इवा स्क्लॉस 96 वर्ष की आयु में हुआ निधन-द्वितीय विश्व युद्ध और होलोकॉस्ट की विभीषिका को अपनी आंखों से देखने वाली और एनी फ्रैंक की सौतेली बहन के रूप में पहचानी जाने वाली इवा स्क्लॉस (Eva Schloss) का हाल ही में 96 वर्ष की आयु में निधन हो गया। उनका जीवन केवल एक त्रासदी की कहानी नहीं है, बल्कि वह मानवीय जिजीविषा साहस और शांति के प्रति अटूट प्रतिबद्धता का प्रतीक थीं।
प्रारंभिक जीवन और जन्म (1929 – 1938)
इवा स्क्लॉस जन्म नाम – इवा गेरिंगर का जन्म 11 मई 1929 को ऑस्ट्रिया की राजधानी वियना में हुआ था। वह एक मध्यमवर्गीय यहूदी परिवार में जन्मी थीं। उनके पिता एरिच गेरिंगर और माता फ्रित्जी थीं। इवा का बचपन वियना में बहुत ही सामान्य और खुशहाल बीत रहा था लेकिन यूरोप में नाजीवाद का उदय उनके जीवन को बदलने वाला था।
1938 में जब जर्मनी ने ऑस्ट्रिया पर अधिकार कर लिया (Anschluss) तो यहूदियों के खिलाफ उत्पीड़न बढ़ गया। इवा के परिवार को सुरक्षा की तलाश में ऑस्ट्रिया छोड़ना पड़ा।
एम्स्टर्डम पलायन और एनी फ्रैंक से मुलाकात
सुरक्षा की तलाश में उनका परिवार एम्स्टर्डम (नीदरलैंड) चला गया। यहीं पर उनका घर उसी अपार्टमेंट ब्लॉक में था जहाँ एनी फ्रैंक और उसका परिवार रहता था।
- दोस्ती – इवा और एनी लगभग एक ही उम्र की थीं। इवा ने बाद में अपनी यादों में बताया कि एनी एक बातूनी और चंचल लड़की थी जबकि इवा खुद थोड़ी शर्मीली और खेलकूद जैसे स्किपिंग और रोलर स्केटिंग में रुचि रखने वाली लड़की थीं।
- युद्ध की शुरुआत – 1940 में जब नाजियों ने नीदरलैंड पर कब्जा कर लिया तो यहूदियों के लिए स्थितियां भयावह हो गईं। 1942 में दोनों परिवारों को छिपने (Hiding) पर मजबूर होना पड़ा।
विश्वासघात और ऑशविट्ज़ का नरक
इवा का परिवार दो साल तक अलग-अलग जगहों पर छिपा रहा। लेकिन उनके अपने ही एक ‘डच’ मुखबिर के विश्वासघात के कारण मई 1944 में इवा के 15वें जन्मदिन पर गेस्टापो (नाजी पुलिस) ने उन्हें पकड़ लिया।
- यातना शिविर- उन्हें पोलैंड में स्थित कुख्यात ऑशविट्ज़-बिरकेनौ (Auschwitz-Birkenau) एकाग्रता शिविर में भेज दिया गया।
- नुकसान – शिविर में इवा और उनकी माँ तो जीवित बच गईं लेकिन उनके पिता एरिच और उनके भाई हाइन्ज़ की मृत्यु हो गई। हाइन्ज़ एक प्रतिभाशाली कलाकार और संगीतकार थे जिनकी कलाकृतियों को इवा ने जीवन भर सहेज कर रखा।
मुक्ति और एनी फ्रैंक के पिता से संबंध
जनवरी 1945 में सोवियत सेना ने ऑशविट्ज़ को आजाद कराया। इवा और उनकी माँ फ्रित्जी वापस एम्स्टर्डम लौटीं। वहाँ उनकी मुलाकात ऑटो फ्रैंक (एनी फ्रैंक के पिता) से हुई, जो अपने परिवार के एकमात्र जीवित सदस्य थे।
- एक नया परिवार – इस साझा त्रासदी ने दोनों परिवारों को करीब ला दिया। 1953 में इवा की माँ फ्रित्जी और ऑटो फ्रैंक ने शादी कर ली। इस तरह इवा आधिकारिक तौर पर एनी फ्रैंक की सौतेली बहन बन गईं।
विवाह और नया जीवन
युद्ध के बाद इवा ने अपनी पढ़ाई पूरी की और कला (Photography) में अपनी रुचि विकसित की। वह फोटोग्राफी सीखने के लिए इंग्लैंड चली गईं।
- शादी – 1952 में उन्होंने ज़वी स्क्लॉस से शादी की जो खुद एक शरणार्थी थे। वे लंदन में बस गए और उनकी तीन बेटियां हुईं।
- मौन के दशक – लगभग 40 वर्षों तक इवा ने अपने साथ हुए अत्याचारों के बारे में किसी से बात नहीं की। वह एक सामान्य गृहिणी और व्यवसायी के रूप में जीवन जीती रहीं।
एक लेखिका और शांति दूत के रूप में उदय
1980 के दशक के उत्तरार्ध में इवा ने अपनी चुप्पी तोड़ने का फैसला किया। उन्होंने महसूस किया कि दुनिया को होलोकॉस्ट की सच्चाइयां बताना जरूरी है ताकि इतिहास खुद को न दोहराए।
- प्रमुख पुस्तकें – उन्होंने ‘Eva’s Story’ (1988) और ‘After Auschwitz’ जैसी प्रसिद्ध पुस्तकें लिखीं।
- एनी फ्रैंक ट्रस्ट – उन्होंने ‘एनी फ्रैंक ट्रस्ट यूके’ की सह-स्थापना की, जिसका उद्देश्य पूर्वाग्रह और भेदभाव के खिलाफ लड़ना है।
- शिक्षा – उन्होंने दुनिया भर के स्कूलों और जेलों में जाकर हजारों व्याख्यान दिए, जहाँ वे सहिष्णुता और मानवता का संदेश देती थीं।
मृत्यु और विरासत (2026)
96 वर्ष की लंबी और प्रेरणादायक आयु में इवा स्क्लॉस का निधन हो गया। वह उन अंतिम जीवित गवाहों में से एक थीं जिन्होंने प्रलय (Holocaust) को प्रत्यक्ष देखा था।
उनकी विरासत के मुख्य बिंदु
- शिक्षा – उन्होंने युवाओं को सिखाया कि नफरत का अंत केवल विनाश होता है।
- कला – उन्होंने अपने भाई हाइन्ज़ की पेंटिंग्स को दुनिया के सामने प्रदर्शित किया, जिन्हें उन्होंने शिविर में जाने से पहले छिपा दिया था।
- न्याय – 2012 में उन्हें उनके मानवीय कार्यों के लिए ‘Member of the Order of the British Empire’ (MBE) से सम्मानित किया गया था।
इवा स्क्लॉस का जीवन उस अंधकार के खिलाफ एक जलती हुई मशाल की तरह था जिसने लाखों लोगों के जीवन को लील लिया था। एनी फ्रैंक की यादों को जीवित रखने और अपनी आपबीती से दुनिया को जगाने के लिए उन्हें हमेशा याद रखा जाएगा। उनका निधन एक युग का अंत है लेकिन उनके विचार और उनकी किताबें आने वाली पीढ़ियों को ‘कभी न भूलने’ (Never Forget) की प्रेरणा देती रहेंगी।
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