भारत में गिग इकोनॉमी (Gig Economy) एक बड़े बदलाव के दौर से गुजर रही है। केंद्र सरकार द्वारा सोशल सिक्योरिटी कोड 2020 के तहत नेशनल सोशल सिक्योरिटी बोर्ड (National Social Security Board) का गठन इस दिशा में एक क्रांतिकारी कदम है। यह न केवल डिलीवरी पार्टनर्स और फ्रीलांसर्स को एक पहचान देगा
बल्कि उन्हें वे अधिकार भी प्रदान करेगा जो अब तक केवल औपचारिक क्षेत्र (Formal Sector) के कर्मचारियों के लिए आरक्षित थे।
भारत में गिग वर्कर्स के लिए सामाजिक सुरक्षा का नया युग – नेशनल सोशल सिक्योरिटी बोर्ड
प्रस्तावना – गिग इकोनॉमी का उदय और चुनौतियां
पिछले एक दशक में भारत में स्मार्टफोन की पैठ और सस्ते डेटा ने एक नई कार्य संस्कृति को जन्म दिया है जिसे गिग इकोनॉमी कहा जाता है। ज़ोमैटो, स्विगी, ओला, उबर, अर्बन कंपनी और ब्लिंकिट जैसे प्लेटफॉर्म्स ने लाखों युवाओं को रोजगार दिया। हालांकि इन श्रमिकों को अब तक स्वतंत्र ठेकेदार या बिजनेस पार्टनर माना जाता था।
इसका अर्थ यह था कि उन्हें न्यूनतम वेतन, स्वास्थ्य बीमा, भविष्य निधि (PF) और पेंशन जैसी बुनियादी सुविधाओं से वंचित रखा गया था। लेकिन भारत सरकार का नया कदम इस परिभाषा को बदलकर उन्हें वर्कर का औपचारिक दर्जा देने जा रहा है।
नेशनल सोशल सिक्योरिटी बोर्ड (NSSB) क्या है?
सोशल सिक्योरिटी कोड 2020 के प्रावधानों के अनुसार केंद्र सरकार एक राष्ट्रीय बोर्ड का गठन कर रही है। यह बोर्ड विशेष रूप से गिग और प्लेटफॉर्म वर्कर्स के कल्याण के लिए नीतियां बनाने और उनके कार्यान्वयन की निगरानी करने के लिए जिम्मेदार होगा।
बोर्ड की संरचना
- अध्यक्ष – केंद्रीय श्रम एवं रोजगार मंत्री।
- सदस्य – केंद्र और राज्य सरकारों के प्रतिनिधि, गिग वर्कर्स के प्रतिनिधि, प्लेटफॉर्म कंपनियों (Aggregators) के प्रतिनिधि और नागरिक समाज के सदस्य।
प्रमुख लाभ और सुविधाएं
बोर्ड के गठन के बाद पंजीकृत गिग वर्कर्स को निम्नलिखित लाभ मिलने की संभावना है
- स्वास्थ्य देखभाल (Health Care)
अब तक यदि कोई डिलीवरी पार्टनर दुर्घटना का शिकार होता था तो इलाज का सारा खर्च उसे स्वयं उठाना पड़ता था। नए बोर्ड के तहत, उन्हें ESIC कर्मचारी राज्य बीमा निगम जैसी स्वास्थ्य सेवाओं से जोड़ा जाएगा।
- बीमा सुरक्षा (Insurance)
गिग वर्कर्स के लिए जीवन बीमा और दुर्घटना बीमा अनिवार्य किया जाएगा। यह सुनिश्चित करेगा कि कार्य के दौरान किसी अनहोनी की स्थिति में उनके परिवार को वित्तीय सहायता मिले।
- भविष्य निधि और पेंशन (PF & Pension)
पहली बार फ्रीलांसर्स और प्लेटफॉर्म वर्कर्स के लिए एक संचयी कोष बनाया जाएगा जिसमें प्लेटफॉर्म कंपनियां और सरकार योगदान देगी। यह उनके रिटायरमेंट के बाद की वित्तीय सुरक्षा सुनिश्चित करेगा।
- मैटरनिटी और फैमिली वेलफेयर
महिला गिग वर्कर्स को मातृत्व लाभ (Maternity Benefits) और परिवार कल्याण योजनाओं का लाभ मिलेगा जो अब तक इस क्षेत्र में पूरी तरह अनुपस्थित था।
बिजनेस पार्टनर से वर्कर तक का सफर – एक कानूनी बदलाव
अब तक कंपनियां इन श्रमिकों को कर्मचारी नहीं मानती थीं ताकि उन्हें ग्रेच्युटी या बोनस न देना पड़े। सोशल सिक्योरिटी कोड के तहत उन्हें गिग वर्कर और प्लेटफॉर्म वर्कर के रूप में परिभाषित किया गया है। यह कानूनी मान्यता उन्हें श्रम अदालतों में अपनी शिकायतें ले जाने और शोषण के खिलाफ आवाज उठाने की शक्ति देती है।
फंडिंग का मॉडल – पैसा कहां से आएगा?
एक सबसे बड़ा सवाल यह है कि इन योजनाओं के लिए पैसा कौन देगा? सरकार ने इसके लिए एक सोशल सिक्योरिटी फंड का प्रस्ताव दिया है
- एग्रीगेटर्स का योगदान – ओला, उबर और ज़ोमैटो जैसी कंपनियों को अपने वार्षिक टर्नओवर का 1% से 2% हिस्सा इस फंड में देना होगा।
- सरकारी अनुदान – केंद्र और राज्य सरकारें भी बजट के माध्यम से इसमें योगदान दे सकती हैं।
- श्रमिकों का योगदान – कुछ योजनाओं के लिए श्रमिकों से बहुत मामूली प्रीमियम लिया जा सकता है।
गिग वर्कर्स के लिए रजिस्ट्रेशन प्रक्रिया (e-Shram Portal)
इन लाभों को प्राप्त करने के लिए हर गिग वर्कर को e-Shram पोर्टल पर पंजीकरण करना अनिवार्य होगा। यह एक डिजिटल पहचान पत्र के रूप में कार्य करेगा जिससे सरकार सीधे उनके बैंक खातों में लाभ (DBT) पहुंचा सकेगी।
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चुनौतियां और भविष्य की राह
यद्यपि यह एक सराहनीय कदम है लेकिन इसके क्रियान्वयन में कुछ चुनौतियां भी हैं
- डेटा का अभाव – भारत में गिग वर्कर्स की सटीक संख्या का पता लगाना मुश्किल है क्योंकि यह एक अस्थिर कार्यबल है।
- कंपनियों का विरोध – एग्रीगेटर्स अतिरिक्त वित्तीय बोझ के कारण इसका विरोध कर सकते हैं जिससे सेवाओं की कीमतें बढ़ सकती हैं।
- जागरूकता – दूर-दराज के इलाकों में काम करने वाले फ्रीलांसर्स तक इन योजनाओं की जानकारी पहुंचाना एक बड़ी चुनौती है।
नेशनल सोशल सिक्योरिटी बोर्ड का गठन भारत के श्रम इतिहास में एक मील का पत्थर है। यह न केवल ईज ऑफ डूइंग बिजनेस बल्कि ईज ऑफ लिविंग को भी बढ़ावा देगा।
जब एक डिलीवरी पार्टनर या फ्रीलांसर सुरक्षित महसूस करेगा तो वह देश की अर्थव्यवस्था में और अधिक प्रभावी ढंग से योगदान दे पाएगा।
भारत इस मामले में वैश्विक स्तर पर एक उदाहरण पेश कर सकता है जहां तकनीक और मानवाधिकारों का संतुलन बना रहे।







