नई दिल्ली/वॉशिंगटन। वैश्विक राजनीति और ऊर्जा बाजार के बीच फंसा एक अहम मुद्दा इन दिनों सुर्खियों में है—क्या अमेरिका भारत को रूसी तेल खरीदने के लिए दी गई 30 दिन की छूट (वॉवर) को आगे बढ़ाएगा या नहीं?
यह सवाल सिर्फ भारत के लिए ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के ऊर्जा बाजार के लिए बेहद अहम बन चुका है।पिछले महीने अमेरिका ने भारत समेत कुछ देशों को सीमित समय के लिए रूसी तेल खरीदने की अनुमति दी थी। यह राहत अस्थायी थी और खास तौर पर उन तेल खेपों के लिए दी गई थी जो पहले से रास्ते में थीं या जिनके सौदे पहले ही हो चुके थे। अब जब यह अवधि समाप्त होने वाली है, तो बाजार में अनिश्चितता का माहौल साफ दिखाई दे रहा है।
ग्लोबल मार्केट का ‘ब्लैक होल’
आज की तारीख में वैश्विक ऊर्जा बाजार किसी बारूद के ढेर पर बैठा है। पश्चिम एशिया (मिडिल ईस्ट) में जो आग लगी है, उसने पहले ही सप्लाई चेन की कमर तोड़ दी है। ऐसे में अगर रूसी तेल के बड़े हिस्से को बाजार से बाहर धकेला गया, तो तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल को पार करने में देर नहीं लगाएंगी।
अमेरिका के नीति-निर्माता भी इस बात को बखूबी जानते हैं। अगर तेल महंगा हुआ, तो अमेरिका में भी महंगाई बढ़ेगी, जो वहां की सरकार के लिए राजनीतिक आत्महत्या जैसा होगा। इसलिए, वॉशिंगटन इस वक्त ‘सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे’ वाली नीति पर काम कर रहा है।
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भारत की ‘मजबूरी’ और ‘मजबूती’ दोनों
भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल उपभोक्ता है। हमारी अर्थव्यवस्था की रफ्तार तेल के पहियों पर टिकी है। जब से रूस-यूक्रेन युद्ध शुरू हुआ है, भारत ने रूस से डिस्काउंट पर तेल खरीदकर अपने अरबों डॉलर बचाए हैं।
यह पैसा भारत के इन्फ्रास्ट्रक्चर और विकास योजनाओं में लगा है।नई दिल्ली का स्टैंड बिल्कुल साफ है—”हमारी पहली वफादारी हमारे नागरिकों के प्रति है।” विदेश मंत्रालय के गलियारों में यह चर्चा आम है कि भारत किसी के दबाव में अपनी ऊर्जा सुरक्षा से समझौता नहीं करेगा। लेकिन, कूटनीति में सब कुछ इतना काला और सफेद नहीं होता। पर्दे के पीछे की बातचीत में भारत को भी कुछ ‘गिव एंड टेक’ (लेन-देन) करना पड़ सकता है।
अमेरिका के सामने दोहरी चुनौती
अमेरिका के लिए यह फैसला आसान नहीं है। रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद से वॉशिंगटन ने मॉस्को पर कड़े आर्थिक प्रतिबंध लगाए हैं। ऐसे में अगर वह भारत जैसे देशों को छूट देता है, तो आलोचकों का कहना है कि इससे रूस को आर्थिक फायदा पहुंच सकता है।लेकिन दूसरी तरफ, अगर यह छूट खत्म कर दी जाती है, तो इसका असर सीधे वैश्विक बाजार पर पड़ेगा। तेल की कीमतें बढ़ेंगी, जिसका असर अमेरिका समेत दुनिया के कई देशों की अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है।यही वजह है कि अमेरिकी नीति-निर्माता इस फैसले को लेकर बेहद सावधानी बरत रहे हैं।
एशियाई देशों का बढ़ता दबाव
भारत के अलावा एशिया के कई अन्य देश भी इस छूट को जारी रखने के पक्ष में हैं। इन देशों का मानना है कि मौजूदा संकट के दौरान ऊर्जा आपूर्ति को बाधित करना किसी भी देश के हित में नहीं होगा।ऊर्जा विशेषज्ञों का कहना है कि यदि बड़े आयातक देशों को अचानक वैकल्पिक स्रोतों की ओर जाना पड़ा, तो इससे बाजार में प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी और कीमतें और ऊपर जा सकती हैं।
कूटनीति और ऊर्जा का जटिल समीकरण
इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि आज के दौर में ऊर्जा सिर्फ आर्थिक मुद्दा नहीं रह गई है, बल्कि यह कूटनीति और वैश्विक शक्ति संतुलन का अहम हिस्सा बन चुकी है।भारत और अमेरिका के संबंध भी इस मुद्दे से अछूते नहीं हैं। दोनों देशों के बीच रणनीतिक साझेदारी मजबूत रही है, लेकिन रूस से भारत के तेल आयात को लेकर पहले भी मतभेद सामने आते रहे हैं।फिलहाल, दोनों देश इस मुद्दे पर संतुलन बनाए रखने की कोशिश कर रहे हैं।
क्या हो सकता है आगे?
विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका कम से कम कुछ समय के लिए इस छूट को आगे बढ़ा सकता है, ताकि बाजार में स्थिरता बनी रहे। हालांकि, यह भी संभव है कि छूट को सख्त शर्तों के साथ सीमित कर दिया जाए।अगर ऐसा होता है, तो भारत को अपनी ऊर्जा रणनीति में बदलाव करना पड़ सकता है। उसे अन्य स्रोतों से तेल खरीदना पड़ेगा, जो महंगा साबित हो सकता है।
आम लोगों पर क्या असर पड़ेगा?
यह मुद्दा भले ही अंतरराष्ट्रीय राजनीति से जुड़ा हो, लेकिन इसका असर आम लोगों की जेब पर भी पड़ता है। अगर तेल की कीमतें बढ़ती हैं, तो इसका सीधा असर पेट्रोल-डीजल के दामों पर पड़ेगा।इसके अलावा, परिवहन लागत बढ़ने से रोजमर्रा की चीजों के दाम भी बढ़ सकते हैं।
रूसी तेल पर भारत को मिली 30 दिन की छूट अब सिर्फ एक तकनीकी या अस्थायी व्यवस्था नहीं रह गई है, बल्कि यह वैश्विक अर्थव्यवस्था और राजनीति का अहम मुद्दा बन चुकी है।अमेरिका का अगला कदम तय करेगा कि आने वाले समय में तेल बाजार किस दिशा में जाएगा और भारत जैसी उभरती अर्थव्यवस्थाओं को किन चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा।फिलहाल, सबकी नजरें वॉशिंगटन पर टिकी हैं—जहां लिया गया एक फैसला दुनिया भर के करोड़ों लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी को प्रभावित कर सकता है।







