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नीचे से दौड़ेंगी गाड़ियां ऊपर से गुजरेंगे वन्यजीव- विकास और प्रकृति के संतुलन की मिसाल बना चेन्नई–बेंगलुरु एक्सप्रेसवे

नीचे से दौड़ेंगी गाड़ियां ऊपर से गुजरेंगे वन्यजीव- विकास और प्रकृति के संतुलन की मिसाल बना चेन्नई–बेंगलुरु एक्सप्रेसवे
नवजोत कौर सिद्धू
On: फ़रवरी 13, 2026 3:09 अपराह्न
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डेलीबार्ता-भारत में सड़क निर्माण का मतलब अब सिर्फ तेज रफ्तार और बेहतर कनेक्टिविटी नहीं रह गया है। बदलते दौर में इंफ्रास्ट्रक्चर विकास के साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण को भी उतनी ही गंभीरता से लिया जा रहा है। इसी सोच का एक बेहतरीन उदाहरण है चेन्नई-बेंगलुरु एक्सप्रेसवे, जहां महिमंडलम रिजर्व फॉरेस्ट के बीच एक अत्याधुनिक वाइल्डलाइफ ओवरपास तैयार किया जा रहा है।

यह ओवरपास ऐसा होगा कि नीचे से तेज रफ्तार वाहन गुजरेंगे, जबकि ऊपर से जंगली जानवर सुरक्षित तरीके से एक ओर से दूसरी ओर जा सकेंगे। यह परियोजना विकास और प्रकृति के बीच संतुलन स्थापित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है।

क्या है वाइल्डलाइफ ओवरपास और क्यों है जरूरी?

वाइल्डलाइफ ओवरपास दरअसल एक विशेष प्रकार का पुल होता है, जिसे व्यस्त राष्ट्रीय राजमार्ग या एक्सप्रेसवे के ऊपर इस तरह बनाया जाता है कि वन्यजीव बिना किसी बाधा और खतरे के सड़क पार कर सकें।

तेजी से फैलते सड़क नेटवर्क के कारण जंगलों के बीच से गुजरने वाले हाईवे अक्सर वन्यजीवों के लिए खतरा बन जाते हैं। कई बार जानवर सड़क पार करते समय वाहनों की चपेट में आ जाते हैं, जिससे न सिर्फ उनकी जान जाती है, बल्कि यात्रियों की सुरक्षा भी खतरे में पड़ती है।

ऐसे में यह ओवरपास मानव-वन्यजीव संघर्ष को कम करने का प्रभावी समाधान है। इससे सड़क दुर्घटनाओं में कमी आएगी और जंगल के प्राकृतिक आवागमन मार्ग (कॉरिडोर) सुरक्षित रहेंगे।

महिमंडलम रिजर्व फॉरेस्ट: जैव विविधता का महत्वपूर्ण क्षेत्र

वेल्लोर और रानीपेट के बीच स्थित महिमंडलम रिजर्व फॉरेस्ट जैव विविधता से समृद्ध क्षेत्र है। यहां भारतीय गौर, पैंथर, जंगली सूअर, हिरण और कई अन्य प्रजातियों का प्राकृतिक निवास है।

जब एक्सप्रेसवे की योजना बनी, तब इस क्षेत्र से गुजरने वाले मार्ग को लेकर पर्यावरण विशेषज्ञों ने चिंता जताई थी। इसके बाद वन विभाग और राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण ने मिलकर ऐसा समाधान तलाशा, जिससे विकास कार्य भी आगे बढ़े और वन्यजीवों की सुरक्षा भी सुनिश्चित हो सके। इसी विचार के तहत इस विशेष वाइल्डलाइफ ओवरपास की परिकल्पना की गई।

90 मीटर लंबा, 25 मीटर चौड़ा आधुनिक ढांचा

राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण के अनुसार, यह ओवरपास करीब 90 मीटर लंबा और 25 मीटर चौड़ा होगा। इसकी ऊंचाई सड़क से लगभग 5.5 मीटर रखी गई है, ताकि बड़े वाहन भी आराम से इसके नीचे से गुजर सकें।

इस पुल का डिजाइन केवल तकनीकी मजबूती को ध्यान में रखकर नहीं बनाया गया है, बल्कि इसे इस तरह तैयार किया गया है कि जानवरों को प्राकृतिक माहौल का अनुभव हो।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि संरचना अत्यधिक कृत्रिम लगे, तो वन्यजीव उसका उपयोग करने से हिचक सकते हैं। इसलिए इसे प्राकृतिक स्वरूप देने पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है।

आर्टिफिशियल घास का मैदान, प्राकृतिक माहौल का एहसास

ओवरपास को जंगल जैसा स्वरूप देने के लिए तमिलनाडु वन विभाग के सहयोग से यहां एक आर्टिफिशियल घास का मैदान विकसित किया जाएगा।

यह घास का क्षेत्र एक तरह से प्राकृतिक कैमोफ्लाज का काम करेगा। इससे यह संरचना आसपास के जंगल में घुल-मिल जाएगी और जानवरों को किसी तरह का भय या असहजता महसूस नहीं होगी।

इसके अलावा, किनारों पर मिट्टी और स्थानीय वनस्पतियों का भी उपयोग किया जाएगा, ताकि यह पूरी तरह प्राकृतिक गलियारे जैसा दिखे। यह प्रयोग भारत में वन्यजीव संरक्षण के क्षेत्र में एक नई सोच को दर्शाता है।

यात्रियों के लिए भी बढ़ेगी सुरक्षा

यह ओवरपास केवल वन्यजीवों की सुरक्षा तक सीमित नहीं है। इससे एक्सप्रेसवे पर सफर करने वाले लाखों यात्रियों की सुरक्षा भी सुनिश्चित होगी।

जंगली जानवरों के अचानक सड़क पर आ जाने से कई बार बड़े हादसे हो जाते हैं। खासकर रात के समय यह खतरा और बढ़ जाता है। ऐसे में यदि जानवरों के लिए अलग सुरक्षित मार्ग उपलब्ध होगा, तो सड़क दुर्घटनाओं में उल्लेखनीय कमी आ सकती है।

इस तरह यह परियोजना दोहरी सुरक्षा प्रदान करती है,एक ओर वन्यजीवों की रक्षा, तो दूसरी ओर यात्रियों की सुरक्षा।

258 किलोमीटर लंबा एक्सप्रेसवे…आधुनिक भारत की तस्वीर

करीब 258 किलोमीटर लंबा चार-लेन चेन्नई-बेंगलुरु एक्सप्रेसवे देश के प्रमुख इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स में शामिल है। इस परियोजना की आधारशिला मई 2022 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रखी थी।

यह एक्सप्रेसवे तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश और कर्नाटक को बेहतर कनेक्टिविटी प्रदान करेगा। इससे यात्रा का समय काफी घटेगा और औद्योगिक, व्यापारिक तथा पर्यटन गतिविधियों को नई गति मिलेगी।

लेकिन इस परियोजना की खास बात यह है कि इसमें पर्यावरणीय संतुलन को भी प्राथमिकता दी गई है।

विकास बनाम पर्यावरण नहीं, विकास के साथ पर्यावरण

अक्सर यह सवाल उठता है कि तेज विकास की दौड़ में कहीं प्रकृति पीछे तो नहीं छूट रही? लेकिन चेन्नई-बेंगलुरु एक्सप्रेसवे पर बन रहा यह वाइल्डलाइफ ओवरपास इस सोच को बदलता नजर आता है।

यह परियोजना दर्शाती है कि यदि इच्छाशक्ति हो तो विकास और पर्यावरण संरक्षण साथ-साथ चल सकते हैं।

विश्व के कई देशों में वाइल्डलाइफ ओवरपास और अंडरपास का सफल प्रयोग किया जा चुका है। भारत में भी अब इस दिशा में ठोस कदम उठाए जा रहे हैं। भविष्य में अन्य हाईवे परियोजनाओं में भी इस मॉडल को अपनाया जा सकता है।

पर्यावरण संरक्षण की दिशा में बड़ा संदेश

यह पहल केवल एक निर्माण परियोजना नहीं है, बल्कि एक संदेश भी है कि आधुनिक भारत केवल कंक्रीट और स्टील से नहीं बनेगा, बल्कि उसमें हरियाली और जैव विविधता के लिए भी जगह होगी।

महिमंडलम रिजर्व फॉरेस्ट में बन रहा यह ओवरपास आने वाले समय में पर्यावरणीय इंजीनियरिंग का एक उदाहरण बन सकता है।

जब नीचे से रफ्तार भरी गाड़ियां गुजरेंगी और ऊपर से शांतिपूर्वक जंगली जानवर अपना रास्ता तय करेंगे, तब यह दृश्य विकास और प्रकृति के संतुलन का प्रतीक होगा।

Pradeep Pandey

A versatile writer mainly works on politics, business, crime, current affairs and entertainment

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