भारतीय हॉकी के दिग्गज गोलकीपर रहे और पूर्व कप्तान पीआर श्रीजेश ने जूनियर पुरुष हॉकी टीम के कोच पद से अलग किए जाने के बाद हॉकी इंडिया पर कई तीखे सवाल खड़े कर दिए हैं। अपने भावुक बयान में श्रीजेश ने कहा कि उन्हें इसलिए हटाया गया क्योंकि जूनियर टीम के लिए एक विदेशी कोच लाया जा रहा है। उनके इस बयान के बाद भारतीय हॉकी में नया विवाद शुरू हो गया है।दो बार ओलंपिक पदक जीतने वाली भारतीय टीम के अहम सदस्य रहे श्रीजेश ने सोशल मीडिया पर लंबा पोस्ट लिखते हुए अपनी नाराजगी जाहिर की। उन्होंने कहा कि उन्होंने हमेशा देखा है कि खराब प्रदर्शन के बाद कोच बदले जाते हैं, लेकिन शायद यह पहली बार है जब लगातार सफलता मिलने के बावजूद किसी भारतीय कोच को हटाया जा रहा है,श्रीजेश के दावों में दम इसलिए भी नजर आता है क्योंकि उनके छोटे से कार्यकाल में भारतीय जूनियर टीम ने शानदार परिणाम दिए।
टीम ने जूनियर एशिया कप में अपना दबदबा बनाया और एफआईएच जूनियर विश्व कप में भी अपनी चमक बिखेरी। युवा खिलाड़ियों ने न केवल पदक जीते, बल्कि खेल की गुणवत्ता में भी सुधार दिखाया। खिलाड़ियों का कहना था कि श्रीजेश के अनुभव से उन्हें मानसिक मजबूती मिली।बावजूद इसके, हॉकी इंडिया ने उनका अनुबंध आगे नहीं बढ़ाने का फैसला किया। श्रीजेश का दर्द यही है कि जब नतीजे पक्ष में थे और खिलाड़ी उनके साथ सहज थे, तो फिर बदलाव की जरूरत क्यों पड़ी? उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि उन्हें यह महसूस कराया गया कि संघ किसी विदेशी चेहरे की तलाश में है।
विदेशी कोच का दबाव और ‘सिस्टम’ की दुहाई
श्रीजेश ने अपने बयान में एक और गंभीर खुलासा किया। उन्होंने बताया कि उन्हें जानकारी मिली थी कि भारतीय सीनियर टीम के मुख्य कोच क्रेग फुल्टन चाहते हैं कि जूनियर टीम की कमान भी किसी विदेशी के हाथ में हो। इसके पीछे तर्क यह दिया गया कि जूनियर और सीनियर दोनों टीमों की खेल शैली और रणनीति एक जैसी होनी चाहिए।खेल विशेषज्ञों का मानना है कि ‘यूनिफॉर्म सिस्टम’ के नाम पर भारतीय कोचों को किनारे करना एक पुरानी परिपाटी रही है। श्रीजेश ने इसी मानसिकता पर चोट करते हुए कहा कि यदि भारतीय खिलाड़ी मैदान पर विदेशी रणनीतियों को लागू कर सकते हैं, तो क्या भारतीय कोच उसी रणनीति को सिखाने में सक्षम नहीं हैं?
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हॉकी इंडिया ने आरोपों को किया खारिज
जब हंगामा बढ़ा तो हॉकी इंडिया के अध्यक्ष दिलीप तिर्की को सामने आना पड़ा। उन्होंने कहा कि श्रीजेश को निकाला नहीं गया, बस उनका कॉन्ट्रैक्ट खत्म हो गया था। तिर्की ने ये भी दावा किया कि श्रीजेश को कोई और बड़ी जिम्मेदारी दी जा रही थी, जिसे उन्होंने ठुकरा दिया। लेकिन खेल के जानकार कहते हैं कि ये सिर्फ बात घुमाने का तरीका है। अगर कोई कोच नतीजे दे रहा है, तो उसका कॉन्ट्रैक्ट रिन्यू करना एक आम बात है, लेकिन यहाँ मंशा कुछ और ही लग रही है।
खेल मंत्री की बात और जमीनी हकीकत
श्रीजेश ने अपनी बात को मजबूती देने के लिए केंद्रीय खेल मंत्री मनसुख मांडविया के साथ हुई बातचीत का भी हवाला दिया। उन्होंने बताया कि कुछ समय पहले खेल मंत्री ने उनसे व्यक्तिगत तौर पर कहा था कि देश को भविष्य के ओलंपिक अभियानों के लिए उनके जैसे अनुभवी कोचों की सख्त जरूरत है। श्रीजेश का कहना है कि एक तरफ सरकार और देश उन पर भरोसा जता रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ खेल संघ उन्हें काम करने का पूरा मौका नहीं दे रहा है।

भारतीय हॉकी के लिए आगे की चुनौती
भारतीय हॉकी अभी एक अच्छे दौर से गुजर रही है। लगातार दो ओलंपिक पदक जीतने के बाद खेल के प्रति लोगों का नजरिया बदला है। ऐसे में किसी बड़े खिलाड़ी का इस तरह से नाराज होकर जाना खेल की छवि को नुकसान पहुंचा सकता है।हॉकी इंडिया के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती जूनियर टीम के नए कोच की नियुक्ति है। यदि संघ किसी विदेशी कोच को नियुक्त करता है, तो श्रीजेश के आरोपों को और मजबूती मिलेगी। वहीं, अगर किसी भारतीय को मौका दिया जाता है, तो यह देखना होगा कि उसे कितनी स्वतंत्रता दी जाती है।
पीआर श्रीजेश का यह कदम भारतीय खेल प्रशासन में ‘कोचिंग कल्चर’ को बदलने की एक शुरुआत हो सकता है। क्या भारत को हमेशा विदेशी कोचों के सहारे ही रहना पड़ेगा? या फिर हम अपने घर के नायकों को अपनी ही टीम को तराशने का मौका देंगे? पीआर श्रीजेश ने जो आग लगाई है, वह आसानी से बुझने वाली नहीं है। यह बहस अब केवल हॉकी तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि क्रिकेट से लेकर फुटबॉल तक हर उस खेल में पहुँचेगी जहाँ ‘देसी बनाम विदेशी’ का द्वंद्व चलता रहता है। श्रीजेश ने जो पूछा है, वह हर भारतीय कोच का सवाल है— “आखिर कब तक हम अपने घर में ही पराया महसूस करेंगे?”







