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Who Created Mathematics – कैसे हुआ शून्य बीजगणित और त्रिकोणमिति का आविष्कार 

Who Created Mathematics - कैसे हुआ शून्य बीजगणित और त्रिकोणमिति का आविष्कार 
नवजोत कौर सिद्धू
On: फ़रवरी 21, 2026 7:38 अपराह्न
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भारतीय गणित और विज्ञान का इतिहास अत्यंत गौरवशाली रहा है। जब दुनिया गणना के प्राथमिक चरणों में थी, तब भारतीय ऋषियों और गणितज्ञों ने ब्रह्मांड की अनंतता को मापने के लिए शून्य, बीजगणित और त्रिकोणमिति जैसे स्तंभों की नींव रखी थी।

शून्य (Zero) – मानवता का सबसे बड़ा आविष्कार

शून्य का आविष्कार मात्र एक ‘अंक’ की खोज नहीं थी, बल्कि यह मानव चेतना में ‘रिक्तता’ (Void) को एक गणितीय मूल्य देने की क्रांति थी।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और दर्शन

शून्य की अवधारणा भारत के दार्शनिक सिद्धांतों से निकली है। बौद्ध और हिंदू दर्शन में ‘शून्य’ का अर्थ है वह अवस्था जहाँ कुछ भी नहीं है, फिर भी सब कुछ वहीं से उत्पन्न होता है। गणितीय रूप में इसे पहली बार व्यवस्थित करने का श्रेय महान गणितज्ञों को जाता है।

  • पिंगल (200 ईसा पूर्व) – उनके ग्रंथ ‘छंदशास्त्र’ में द्विआधारी (Binary) प्रणाली के संकेत मिलते हैं, जहाँ शून्य का उपयोग गणना को सरल बनाने के लिए किया गया था।
  • ब्रह्मगुप्त (7वीं शताब्दी) –  इन्होंने अपने ग्रंथ ‘ब्रह्मस्फुटसिद्धांत’ में शून्य के साथ जोड़, घटाव, गुणा और भाग के नियम पहली बार लिखित रूप में दिए।

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शून्य (Zero)के गणितीय गुण-

  • ब्रह्मगुप्त ने स्पष्ट किया कि
  • किसी संख्या में से वही संख्या घटाने पर शून्य प्राप्त होता है।
  • शून्य को किसी भी संख्या में जोड़ने या घटाने पर परिणाम अपरिवर्तित रहता है।
  • शून्य से गुणा करने पर परिणाम शून्य होता है।

महत्वपूर्ण तथ्य –  ग्वालियर के किले के एक मंदिर (चतुर्भुज मंदिर) की दीवार पर शून्य का सबसे पुराना लिखित प्रमाण मिलता है, जो 9वीं शताब्दी का है। यहाँ संख्या ‘270’ में शून्य को एक छोटे गोले के रूप में दर्शाया गया है।

वैश्विक प्रसार- भारतीय शून्य अरब व्यापारियों के माध्यम से ‘सिफर’ (Sifr) कहलाया और आगे चलकर यूरोप पहुँचा जहाँ इसे ‘Zero’ कहा गया। बिना शून्य के आज का डिजिटल युग (Binary 0 and 1) संभव ही नहीं था।

बीजगणित (Algebra): अव्यक्त गणित की शक्ति

भारतीय गणितज्ञों ने इसे ‘अव्यक्त गणित’ कहा, जिसका अर्थ है वह गणना जहाँ मान ज्ञात न हो।

आर्यभट्ट और बीजगणित की नींव

5वीं शताब्दी में आर्यभट्ट ने ‘आर्यभटीय’ ग्रंथ लिखा। उन्होंने समीकरणों (Equations) को हल करने की विधियाँ दीं। बीजगणित में भारतीय योगदान के प्रमुख बिंदु निम्नलिखित हैं-

  • कुट्टक विधि (Pulverizer Method) –  यह रैखिक डायोफैंटाइन समीकरणों (ax + by = c) को हल करने की एक अनूठी विधि थी।
  • वर्गमूल और घनमूल – आर्यभट्ट ने बड़ी संख्याओं के वर्गमूल और घनमूल निकालने की बीजगणितीय पद्धतियाँ विकसित की थीं।

भास्कराचार्य II और ‘बीजगणितम्’

12वीं शताब्दी के गणितज्ञ भास्कराचार्य ने ‘लीलावती’ और ‘बीजगणितम्’ जैसे प्रसिद्ध ग्रंथ लिखे। उन्होंने ऋणात्मक संख्याओं (Negative Numbers) की अवधारणा को स्पष्ट किया और बताया कि ऋणात्मक संख्या का वर्गमूल वास्तविक नहीं होता।

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चक्रवाल विधि (Chakravala Method)

यह भारत की सबसे परिष्कृत बीजगणितीय खोजों में से एक है। ब्रह्मगुप्त द्वारा शुरू की गई और भास्कराचार्य द्वारा पूर्ण की गई यह विधि अनिश्चित द्विघात समीकरणों (जैसे nx^2 + 1 = y^2) को हल करने के लिए उपयोग की जाती थी। पश्चिमी जगत में इसे सदियों बाद ‘पेल का समीकरण’ (Pell’s Equation) कहा गया, जबकि भारत में यह पहले से मौजूद था।

त्रिकोणमिति (Trigonometry) –  खगोल विज्ञान का आधार

त्रिकोणमिति का विकास भारत में मुख्य रूप से ग्रहों की स्थिति और नक्षत्रों की गणना के लिए हुआ था। यूनानियों ने ‘Chords’ (जीवा) का उपयोग किया, लेकिन भारतीयों ने ‘ज्या’ (Sine) की खोज की।

ज्या (Sine) और कोज्या (Cosine) की उत्पत्ति

संस्कृत शब्द ‘ज्या-अर्ध’ (आधा धनुष) से ‘ज्या’ बना। अरबों ने इसे ‘जीबा’ कहा, जिसे लैटिन अनुवादकों ने गलती से ‘साइनस’ (Sinus) समझ लिया, जिससे आधुनिक ‘Sine’ शब्द आया।

आर्यभट्ट ने पहली ‘Sine Table’ (ज्या सारणी) दी थी, जो 3.75^\circ के अंतराल पर आधारित थी।

माधव और कैलकुलस की पूर्व सूचना

14वीं शताब्दी में केरल स्कूल के माधवन ने त्रिकोणमितीय फलनों के लिए अनंत श्रेणियों (Infinite Series) की खोज की। जिन्हें आज दुनिया ‘टेलर श्रेणी’ या ‘ग्रेगरी श्रेणी’ के नाम से जानती है, वे वास्तव में ‘माधव-न्यूटन श्रेणी’ हैं। उन्होंने \pi का मान 11 दशमलव स्थानों तक सटीक निकाला था।

त्रिकोणमिति के प्रमुख सूत्र

भारतीय गणितज्ञों ने निम्नलिखित संबंधों को सिद्ध किया था

  \sin^2 \theta + \cos^2 \theta = 1 (ज्या-कोज्या संबंध)

  विभिन्न कोणों के योग और अंतर के सूत्र।

भारतीय आविष्कारों का वैश्विक प्रभाव (एक तुलनात्मक तालिका)

आविष्कार  मुख्य भारतीय ग्रंथप्रमुख योगदानकर्ताआधुनिक प्रभाव 
शून्य ब्रह्मस्फुटसिद्धांतब्रह्मगुप्त, आर्यभट्टकंप्यूटर कोडिंग, गणना की आधारशिला 
बीजगणित बीजगणितम्, आर्यभटीयभास्कराचार्य, ब्रह्मगुप्तइंजीनियरिंग और रॉकेट विज्ञान 
त्रिकोणमितिसूर्य सिद्धांत, तंत्रसंग्रहआर्यभट्ट, माधवनेविगेशन, वास्तुकला, GPS 

ज्ञान की विरासत

भारतीय गणित केवल गणनाओं तक सीमित नहीं था, यह ब्रह्मांड को समझने का एक उपकरण था। शून्य ने हमें अनंतता दी, बीजगणित ने हमें अज्ञात को खोजने की शक्ति दी, और त्रिकोणमिति ने हमें सितारों तक पहुँचने का रास्ता दिखाया। आज का आधुनिक विज्ञान पूरी तरह से इन तीन स्तंभों पर टिका हुआ है।

Swati Pandey

A versatile writer mainly works on trending news, daily updates from politics, business, crime, current affairs and entertainment.

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