इस्लामाबाद/वॉशिंगटन। पश्चिम एशिया में जारी तनाव के बीच एक बार फिर उम्मीद की किरण नजर आ रही है। ईरान और अमेरिका के बीच बातचीत की प्रक्रिया, जो हाल ही में ठहर सी गई थी, अब दोबारा शुरू हो सकती है। पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद एक बार फिर इस अहम कूटनीतिक पहल का केंद्र बन सकता है। खबर है कि अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व उपराष्ट्रपति जे.डी.वेंस कर सकते हैं, जो पहले दौर की वार्ता में भी सक्रिय भूमिका में थे।कुछ समय पहले जब इस्लामाबाद में दोनों देशों के नुमाइंदे मिले थे, तो वह बैठक लगभग 20 घंटे तक चली थी। कल्पना कीजिए, दो ऐसे देश जिनके बीच दशकों की कड़वाहट हो, उनके अधिकारी एक कमरे में बैठकर घंटों चाय की चुस्कियों के साथ तल्ख दलीलों का सामना कर रहे थे। उस वक्त खबरें आई थीं कि बातचीत बेनतीजा रही। लेकिन जानकारों का मानना है कि कूटनीति में ‘बेनतीजा’ जैसा कुछ नहीं होता। हर मुलाकात बर्फ पिघलाने का एक जरिया होती है।
परमाणु मुद्दा और होरमुज़ की वो पुरानी रार
लेकिन राह इतनी आसान भी नहीं है। ईरान का परमाणु कार्यक्रम आज भी वह जिन्न है जो बोतल में बंद होने का नाम नहीं ले रहा। अमेरिका चाहता है कि ईरान अपनी परमाणु महत्वाकांक्षाओं को ताले में बंद कर दे और चाबी उसे सौंप दे। वहीं ईरान का कहना है कि यह उसके आत्मसम्मान की बात है और वह अपनी तरक्की का रास्ता किसी के कहने पर नहीं रोकेगा।
इसके साथ ही ‘होरमुज़ जलडमरूमध्य’ वाला पेच भी फंसा हुआ है। यह समुद्र का वह छोटा सा रास्ता है जहाँ से पूरी दुनिया के तेल की सप्लाई होती है। ईरान यहाँ अपनी धाक कम नहीं करना चाहता, क्योंकि यही उसका सबसे बड़ा हथियार है। वहीं अमेरिका चाहता है कि यहाँ ‘खुली छूट’ रहे ताकि तेल के टैंकर बिना किसी डर के आ-जा सकें। इन दोनों भारी-भरकम मुद्दों के बीच रास्ता निकालना वेंस के लिए किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं होगा।
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2026 की वो कड़वी यादें और आज की मजबूरी
अगर हम याद करें, तो 2026 की शुरुआत में ऐसा लग रहा था कि बस अब तीसरा विश्व युद्ध शुरू ही होने वाला है। हमले हुए, धमकियाँ दी गईं और पूरी दुनिया की सांसें अटक गई थीं। तब जो युद्धविराम हुआ, वह किसी तरह आनन-फानन में किया गया था। लेकिन दोनों देश जानते हैं कि वे लंबे समय तक इस डर के साये में नहीं रह सकते।आज की तारीख में बातचीत करना इनकी मजबूरी भी है। जंग लड़ना महंगा पड़ता है और प्रतिबंधों ने ईरान की कमर तोड़ रखी है। वहीं अमेरिका भी अब मध्य-पूर्व के इन पुराने झगड़ों से पीछा छुड़ाकर अपने घर पर ध्यान देना चाहता है। यही वह ‘कॉमन ग्राउंड’ है जहाँ पर समझौते की उम्मीद जागती है।
पाकिस्तान: एक शांत मेजबान का किरदार
इस पूरी गहमागहमी में पाकिस्तान का रोल भी काफी दिलचस्प रहा है। अक्सर विवादों के केंद्र में रहने वाला इस्लामाबाद इस बार एक सुलझे हुए मेजबान की तरह पेश आ रहा है। यह एक ऐसी जगह है जहाँ दोनों पक्ष सहज महसूस करते हैं। पाकिस्तान ने बहुत ही शांति से, बिना ज्यादा ढिंढोरा पीटे, इन दोनों देशों को एक ही कमरे में लाने के लिए मेहनत की है। उसके लिए भी यह जरूरी है, क्योंकि पड़ोस में आग लगी हो तो आंच घर तक आती ही है।
वैश्विक बाजार और हमारी आपकी जेब
ईरान और अमेरिका की यह तकरार सिर्फ खबरों तक सीमित नहीं है। इसका सीधा असर हमारे और आपके किचन के बजट पर पड़ता है। जैसे ही तनाव बढ़ता है, पेट्रोल-डीजल के दाम भागने लगते हैं और शेयर बाजार धराशायी हो जाते हैं। जैसे ही इस्लामाबाद से इस बातचीत की खबर उड़ी, पूरी दुनिया के बाजारों ने राहत की सांस ली। लोग दुआ कर रहे हैं कि वेंस और ईरान के बीच की यह मुलाकात सफल हो, ताकि महंगाई के इस दौर में थोड़ी शांति मिले।
उम्मीद का दीया अभी जल रहा है
सच्चाई तो यह है कि अविश्वास की दीवार बहुत ऊंची है और इसे गिराना रातों-रात मुमकिन नहीं है। जेडी वेंस और ईरानी प्रतिनिधिमंडल के बीच होने वाली इस चर्चा में हार-जीत से ज्यादा जरूरी है ‘संवाद का जारी रहना’। राह कांटों भरी है, विरोध करने वाले भी बहुत हैं, लेकिन अगर नीयत साफ हो तो इस्लामाबाद की यह मेज इतिहास बदल सकती है। फिलहाल पूरी दुनिया की नजरें वेंस की उस उड़ान पर टिकी हैं जो वाशिंगटन से इस्लामाबाद के लिए होने वाली है।







