वॉशिंगटन/तेहरान।अमेरिका और ईरान के बीच बरसों से खिंचे चले आ रहे परमाणु विवाद को सुलझाने की सुगबुगाहट तेज हो गई है। संकेत सकारात्मक हैं, लेकिन राह में रोड़े अब भी कम नहीं हैं। अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने खुद माना है कि दोनों देशों के बीच बातचीत “काफी आगे” निकल चुकी है और एक संभावित डील के बेहद करीब है। हालांकि, उन्होंने यह भी साफ कर दिया कि कुछ पेचीदा मुद्दों पर पेंच अभी भी फंसा हुआ है।वेंस के मुताबिक, बातचीत को लेकर माहौल में सकारात्मकता जरूर है, लेकिन “सफलता की मंजिल अभी थोड़ी दूर है।” उनके इस बयान से साफ है कि कूटनीतिक हलचल भले ही अपने चरम पर हो, लेकिन आखिरी मुहर लगना अभी बाकी है।
60 दिनों का ‘फॉरमुला’ और होर्मुज पर नजर
अंदरखाने से छनकर आ रही खबरों की मानें तो दोनों पक्ष फिलहाल एक शुरुआती फ्रेमवर्क पर काम कर रहे हैं। इसके तहत 60 दिनों की एक अस्थायी व्यवस्था या ‘सीजफायर’ जैसा फॉर्मूला तैयार किया जा सकता है। इस तय समय के दौरान क्षेत्र में जारी तनाव को कम करने की कोशिश होगी और बदले में ईरान को प्रतिबंधों में थोड़ी ढील मिल सकती है।इस पूरे प्रस्ताव का एक बेहद अहम हिस्सा है—समुद्री रास्तों की सुरक्षा। सूत्रों का कहना है कि बातचीत में ‘होर्मुज जलडमरूमध्य’जैसे रणनीतिक रास्तों को हर हाल में खुला रखने पर जोर दिया गया है। दुनिया भर के तेल और व्यापार के लिहाज से यह रूट कितना संवेदनशील है, इसे दोनों ही पक्ष बखूबी समझते हैं।
read more :
- ईरान का विदेशी मीडिया पर नया चाबुक
- खाड़ी क्षेत्र में फिर बढ़ा तनाव ईरान में अमेरिकी हवाई हमलों से बिगड़े हालात
सबसे बड़ा गतिरोध: परमाणु कार्यक्रम की जिद
तमाम बिंदुओं पर सहमति के दावों के बीच, सबसे बड़ी दीवार अब भी ईरान का परमाणु कार्यक्रम ही है। वॉशिंगटन की दो टूक शर्त है कि ईरान अपने यूरेनियम संवर्धन को हर हाल में सीमित करे और हाई-लेवल संवर्धन पर पूरी तरह रोक लगाए। दूसरी तरफ, तेहरान अपनी जिद पर अड़ा है। उसका कहना है कि शांतिपूर्ण कामों के लिए परमाणु कार्यक्रम चलाना उसका संप्रभु अधिकार है और वह इससे पीछे नहीं हटेगा। यही वह मोड़ है जहां आकर दोनों देशों के सुर बदल जाते हैं।
व्हाइट हाउस में एक राय नहीं, बाइडेन की मंजूरी का इंतजार
उपराष्ट्रपति वेंस ने यह भी इशारा किया कि टेबल पर भले ही बात कितनी भी आगे बढ़ गई हो, लेकिन आखिरी फैसला अमेरिकी राष्ट्रपति के स्तर पर ही होगा। यानी जो मसौदा तैयार हुआ है, वह सिर्फ एक शुरुआती खाका है, अंतिम समझौता नहीं।
दिलचस्प बात यह है कि इस संभावित डील को लेकर खुद व्हाइट हाउस के भीतर भी दो फाड़ नजर आ रहे हैं। जहां अधिकारियों का एक गुट इसे बड़ी कूटनीतिक जीत मान रहा है, वहीं दूसरा धड़ा इसे जरूरत से ज्यादा जोखिम भरा सौदा बताकर इसके खतरों से आगाह कर रहा है।
पश्चिम एशिया के बारूद पर कूटनीति की नजर
यह पूरी कवायद ऐसे दौर में हो रही है जब पूरा पश्चिम एशिया पहले से ही सुलग रहा है। समुद्री रास्तों की सुरक्षा, क्षेत्रीय गुटबाजी और ग्लोबल एनर्जी सप्लाई चेन पर मंडराते खतरों के बीच, दोनों देशों पर एक अदद समझौते का भारी अंतरराष्ट्रीय दबाव है। कच्चे तेल के बाजार और दुनिया भर की इकॉनमी पर इसके सीधे असर ने इस बातचीत को और ज्यादा गंभीर बना दिया है।
अमेरिका में सियासी घमासान तेज
इधर अमेरिका के भीतर भी इस मुद्दे पर सियासत गर्मा गई है। समर्थकों का तर्क है कि मिडिल ईस्ट में किसी बड़े युद्ध को टालने के लिए यह कूटनीतिक कदम बेहद जरूरी है। वहीं, आलोचक सरकार को घेरते हुए कह रहे हैं कि इस समझौते से ईरान को रणनीतिक रूप से मजबूत होने का मौका मिल जाएगा।
आगे क्या?
फिलहाल की तस्वीर यही है कि बातचीत बेनतीजा होकर टूटी नहीं है, तो पूरी तरह परवान भी नहीं चढ़ी है। दोनों पक्ष एक-दूसरे के करीब तो आए हैं, लेकिन दशकों का अविश्वास अब भी सबसे बड़ी चुनौती है। आने वाले कुछ दिन यह तय कर देंगे कि यह बातचीत किसी ऐतिहासिक समझौते की शक्ल अख्तियार करती है, या फिर कूटनीति की फाइलों में एक और नाकाम कोशिश बनकर दफन हो जाती है।







