वाशिंगटन/तेहरान।पिछले कई महीनों से अमेरिका और ईरान के बीच जिस तरह तलवारें खिंची हुई थीं और पूरी दुनिया एक नए युद्ध की आशंका से कांप रही थी, वहां से आखिरकार एक राहत भरी खबर आ रही है। दोनों धुर-विरोधियों के बीच बंद कमरों में चल रही कूटनीति रंग लाती दिख रही है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बड़ा दावा करते हुए साफ कहा है कि दोनों पक्ष एक ऐसे समझौते की मेज पर आ चुके हैं, जिससे न केवल सैन्य तनातनी थमेगी, बल्कि दुनिया की सबसे संवेदनशील समुद्री लाइफलाइन यानी ‘होर्मुज जलडमरूमध्य’को भी जहाजों के लिए पूरी तरह खोल दिया जाएगा।
देखा जाए तो होर्मुज का यह संकरा समुद्री रास्ता कोई मामूली रूट नहीं है, बल्कि यह पूरी दुनिया के तेल बाजार की मुख्य नस है। खाड़ी देशों से जितना भी कच्चा तेल जहाजों के जरिए दुनिया भर में जाता है, उसका एक बहुत बड़ा हिस्सा अकेले इसी रास्ते से होकर गुजरता है। पिछले दिनों अमेरिका-ईरान की तनातनी की वजह से यह पूरा इलाका बारूद के ढेर पर बैठ गया था। मालवाहक जहाजों पर हमलों के डर और बढ़े हुए इंश्योरेंस ने भारत समेत तमाम बड़े देशों के माथे पर चिंता की लकीरें खींच दी थीं, क्योंकि तेल की ढुलाई का खर्च लगातार आसमान छू रहा था।
ट्रंप की कूटनीतिक जीत या ईरान की सोची-समझी चाल?
वाशिंगटन से जो बयान आया है, उसमें राष्ट्रपति ट्रंप की बॉडी लैंग्वेज काफी आक्रामक और उत्साहित नजर आ रही है। उनका सीधा कहना है कि इस नए कूटनीतिक रास्ते से पूरे मिडिल ईस्ट की तस्वीर बदल जाएगी। ट्रंप के मुताबिक, समझौते की पहली शर्त ही यही है कि समुद्री ट्रैफिक को तुरंत सामान्य किया जाए ताकि कमर्शियल जहाजों को बिना किसी डर के आने-जाने का रास्ता मिल सके। अमेरिकी खेमा इसे अपनी एक बहुत बड़ी कूटनीतिक कामयाबी मानकर चल रहा है।हालांकि, सिक्के का दूसरा पहलू तेहरान से दिखता है, जहां ईरानी हुक्मरान हमेशा की तरह इस बार भी फूंक-फूंक कर कदम रख रहे हैं। ईरानी अधिकारियों ने यह तो माना है कि बातचीत आगे बढ़ी है, लेकिन साथ ही वाशिंगटन को थोड़ा ठंडे छींटे मारते हुए कहा कि जब तक आखिरी कागजी कार्रवाई पूरी नहीं हो जाती, तब तक किसी भी तरह की जल्दबाजी ठीक नहीं होगी। तेहरान का रुख साफ है—अभी कुछ बहुत ही बुनियादी और संवेदनशील मुद्दों पर पेंच फंसा हुआ है, इसलिए वक्त से पहले जश्न मनाना बेमानी होगा।
होर्मुज जलडमरूमध्य संकट 2026 – भारतीय टैंकरों पर ईरानी गोलाबारी और भारत-ईरान संबंधों में उपजा तनाव
खबर फैलते ही कच्चे तेल के दामों में गिरावट
जैसे ही इस संभावित समझौते की भनक राजनयिक गलियारों से छनकर बाहर आई, ग्लोबल मार्केट ने तुरंत इसका स्वागत किया। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में एकाएक गिरावट दर्ज की गई है। बाजार के सटोरियों और निवेशकों को साफ लग रहा है कि अगर होर्मुज का संकट टल गया, तो तेल की सप्लाई चेन में आने वाली सारी रुकावटें खुद-ब-खुद खत्म हो जाएंगी। एनर्जी सेक्टर पर नजर रखने वाले विश्लेषकों का भी यही मानना है कि जो भू-राजनीतिक डर पिछले कई हफ्तों से तेल की कीमतों में आग लगा रहा था, वह अब थोड़ा शांत पड़ता दिख रहा है।यह पूरी उठापटक सिर्फ अमेरिका या ईरान की निजी लड़ाई नहीं थी। इस पूरे घटनाक्रम पर भारत, चीन, जापान और यूरोपीय संघ जैसे दिग्गजों की नजरें टिकी हुई हैं। ये वो देश हैं जो अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए पूरी तरह खाड़ी देशों के क्रूड ऑयल और गैस पर टिके हैं। भारत जैसे देश के लिए, जो अपनी जरूरत का 80 फीसदी से ज्यादा तेल बाहर से खरीदता है, यह खबर घरेलू बाजार में महंगाई और बजट को काबू में रखने के लिहाज से किसी संजीवनी से कम नहीं है।
पर्दे के पीछे का खेल: परमाणु कार्यक्रम और कड़े प्रतिबंध
राजनयिक हलकों में चर्चा तेज है कि इस पूरी बातचीत की नींव में दो सबसे बड़े मुद्दे फंसे हुए हैं—एक तो ईरान का परमाणु कार्यक्रम और दूसरा उस पर लगे अमेरिकी प्रतिबंध। अमेरिका की पुरानी जिद है कि ईरान अपने न्यूक्लियर प्रोग्राम को केवल बिजली बनाने या मेडिकल जैसे शांतिपूर्ण कामों तक ही सीमित रखे। वहीं, ईरान का सीधा स्टैंड है कि जब तक उसकी अर्थव्यवस्था का गला घोंटने वाले कड़े आर्थिक प्रतिबंध पूरी तरह हटाए नहीं जाते, तब तक किसी भी समझौते का कोई मतलब नहीं है।बताया जा रहा है कि जो नया ड्राफ्ट तैयार हुआ है, उसमें दोनों पक्षों को ‘बीच का रास्ता’ निकालने का एक मौका दिया गया है।
कतर, ओमान और पाकिस्तान ने निभाया ‘डाकिया’ का फर्ज
इस पूरी गुत्थी को सुलझाने में बैकस्टेज कूटनीति का सबसे बड़ा हाथ रहा है। पाकिस्तान, कतर और ओमान जैसे देशों ने दोनों कट्टर दुश्मनों को एक मेज पर लाने के लिए पुल का काम किया। इन देशों ने न सिर्फ कूटनीतिक संदेशों का आदान-प्रदान कराया, बल्कि कई बार बातचीत टूटने की नौबत आने पर माहौल को संभाला भी।आखिर में, बात घूम-फिर कर इसी सच्चाई पर आकर टिकती है कि कोई भी समझौता कागज पर जितना खूबसूरत दिखता है, जमीन पर उसे लागू करना उतना ही टेढ़ा काम है। अगर अमेरिका और ईरान इस बार सचमुच अपनी बातों पर कायम रहते हैं, तो यह इस दशक की सबसे बड़ी डिप्लोमैटिक जीत होगी, जो दुनिया को एक बड़ी आर्थिक मंदी की खाई में गिरने से बचा लेगी।







