डेलीबार्ता, विशेष।जब जिंदगी इंसान से सब कुछ छीन लेने पर आमादा हो जाए, तब असली परीक्षा होती है हौसलों की। कोई उस मोड़ पर टूट जाता है, तो कोई वहीं से नई शुरुआत करता है। हरि बुद्ध मगर उन्हीं चुनिंदा लोगों में से हैं, जिन्होंने अपनी सबसे बड़ी कमजोरी को ही अपनी ताकत बना लिया। दोनों पैर खोने के बाद भी उन्होंने दुनिया की सबसे ऊंची चोटियों को फतह कर यह साबित कर दिया कि सपनों को उड़ान देने के लिए पैरों से ज्यादा मजबूत इरादों की जरूरत होती है।
हरि बुद्ध मगर की कहानी सिर्फ पर्वतारोहण की नहीं है, यह जज्बे, आत्मविश्वास और कभी हार न मानने वाले साहस की कहानी है। उनकी उपलब्धि ने न सिर्फ पर्वतारोहण की दुनिया में नया इतिहास रचा, बल्कि लाखों दिव्यांग और संघर्ष कर रहे लोगों के लिए उम्मीद की एक नई किरण भी जगाई।
नेपाल के साधारण परिवार से असाधारण मुकाम तक
हरि बुद्ध मगर का जन्म नेपाल में हुआ। पहाड़ों से घिरे देश में जन्मे हरि का बचपन साधारण था, लेकिन मन में कुछ कर गुजरने की चाह शुरू से ही थी। नेपाल में गोरखाओं की वीरता की कहानियां हर बच्चे के कानों में बचपन से ही पड़ती हैं और हरि भी उन्हीं कहानियों से प्रेरित थे। यही वजह रही कि उन्होंने ब्रिटिश आर्मी की प्रतिष्ठित गोरखा रेजिमेंट में भर्ती होकर देश और सेना की सेवा करने का सपना पूरा किया।
ब्रिटिश आर्मी की गोरखा रेजिमेंट में सेवा
हरि बुद्ध मगर ने ब्रिटिश आर्मी की गोरखा रेजिमेंट में बतौर सैनिक सेवा दी। यह रेजिमेंट अपनी बहादुरी, अनुशासन और कठिन हालात में भी डटे रहने के लिए पूरी दुनिया में जानी जाती है। सेना में रहते हुए हरि ने कई कठिन प्रशिक्षण और अभियानों में हिस्सा लिया। वे एक अनुशासित, मेहनती और जिम्मेदार सैनिक थे, जिनका भविष्य सेना में उज्ज्वल माना जा रहा था।
अफगानिस्तान में हुआ दर्दनाक हादसा
साल 2010 में हरि बुद्ध मगर अफगानिस्तान में तैनात थे। इसी दौरान एक आईईडी (इम्प्रोवाइज्ड एक्सप्लोसिव डिवाइस) विस्फोट हुआ, जिसने उनकी जिंदगी को हमेशा के लिए बदल दिया। इस विस्फोट में उनके दोनों पैर घुटनों के ऊपर से बुरी तरह घायल हो गए, जिसके बाद डॉक्टरों को उन्हें काटना पड़ा।
यह हादसा सिर्फ शारीरिक नहीं था, बल्कि मानसिक रूप से भी किसी के लिए बेहद बड़ा झटका हो सकता था। एक सैनिक, जिसकी जिंदगी दौड़ने, मार्च करने और युद्धभूमि में सक्रिय रहने पर आधारित हो, उसके लिए दोनों पैर खो देना किसी अंत से कम नहीं था।
हार मानने से इनकार और नई शुरुआत
हादसे के बाद हरि बुद्ध मगर को लंबे समय तक इलाज और रिहैबिलिटेशन से गुजरना पड़ा। अस्पताल के बिस्तर पर पड़े हुए उन्होंने कई बार दर्द, निराशा और अकेलेपन का सामना किया। लेकिन इन्हीं पलों में उन्होंने एक अहम फैसला लिया लेकिन वे खुद को कमजोर नहीं मानेंगे।
जहां कई लोग ऐसी स्थिति में खुद को दुनिया से अलग कर लेते हैं, वहीं हरि ने अपनी सोच को बदल लिया। उन्होंने तय किया कि वे अपनी पहचान हादसे से नहीं, बल्कि अपनी उपलब्धियों से बनाएंगे।
नामुमकिन दिखने वाला सपना, सबसे ऊंची चोटियों पर चढ़ाई
इलाज के दौरान ही हरि बुद्ध मगर के मन में एक ऐसा सपना जन्मा, जिसे सुनकर लोग हैरान रह जाते थे। उन्होंने तय किया कि वे दुनिया की सबसे ऊंची चोटियों पर चढ़ाई करेंगे। बिना पैरों के पर्वतारोहण करना अपने आप में एक असंभव-सा विचार था, लेकिन हरि के लिए यही सपना अब जिंदगी का मकसद बन चुका था।
उन्होंने यह भी महसूस किया कि पर्वतारोहण के जरिए वे न सिर्फ खुद को साबित कर सकते हैं, बल्कि दुनिया भर के दिव्यांग लोगों को यह संदेश भी दे सकते हैं कि शारीरिक सीमाएं इंसान की उड़ान को नहीं रोक सकतीं।
आर्टिफिशियल पैरों के सहारे कठिन ट्रेनिंग
हरि बुद्ध मगर ने आर्टिफिशियल पैरों (प्रोस्थेटिक लेग्स) के सहारे दोबारा चलना सीखा। यह प्रक्रिया बेहद दर्दनाक और चुनौतीपूर्ण थी। हर कदम पर संतुलन बनाना, बर्फ पर पकड़ बनाना और ऊंचाई पर शरीर को ढालना उनके लिए सामान्य पर्वतारोहियों से कहीं ज्यादा मुश्किल था।
उन्होंने महीनों तक कड़ी ट्रेनिंग की। जिम में पसीना बहाया, पहाड़ी इलाकों में अभ्यास किया और मानसिक रूप से खुद को हर चुनौती के लिए तैयार किया। कई बार प्रोस्थेटिक पैर टूट जाते थे, कई बार शरीर जवाब देने लगता था, लेकिन हरि ने हार नहीं मानी।
2018 में माउंट एवरेस्ट फतह कर रचा इतिहास
साल 2018 में हरि बुद्ध मगर ने वह कर दिखाया, जो दुनिया के लिए अकल्पनीय था। उन्होंने माउंट एवरेस्ट पर सफलतापूर्वक चढ़ाई कर इतिहास रच दिया। वे दुनिया के पहले ऐसे डबल अम्प्यूटी (दोनों पैर खो चुके) पर्वतारोही बने, जिन्होंने माउंट एवरेस्ट फतह किया।
एवरेस्ट की चढ़ाई अपने आप में किसी भी इंसान के लिए बेहद खतरनाक होती है। -40 डिग्री तक गिरता तापमान, तेज बर्फीली हवाएं, ऑक्सीजन की भारी कमी और हर कदम पर जान का जोखिम इन हालातों में हरि का हौसला पर्वत से भी ऊंचा नजर आया।
सातों महाद्वीपों की सबसे ऊंची चोटियों पर चढ़ाई
माउंट एवरेस्ट फतह करने के बाद हरि बुद्ध मगर यहीं नहीं रुके। उन्होंने ‘सेवन समिट्स’ यानी सातों महाद्वीपों की सबसे ऊंची चोटियों पर चढ़ाई करने का लक्ष्य रखा और उसे पूरा भी किया।
उन्होंने एशिया में माउंट एवरेस्ट, यूरोप में माउंट एल्ब्रुस,अफ्रीका में माउंट किलिमंजारो,उत्तरी अमेरिका में डेनाली,दक्षिणी अमेरिका में अकोंकागुआ,ऑस्ट्रेलिया में माउंट कोसियुस्को और अंटार्कटिका में माउंट विनसन पर सफल चढ़ाई की।
यह उपलब्धि उन्हें दुनिया के सबसे प्रेरणादायक पर्वतारोहियों की सूची में शामिल करती है।
दुनिया को मिला साहस और प्रेरणा का संदेश
हरि बुद्ध मगर की कहानी सिर्फ एक व्यक्ति की जीत नहीं है। यह उन लाखों लोगों के लिए प्रेरणा है, जो किसी न किसी तरह की शारीरिक या मानसिक चुनौती से जूझ रहे हैं। उन्होंने यह साबित कर दिया कि असली लड़ाई शरीर से नहीं, दिमाग और दिल से लड़ी जाती है।
उनकी सफलता ने समाज में दिव्यांगता को देखने के नजरिए को भी बदलने में मदद की। वे आज दुनियाभर में मोटिवेशनल स्पीकर के तौर पर लोगों को हौसला देते हैं और बताते हैं कि सीमाएं अक्सर हमारे दिमाग में होती हैं।
सम्मान और पहचान-हरि बुद्ध मगर को उनकी असाधारण उपलब्धियों के लिए कई अंतरराष्ट्रीय मंचों पर सम्मानित किया गया है। मीडिया, खेल जगत और सामाजिक संगठनों ने उनकी कहानी को सलाम किया है। वे आज न सिर्फ एक पर्वतारोही हैं, बल्कि एक जीवंत मिसाल हैं कि इंसान अगर ठान ले, तो हालात चाहे जैसे भी हों, वह इतिहास रच सकता है।
यह हौसलों की जीत-हरि बुद्ध मगर की जिंदगी यह सिखाती है कि गिरने के बाद उठना ही असली जीत होती है। जिन पैरों के बिना चलना भी मुश्किल माना जाता है, उन्हीं के बिना उन्होंने दुनिया की सबसे ऊंची चोटियों को झुका दिया। उनका सफर बताता है कि सपने देखने और उन्हें पूरा करने के लिए शरीर नहीं, मजबूत इरादे चाहिए।
हरि बुद्ध मगर आज सिर्फ एक नाम नहीं, बल्कि हौसले, साहस और आत्मविश्वास की पहचान बन चुके हैं।
जोड़ों में है अगर दर्द तो सरसों के तेल में मिले लहसुन बनेगा चमत्कारी तेल देगा आराम







