संयुक्त अरब अमीरात UAE और सऊदी अरब के बीच हालिया तनाव और अरब सागर में उनके आमने-सामने आने की खबरें वैश्विक कूटनीति और ऊर्जा राजनीति में एक बड़ा मोड़ हैं। हालांकि ये दोनों देश ऐतिहासिक रूप से करीबी सहयोगी रहे हैं| लेकिन पिछले कुछ वर्षों में उनके हितों के बीच दरारें साफ देखी जा सकती हैं।
एक मजबूत गठबंधन से प्रतिस्पर्धा तक
दशकों तक सऊदी अरब और यूएई खाड़ी सहयोग परिषद GCC के दो सबसे मजबूत स्तंभ रहे हैं। उन्होंने यमन युद्ध ईरान के प्रभाव को रोकने और कतर के बहिष्कार 2017 जैसे मुद्दों पर कंधे से कंधा मिलाकर काम किया।
लेकिन हाल के वर्षों में सऊदी विजन 2030 और यूएई की अपनी आर्थिक महत्वाकांक्षाओं ने दोनों को एक-दूसरे का प्रतिस्पर्धी बना दिया है।
अरब सागर में तनाव का मुख्य कारण – क्षेत्रीय प्रभाव और रणनीतिक बंदरगाह
अरब सागर और उससे सटे इलाकों जैसे अदन की खाड़ी और बाब-अल-मंडेब में दोनों देशों के बीच टकराव के निम्नलिखित मुख्य कारण हैं-
- यमन में अलग-अलग हित – यमन युद्ध में दोनों ने साथ शुरुआत की थी लेकिन अब उनके रास्ते अलग हैं|
- सऊदी अरब – यमन की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त सरकार Hadi/Rashad al-Alimi का समर्थन करता है ताकि उसकी सीमाओं पर स्थिरता रहे।
- यूएई – दक्षिण यमन में साउदर्न ट्रांजिशनल काउंसिल STC का समर्थन करता है। STC एक अलग दक्षिण यमन देश की मांग करता है।
टकराव
अरब सागर और हिंद महासागर के मुहाने पर स्थित रणनीतिक बंदरगाहों जैसे अदन और मुकल्ला और द्वीपों जैसे सोकोट्रा पर नियंत्रण को लेकर दोनों देशों के समर्थित गुट आपस में भिड़ते रहते हैं।
यूएई ने अरब सागर में स्थित सोकोट्रा द्वीप पर अपना सैन्य और रसद प्रभाव काफी बढ़ा लिया है। सऊदी अरब इसे अपने प्रभाव क्षेत्र में हस्तक्षेप और समुद्री सुरक्षा के लिए चुनौती मानता है। जो भी इन समुद्री रास्तों को नियंत्रित करेगा वह वैश्विक तेल व्यापार की नब्ज पर हाथ रखेगा।
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आर्थिक और तेल राजनीति OPEC+ का विवाद
यह तनाव केवल जमीन या समुद्र तक सीमित नहीं है यह काले सोने तेल पर भी आधारित है-
उत्पादन कोटा
यूएई अपनी तेल उत्पादन क्षमता बढ़ा चुका है और अधिक तेल बेचना चाहता है ताकि अपनी अर्थव्यवस्था को विविधता दे सके।
सऊदी का रुख
सऊदी अरब OPEC का वास्तविक नेता तेल की कीमतें ऊंची रखने के लिए उत्पादन में कटौती चाहता है। जब यूएई ने सऊदी के नेतृत्व वाली नीतियों का विरोध किया तो यह विवाद सार्वजनिक हो गया।
आर्थिक प्रतिस्पर्धा – मुख्यालय की जंग
सऊदी अरब ने हाल ही में नियम बनाया है कि जो विदेशी कंपनियां अपना क्षेत्रीय मुख्यालय Regional HQ रियाद में नहीं खोलेंगी उन्हें सरकारी ठेके नहीं मिलेंगे। यह सीधा प्रहार दुबई UAE पर था जो दशकों से मध्य पूर्व का व्यापारिक केंद्र रहा है। इससे दोनों देशों के बीच व्यापारिक प्रतिद्वंद्विता आमने-सामने की स्थिति में आ गई है।
अब क्यों हुआ यह घटनाक्रम
हाल ही में तनाव बढ़ने के कुछ तात्कालिक कारण रहे हैं-
इजरायल के साथ संबंध – यूएई ने अब्राहम समझौते के तहत इजरायल से संबंध पूरी तरह सामान्य कर लिए जबकि सऊदी अरब इस दिशा में बहुत सावधानी से बढ़ रहा है।
ईरान के साथ कूटनीति – सऊदी और ईरान के बीच चीन की मध्यस्थता से हुए समझौते ने यूएई को अपनी सुरक्षा रणनीति पर फिर से सोचने पर मजबूर किया है।
समुद्री सीमा विवाद – सऊदी अरब और यूएई के बीच
अल-यासत Al-Yasat जैसे क्षेत्रों को लेकर पुराना सीमा विवाद फिर से उभर रहा है जिसे यूएई ने संरक्षित क्षेत्र घोषित किया है और सऊदी इसे विवादित मानता है।
क्या यह युद्ध की ओर बढ़ रहा है
नहीं यह सैन्य युद्ध नहीं बल्कि भू-राजनीतिक और आर्थिक वर्चस्व की जंग है। दोनों देश जानते हैं कि सीधे टकराव से पूरे क्षेत्र की अर्थव्यवस्था तबाह हो जाएगी।
हालांकि अरब सागर में उनके नौसैनिक जहाजों की मौजूदगी और समर्थित गुटों के बीच झड़पें एक कोल्ड वॉर जैसी स्थिति पैदा कर रही हैं।
समुद्री सीमा विवाद कारण
यमन के बंदरगाहों पर नियंत्रण तेल उत्पादन कोटा और आर्थिक प्रतिस्पर्धा। असर यह है कि खाड़ी देशों की एकता GCC कमजोर हो रही है। भविष्य में दोनों देश भविष्य में अपनी-अपनी अलग विदेश नीति पर चलेंगे जो एक-दूसरे के विपरीत हो सकती है।







