पाकिस्तान में अल्पसंख्यक हिंदू लड़कियों के जबरन अपहरण, निकाह और धर्म परिवर्तन (Forced Conversions) का मुद्दा दशकों से एक गंभीर मानवाधिकार संकट बना हुआ है। हाल के वर्षों में इस क्रूर प्रथा के खिलाफ आवाज उठाने वाले हिंदू कार्यकर्ताओं को न केवल सामाजिक बहिष्कार, बल्कि सीधे जान से मारने की धमकियों का सामना करना पड़ रहा है।
हिंदू कार्यकर्ताओं को धमकी किसने दी?
पाकिस्तान में जबरन धर्म परिवर्तन के खिलाफ लड़ने वाले प्रमुख कार्यकर्ताओं (जैसे पुष्पा कुमारी, कपिल देव, और वीरजी कोहली) को धमकियां मुख्य रूप से निम्नलिखित समूहों और व्यक्तियों से मिलती हैं
- धार्मिक कट्टरपंथी और मौलाना – सिंध प्रांत के घोटकी में स्थित भरचूंदी शरीफ दरगाह के गद्दीनशीन मियां मिट्ठू (Mian Mithu) और उमरकोट के पीर सरहिंदी जैसे प्रभावशाली धार्मिक नेता इस प्रक्रिया के मुख्य संरक्षक माने जाते हैं। इनके समर्थकों द्वारा कार्यकर्ताओं को “इस्लाम का दुश्मन” और “ईशनिंदा करने वाला” बताकर धमकाया जाता है।
- स्थानीय सामंत और अपराधी – अक्सर अपहरण करने वाले लोग स्थानीय प्रभावशाली कबीलों से होते हैं। जब कार्यकर्ता कानूनी लड़ाई लड़ते हैं, तो ये अपराधी उन पर हमला करते हैं।
- सोशल मीडिया ‘ट्रोल्स’ – कार्यकर्ता पुष्पा कुमारी जैसे लोगों को ऑनलाइन संदेशों के जरिए “भारतीय एजेंट” और “काफिर” कहकर जान से मारने और बलात्कार करने की धमकियां दी जाती हैं।
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धमकियां देने के कारण
इन धमकियों के पीछे कई गहरे सामाजिक और राजनीतिक कारण हैं|
- सत्ता और प्रभाव को चुनौती – मियां मिट्ठू जैसे लोग इस धर्म परिवर्तन को अपनी धार्मिक उपलब्धि और राजनीतिक शक्ति का आधार मानते हैं। जब कोई कार्यकर्ता इसे “अपहरण” कहता है, तो यह उनकी सत्ता को चुनौती होती है।
- कानून को रोकना – कार्यकर्ता अक्सर ‘सिंध हिंदू विवाह अधिनियम’ और धर्म परिवर्तन विरोधी बिलों की मांग करते हैं। कट्टरपंथी गुटों का मानना है कि ऐसे कानून “इस्लाम विरोधी” हैं।
- पीड़ितों को डराना – कार्यकर्ताओं को धमकाकर एक संदेश दिया जाता है ताकि कोई भी हिंदू परिवार अपनी बेटी के अपहरण के खिलाफ पुलिस या कोर्ट जाने की हिम्मत न करे।
किन मौलानाओं ने इसका विरोध किया?
हालांकि पाकिस्तान में एक बड़ा तबका खामोश रहता है, लेकिन कुछ उदारवादी मुस्लिम विद्वानों और नेताओं ने इस प्रथा की निंदा की है-
- अल्लामा ताहिर अशरफी – पाकिस्तान उलेमा काउंसिल के अध्यक्ष ने कई बार कहा है कि “जबरन धर्म परिवर्तन इस्लाम की शिक्षाओं के खिलाफ है।”
- मुफ्ती मुनीब-उर-रहमान – उन्होंने भी स्पष्ट किया है कि दबाव में कराया गया निकाह या धर्म परिवर्तन शरीयत में जायज नहीं है।
- राजनेता और कार्यकर्ता – सीनेटर कृष्णा कुमारी कोहली और कई मुस्लिम मानवाधिकार कार्यकर्ताओं (जैसे दिवंगत आसमा जहांगीर के संगठन) ने इस पर कड़ा रुख अपनाया है।
पाकिस्तान में यह प्रक्रिया कब से चल रही है?
यह समस्या कोई नई नहीं है, लेकिन 1990 के दशक के बाद इसमें भारी उछाल देखा गया|
- ऐतिहासिक पृष्ठभूमि – 1947 के विभाजन के बाद से ही अल्पसंख्यकों पर दबाव रहा है, लेकिन जिया-उल-हक के दौर (1980 के दशक) में इस्लामीकरण की नीतियों ने कट्टरपंथियों को और अधिक शक्ति दे दी।
- सिंध में सक्रियता – पिछले 15-20 वर्षों में सिंध (जहां 90% हिंदू आबादी है) में यह एक “संगठित अपराध” बन गया है। हर साल लगभग 1,000 हिंदू और ईसाई लड़कियों का जबरन धर्म परिवर्तन कराए जाने का अनुमान है।
- रिंकल कुमारी मामला (2012) – इस मामले ने दुनिया का ध्यान खींचा, जहां एक नाबालिग लड़की ने सुप्रीम कोर्ट में चीख-चीख कर कहा था कि उसे अगवा किया गया है, लेकिन बाद में दबाव में उसे उसके “पति” के पास भेज दिया गया।
अब कार्यकर्ताओं को जान से मारने की धमकी क्यों दी जा रही है?
वर्तमान में धमकियां बढ़ने के पीछे कुछ नए कारण हैं|
- अंतर्राष्ट्रीय दबाव – हिंदू कार्यकर्ता अब अंतरराष्ट्रीय मंचों (जैसे UN और मानवाधिकार संगठन) पर इन मामलों को उठा रहे हैं। इससे पाकिस्तान की वैश्विक छवि खराब हो रही है, जिससे कट्टरपंथी नाराज हैं।
- डिजिटल सक्रियता – अब कार्यकर्ता तुरंत अपहरण के वीडियो और एफआईआर सोशल मीडिया पर वायरल कर देते हैं, जिससे पुलिस को कार्रवाई करने पर मजबूर होना पड़ता है।
- कानूनी बिल – हाल के वर्षों में जबरन धर्म परिवर्तन के खिलाफ सख्त कानून बनाने की कोशिशें हुई हैं। कट्टरपंथी इसे अपनी हार मानते हैं और इसे रोकने के लिए कार्यकर्ताओं को निशाना बना रहे हैं।
पाकिस्तान में हिंदू अल्पसंख्यकों के लिए स्थिति बेहद चुनौतीपूर्ण है। कार्यकर्ता न केवल अपनी जान हथेली पर रखकर लड़ रहे हैं, बल्कि वे एक ऐसी न्याय व्यवस्था का सामना कर रहे हैं जो अक्सर कट्टरपंथियों के दबाव में झुक जाती है।
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