धू
On: मार्च 26, 2026 11:33 पूर्वाह्न
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चैत्र नवरात्रि हिंदुओं के प्रमुख त्योहारों में से एक है जो न केवल आध्यात्मिक शक्ति संचय का समय है बल्कि पारिवारिक परंपराओं और कुलदेवी के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने का भी पर्व है। 

​चैत्र नवरात्रि – आध्यात्मिक और पारिवारिक परंपराओं का संगम

चैत्र नवरात्रि का प्रारंभ हिंदू नववर्ष के प्रथम दिन (चैत्र शुक्ल प्रतिपदा) से होता है। इसे ‘वसन्त नवरात्रि’ भी कहा जाता है क्योंकि यह ऋतु परिवर्तन के संधि काल में आती है। इस समय प्रकृति पल्लवित होती है और शक्ति की उपासना के माध्यम से शरीर और मन को नई ऊर्जा दी जाती है।

​ पारिवारिक परंपराओं का महत्व

​भारत के हर क्षेत्र और हर परिवार में नवरात्रि मनाने के तरीके अलग-अलग हो सकते हैं लेकिन इनका मूल उद्देश्य एक ही है शक्ति की आराधना।

  • घटस्थापना (कलश स्थापना)-  परिवार के मुख्य सदस्य द्वारा शुभ मुहूर्त में घट स्थापना की जाती है। यह ब्रह्मांड और ब्रह्मांडीय ऊर्जा का प्रतीक है।
  • अखंड ज्योति –  कई परिवारों में नौ दिनों तक अखंड ज्योति प्रज्वलित रखने की परंपरा है, जो अंधकार पर प्रकाश की विजय और भक्ति की निरंतरता को दर्शाती है।
  • जौ (जवारे) बोना –  मिट्टी के पात्र में जौ बोए जाते हैं। इनकी वृद्धि को परिवार की सुख-समृद्धि का सूचक माना जाता है।

​कुलदेवी पूजा पद्धति और महत्व

​कुलदेवी का अर्थ है उस ‘कुल’ या वंश की रक्षा करने वाली देवी। किसी भी शुभ कार्य या नवरात्रि में कुलदेवी की पूजा अनिवार्य मानी गई है क्योंकि वे परिवार की आदि-शक्ति हैं।

पूजा की विधि

  • आह्वान –  सबसे पहले अपनी कुलदेवी का ध्यान कर उन्हें अपने घर में आमंत्रित करें।
  • शुद्धिकरण –  पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, शक्कर) से प्रतीक स्वरूप मूर्ति या चित्र का अभिषेक करें।
  • शृंगार –  कुलदेवी को चुनरी, चूड़ियाँ, सिंदूर और अन्य सुहाग सामग्री अर्पित करें।
  • भोग –  हर कुल की अपनी विशेष भोग परंपरा होती है (जैसे कहीं लापसी-पूरी, तो कहीं नारियल या हलवा)। अपनी परंपरा के अनुसार सात्विक भोग लगाएं।

​अष्टमी बनाम नवमी – पूजन के अलग-अलग दिन क्यों?

​अक्सर यह प्रश्न उठता है कि कुछ लोग अष्टमी (महाष्टमी) को पूजन करते हैं तो कुछ नवमी (महानवमी) को। इसके पीछे मुख्य रूप से पारिवारिक परंपरा (कुल की रीति) और धार्मिक मान्यताएं कार्य करती हैं

​अष्टमी पूजन की मान्यता (महाष्टमी)

  • मां महागौरी का दिन –  अष्टमी मां महागौरी को समर्पित है जो शांति और कल्याण की देवी हैं।
  • संधि पूजा का महत्व – अष्टमी के अंत और नवमी के प्रारंभ के समय ‘संधि पूजा’ की जाती है। माना जाता है कि इसी समय देवी दुर्गा ने चण्ड और मुण्ड नामक असुरों का वध किया था। कई परिवार इस ऊर्जावान समय को अपने पूजन के लिए श्रेष्ठ मानते हैं।
  • कुल की रीति –  जिन परिवारों में पूर्वजों के समय से अष्टमी को ‘कंजक’ खिलाने या हवन करने की परंपरा है वे इसे ही प्राथमिकता देते हैं।

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​नवमी पूजन की मान्यता (महानवमी)

  • मां सिद्धिदात्री का दिन –  नवमी मां सिद्धिदात्री की है जो सभी प्रकार की सिद्धियों को देने वाली हैं। साधकों के लिए यह साधना की पूर्णता का दिन है।
  • राम नवमी का संयोग –  चैत्र नवरात्रि की नवमी को भगवान श्री राम का जन्मोत्सव भी मनाया जाता है। इस कारण वैष्णव परंपरा को मानने वाले परिवार नवमी को ही पूर्ण आहुति और कन्या पूजन करना श्रेष्ठ समझते हैं।
  • पूर्णता का प्रतीक –  चूंकि नवरात्रि नौ रात्रियों का पर्व है इसलिए नौवीं तिथि को व्रत का समापन करना तर्कसंगत माना जाता है।

​पंचांग के अनुसार व्रत समापन –  हवन और पूजन विधि

​व्रत का वास्तविक फल तभी मिलता है जब उसका समापन शास्त्रोक्त विधि से किया जाए।

​हवन विधि (पूर्णाहूति)

​हवन वातावरण को शुद्ध करने और देवताओं तक हविष्य पहुँचाने का माध्यम है।

  • सामग्री –  आम की लकड़ी, कपूर, हवन सामग्री (जौ, तिल, गुड़, घी, चंदन चूरा), गूगल, और लौंग का जोड़ा।
  • प्रक्रिया –  ‘ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे’ मंत्र या दुर्गा सप्तशती के मंत्रों से आहुति दें। अंत में नारियल को लाल कपड़े में लपेटकर और घी भरकर ‘पूर्णाहूति’ दें।

​कन्या पूजन (कुमारी पूजन)

​2 से 10 वर्ष की कन्याओं को साक्षात देवी का रूप माना जाता है।

  • चरण प्रक्षालन –  कन्याओं के पैर धोकर उन्हें स्वच्छ आसन पर बिठाएं।
  • अर्चन – उन्हें कुमकुम का तिलक लगाएं और कलाई पर कलावा (मौली) बांधें।
  • भोज –  हलवा, पूरी और चने का सात्विक भोजन कराएं।
  • दक्षिणा –  उपहार और दक्षिणा देकर उनके चरण स्पर्श कर आशीर्वाद लें।

​पारण (व्रत खोलना)

​हवन और कन्या पूजन के बाद ही व्रत का पारण करना चाहिए। पंचांग के अनुसार जब नवमी तिथि समाप्त हो और दशमी तिथि का आगमन हो तब व्रत खोलना सबसे उत्तम माना जाता है। यदि नवमी का व्रत रखा है तो अगले दिन सुबह सूर्योदय के बाद पारण करें।

​चैत्र नवरात्रि केवल उपवास तक सीमित नहीं है यह अपनी जड़ों (कुलदेवी) से जुड़ने और भविष्य के लिए ऊर्जा संचय करने का पर्व है। चाहे आप अष्टमी को पूजें या नवमी को श्रद्धा और नियम का पालन ही सर्वोपरि है।

Pradeep Pandey

A versatile writer mainly works on politics, business, crime, current affairs and entertainment

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