नारकीय यातनाओं को सहने की शक्ति और भक्ति की पराकाष्ठा का प्रतीक है नवरात्रि का अंतिम दिन। भारत की सनातन संस्कृति में ‘बाना’ (नुकीले लोहे के त्रिशूल या तीरों को शरीर में पिरोना) और ‘जवारा विसर्जन’ केवल परंपराएं नहीं बल्कि गहरी आस्था और समर्पण के प्रमाण हैं।
शक्ति की पराकाष्ठा – जवारा विसर्जन और बाना छिदवाने की परंपरा का आध्यात्मिक एवं वैज्ञानिक विश्लेषण
प्रस्तावना
भारत की धर्मप्राण भूमि पर नवरात्रि का पर्व नारी शक्ति और जगत जननी दुर्गा की उपासना का महापर्व है। नौ दिनों के कठिन उपवास और साधना के बाद दसवें दिन विसर्जन की घड़ी आती है। मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और उत्तर भारत के कुछ हिस्सों में इस समापन का सबसे रोमांचक और विस्मयकारी हिस्सा होता है ‘जवारा विसर्जन’ और ‘बाना’ धारण करना। जब भक्त अपने गालों, जीभ या शरीर के अन्य अंगों में लोहे की नुकीली छड़ें (बाना) पार कर लेते हैं तो देखने वाला अचंभित रह जाता है। आखिर इस कठिन परंपरा का महत्व क्या है? और सबसे बड़ा प्रश्न—उन्हें दर्द क्यों नहीं होता?
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जवारा विसर्जन – प्रकृति और शक्ति का संगम
नवरात्रि के पहले दिन कलश स्थापना के साथ ‘जवारा’ (जौ के पौधे) बोए जाते हैं। जवारा को ‘प्रकृति’ का प्रतीक माना जाता है।
- सफलता का सूचक – जवारे जितने घने और ऊंचे उगते हैं, माना जाता है कि उस वर्ष घर में उतनी ही सुख-समृद्धि आएगी।
- विसर्जन का भाव – विसर्जन यह सिखाता है कि जो सृजन हुआ है उसका अंत भी निश्चित है। भक्त अत्यंत श्रद्धा के साथ इन पौधों को सिर पर रखकर जलाशय तक जाते हैं, जो जीवन की नश्वरता और प्रकृति के प्रति सम्मान को दर्शाता है।
बाना छिदवाना – क्या है यह परंपरा?
’बाना’ लोहे या चांदी की एक नुकीली छड़ होती है जो त्रिशूल के समान दिखती है। नवरात्रि की अष्टमी या नवमी के दिन कई भक्त अपनी मन्नत पूरी होने पर या भक्ति भाव में आकर इसे अपने गालों (गाल के आर-पार), जीभ या शरीर की त्वचा में पिरोते हैं। इसे स्थानीय भाषा में ‘बाना लेना’ या ‘सांघ छिदवाना’ भी कहा जाता है।
बाना छिदवाने का आध्यात्मिक महत्व
भक्तों और जानकारों के अनुसार इसके पीछे कई गहरे आध्यात्मिक कारण हैं
- अहंकार का विनाश – नुकीली वस्तु शरीर को भेदती है जो इस बात का प्रतीक है कि भक्त ने अपने देह-अभिमान और भौतिक कष्टों को माता के चरणों में समर्पित कर दिया है।
- मौन साधना – जब बाना जीभ के आर-पार किया जाता है तो भक्त बोल नहीं पाता। यह ‘मौन’ रहने और अंतर्मन की शक्ति को जगाने का एक माध्यम है।
- शक्ति का आह्वान – माना जाता है कि उस समय भक्त के शरीर में ‘देवी’ का अंश या ‘भाव’ (Trance) आ जाता है जिससे वह सामान्य मनुष्य से ऊपर उठकर ईश्वरीय ऊर्जा का अनुभव करता है।
दर्द न होने के पीछे के मुख्य कारण
यह सबसे ज्यादा जिज्ञासा का विषय है कि बिना किसी चिकित्सा सुविधा या एनेस्थीसिया के इन लोगों को दर्द क्यों नहीं होता और घाव से खून क्यों नहीं निकलता? इसके पीछे के कारणों को दो दृष्टिकोणों से समझा जा सकता है
आध्यात्मिक और मानसिक दृष्टिकोण (Faith and Focus)
- अगाध श्रद्धा – जब मन पूरी तरह से भक्ति में लीन होता है, तो मस्तिष्क ‘एंडोर्फिन’ (Endorphins) नामक हार्मोन रिलीज करता है। यह प्राकृतिक रूप से दर्द निवारक का काम करता है।
- सम्मोहन की अवस्था (Trance State) – बाना छिदवाने से पहले भक्त घंटों तक ढोल-नगाड़ों की थाप पर नृत्य करते हैं और माता के जस (भजन) गाते हैं। यह तीव्र ध्वनि और लय भक्त को एक प्रकार के ‘हिप्नोटिक स्टेट’ में ले जाती है जहाँ उसे बाहरी शारीरिक पीड़ा का अनुभव नहीं होता।
- संकल्प शक्ति – भक्त का संकल्प इतना दृढ़ होता है कि उसकी मानसिक शक्ति तंत्रिका तंत्र (Nervous System) के दर्द संदेशों को अवरुद्ध कर देती है।
शारीरिक और व्यावहारिक कारण
- रक्तहीनता का रहस्य – बाना पिरोने वाले अनुभवी लोग इसे शरीर के उन हिस्सों (जैसे गालों के लचीले हिस्से) से निकालते हैं जहाँ मुख्य रक्त वाहिकाएं (Main Blood Vessels) नहीं होतीं।
- भभूत और राख का प्रयोग – बाना छिदवाने के तुरंत बाद उस स्थान पर हवन की पवित्र राख (भभूत) लगाई जाती है। राख एक ‘एंटीसेप्टिक’ और ‘स्टेप्टिक’ (खून रोकने वाला) एजेंट के रूप में कार्य करती है जिससे घाव तुरंत बंद हो जाता है।
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समाज और परंपरा का प्रभाव
यह परंपरा पीढ़ियों से चली आ रही है। विशेषकर ग्रामीण अंचलों में इसे ‘वीरता’ और ‘शक्ति’ का प्रतीक माना जाता है। लोग अपनी मन्नतें (जैसे संतान प्राप्ति, बीमारी से मुक्ति या नौकरी) पूरी होने पर माता के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने के लिए यह कठिन मार्ग चुनते हैं।
सावधानियां और समकालीन विचार
आज के समय में, इस परंपरा को निभाते समय स्वच्छता का ध्यान रखना अनिवार्य है।
- संक्रमण (Infection) से बचने के लिए लोहे के बाना को साफ और रोगाणुमुक्त करना चाहिए।
- यह पूरी तरह से व्यक्तिगत श्रद्धा का विषय है और इसे अंधविश्वास के बजाय सांस्कृतिक विरासत के रूप में देखा जाना चाहिए।
नवरात्रि का अंतिम दिन और बाना छिदवाने की क्रिया यह सिद्ध करती है कि ‘श्रद्धा’ विज्ञान की सीमाओं के पार जा सकती है। यह केवल शरीर को कष्ट देने की प्रक्रिया नहीं है बल्कि यह प्रदर्शित करने का एक तरीका है कि जब मनुष्य ईश्वर के प्रति समर्पित होता है तो वह किसी भी शारीरिक बाधा या पीड़ा को जीत सकता है। जवारा विसर्जन के साथ यह उत्सव संपन्न होता है जो हमें प्रकृति से जुड़ने और अपनी आंतरिक शक्ति को पहचानने का संदेश देता है।







