पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 में मिली करारी हार के बाद अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस (TMC) इस समय अपने इतिहास के सबसे भीषण राजनीतिक संकट से गुजर रही है। पार्टी के भीतर असंतोष की आग इस कदर भड़क चुकी है कि केवल चार दिनों के भीतर तृणमूल कांग्रेस के तीन दिग्गज राज्यसभा सांसदों ने अपने पदों से इस्तीफा दे दिया है। संसद के उच्च सदन से सुखेंदु शेखर राय और सुष्मिता देव के इस्तीफे के बाद अब प्रकाश चिक बराइक ने भी राज्यसभा की सदस्यता से त्यागपत्र दे दिया है।
इस सिलसिलेवार बगावत ने ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली टीएमसी को पूरी तरह झकझोर कर रख दिया है। इन तीन बड़े झटकों के बाद उच्च सदन (राज्यसभा) में तृणमूल कांग्रेस के सांसदों की संख्या घटकर अब मात्र 10 रह गई है। यह गिरावट सिर्फ एक संख्यात्मक नुकसान नहीं है बल्कि यह इस बात का स्पष्ट संकेत है कि ममता बनर्जी का अपनी पार्टी और जनप्रतिनिधियों पर से नियंत्रण तेजी से कमजोर हो रहा है।
संकट की शुरुआत- सुखेंदु शेखर राय का पहला प्रहार
टीएमसी में इस्तीफों के इस सिलसिले की शुरुआत पार्टी के वरिष्ठतम नेताओं में से एक सुखेंदु शेखर राय के इस्तीफे से हुई। उन्होंने सोमवार को राज्यसभा और पार्टी की प्राथमिक सदस्यता, दोनों से इस्तीफा देकर सबको चौंका दिया।
”मैंने सिद्धांत के तहत यह कदम उठाया है। पश्चिम बंगाल की जनता ने भ्रष्टाचार, महिलाओं पर अत्याचार और अराजकता के खिलाफ जनादेश दिया है। ऐसे माहौल में पार्टी के साथ बने रहना अब मुमकिन नहीं था।”
सुखेंदु शेखर राय, पूर्व राज्यसभा सांसद
राय ने ममता बनर्जी सरकार के पिछले 15 वर्षों के शासन को “अराजक शासन” करार दिया। उन्होंने कोलकाता के आर.जी. कर मेडिकल कॉलेज की घटना का भी हवाला दिया और कहा कि पार्टी में आत्ममंथन की कमी के कारण यह पतन हुआ है।
सुष्मिता देव का दूसरा झटका और असम का समीकरण
सुखेंदु शेखर राय के इस्तीफे के ठीक दो दिन बाद बुधवार को टीएमसी की तेजतर्रार नेता सुष्मिता देव ने भी राज्यसभा और पार्टी को अलविदा कह दिया। कांग्रेस छोड़कर टीएमसी में शामिल हुईं सुष्मिता देव असम और उत्तर-पूर्व में टीएमसी के विस्तार का मुख्य चेहरा थीं।
इस्तीफे के तुरंत बाद सुष्मिता देव ने असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा से मुलाकात की जिसने उनके अगले राजनीतिक कदम की ओर साफ इशारा कर दिया है। सुष्मिता का कहना था कि वह टीएमसी में रहकर अपने राज्य के लोगों की उम्मीदों को पूरा नहीं कर पा रही थीं क्योंकि पार्टी के पास राष्ट्रीय स्तर पर कोई स्पष्ट रोडमैप नहीं बचा है।
प्रकाश चिक बराइक- चार दिन में तीसरा बड़ा विकेट
पार्टी अभी इन दो बड़े झटकों से उबर भी नहीं पाई थी कि गुरुवार को राज्यसभा सांसद प्रकाश चिक बराइक ने भी अपना इस्तीफा सौंपने की घोषणा कर दी। प्रकाश चिक बराइक का जाना उत्तर बंगाल के चाय बागान क्षेत्रों में टीएमसी के सांगठनिक ढांचे के लिए एक बहुत बड़ा नुकसान माना जा रहा है। मात्र 4 दिनों के भीतर तीसरे सांसद के इस इस्तीफे ने साबित कर दिया है कि टीएमसी के भीतर बगावत की लहर अब रुकने वाली नहीं है।
टीएमसी में इस महा-विद्रोह के मुख्य कारण
तृणमूल कांग्रेस के इस आंतरिक बिखराव के पीछे कई गहरे कारण जिम्मेदार हैं-
- 2026 विधानसभा चुनाव में करारी हार- हाल ही में संपन्न हुए विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने 208 सीटें जीतकर पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई है। इस हार ने टीएमसी के नेताओं का मनोबल तोड़ दिया है।
- अभिषेक बनर्जी के नेतृत्व पर सवाल- पार्टी के भीतर अंदरूनी सूत्रों का मानना है कि यह विद्रोह परोक्ष रूप से अभिषेक बनर्जी के बढ़ते प्रभाव और उनके काम करने के तौर-तरीकों के खिलाफ है। असंतुष्ट गुट इसे अनौपचारिक रूप से ‘ऑपरेशन क्राउन प्रिंस’ के खिलाफ लड़ाई कह रहा है।
- भ्रष्टाचार और नीतिगत विफलता- इस्तीफा देने वाले नेताओं ने खुले तौर पर स्वीकार किया है कि शिक्षा, स्वास्थ्य और कानून-व्यवस्था के मोर्चे पर पार्टी की साख पूरी तरह खत्म हो चुकी थी।
- अस्तित्व की लड़ाई- सत्ता जाने के बाद सांसदों और विधायकों को अपना राजनीतिक भविष्य दांव पर दिखाई दे रहा है। विकास कार्यों के लिए वे केंद्र की सत्ताधारी व्यवस्था के साथ तालमेल बिठाना बेहतर समझ रहे हैं।
लोकसभा और विधानसभा में भी बगावत की गूंज
यह संकट केवल राज्यसभा तक सीमित नहीं है। पश्चिम बंगाल विधानसभा में टीएमसी के 80 विधायकों में से 58 विधायकों ने ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व में पहले ही अपना अलग गुट बना लिया है जिसे सदन में मुख्य विपक्षी दल के रूप में मान्यता भी मिल चुकी है।
वहीं दूसरी ओर लोकसभा में भी काकोली घोष दस्तदार के नेतृत्व में लगभग 19 से 20 सांसदों के बागी होने की खबरें हैं। इन बागी लोकसभा सांसदों में सायोनी घोष, शताब्दी रॉय और यूसुफ पठान जैसे बड़े नाम शामिल बताए जा रहे हैं जो लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को पत्र लिखकर खुद को टीएमसी से अलग एक स्वतंत्र ब्लॉक के रूप में मान्यता देने की मांग कर सकते हैं।
ममता बनर्जी के राजनीतिक जीवन का यह सबसे कठिन दौर है। चार दिनों में तीन राज्यसभा सांसदों का इस्तीफा और कुल संख्या का घटकर 10 रह जाना यह दर्शाता है कि टीएमसी का राष्ट्रीय और प्रांतीय ढांचा बिखर रहा है। यदि ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी ने इस आंतरिक असंतोष और ‘ऑपरेशन क्राउन प्रिंस’ के खिलाफ उठती आवाजों को तुरंत शांत नहीं किया तो संसद से लेकर सड़क तक तृणमूल कांग्रेस का अस्तित्व पूरी तरह खतरे में पड़ सकता है।







