पश्चिम बंगाल में अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) आरक्षण की व्यवस्था इस समय एक बड़े कानूनी और राजनीतिक बदलाव के दौर से गुजर रही है। कलकत्ता उच्च न्यायालय के एक ऐतिहासिक फैसले और उसके बाद राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग (NCBC) की समीक्षाओं के बाद राज्य में ओबीसी कोटे के ढांचे में बड़े बदलाव देखने को मिले हैं। इस नए घटनाक्रम के तहत जहां एक तरफ धर्म-आधारित वर्गीकरण को कानूनी रूप से चुनौती मिली है वहीं दूसरी तरफ जातियों की सूची और आरक्षण के प्रतिशत को लेकर एक नया गणित सामने आया है।
उठाए गए कदम का मुख्य आधार – कलकत्ता हाई कोर्ट का फैसला
इस पूरी व्यवस्था में बदलाव का मुख्य आधार मई 2024 में आया कलकत्ता उच्च न्यायालय का ऐतिहासिक निर्णय है। अदालत ने साल 2010 के बाद पश्चिम बंगाल सरकार द्वारा ओबीसी सूची में शामिल की गई कई मुस्लिम उप-जातियों के वर्गीकरण को असंवैधानिक घोषित कर दिया था।
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इस कदम के पीछे निम्नलिखित मुख्य कानूनी और संवैधानिक आधार थे
- धर्म-आधारित आरक्षण पर रोक – भारतीय संविधान के अनुच्छेद 15 और 16 के तहत केवल धर्म के आधार पर आरक्षण नहीं दिया जा सकता। अदालत ने पाया कि पिछली व्यवस्था में कई समुदायों को बिना किसी ठोस वैज्ञानिक और सामाजिक सर्वे के केवल धार्मिक पहचान के आधार पर ओबीसी का दर्जा दे दिया गया था।
- ठोस डेटा (Quantifiable Data) का अभाव – राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग (NCBC) और अदालत दोनों का मानना था कि राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग ने इन जातियों को शामिल करने से पहले उनके सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ेपन का कोई व्यापक और प्रामाणिक डेटा एकत्र नहीं किया था।
- अवैध प्रक्रिया – अदालत ने टिप्पणी की थी कि उप-जातियों को शामिल करने की प्रक्रिया में नियमों की अनदेखी की गई और राजनीतिक लाभ के लिए जल्दबाजी में फैसले लिए गए।
नई व्यवस्था – क्या बदला और क्या है 7% बनाम 17% का गणित?
पश्चिम बंगाल में पहले ओबीसी को दो श्रेणियों में बांटा गया था
- ओबीसी-ए (OBC-A) – इसमें मुख्य रूप से ‘अति पिछड़े’ समुदाय जिनमें बहुसंख्यक मुस्लिम उप-जातियां थीं शामिल थे जिन्हें 10% आरक्षण मिलता था।
- ओबीसी-बी (OBC-B) – इसमें ‘पिछड़े’ समुदाय जिनमें मुख्य रूप से हिंदू उप-जातियां थीं शामिल थे जिन्हें 7% आरक्षण मिलता था।
दोनों को मिलाकर कुल 17% ओबीसी आरक्षण की व्यवस्था थी।
वर्तमान बदलाव और प्रभाव
- कैटेगरी का खात्मा – अदालत के आदेश और नई समीक्षाओं के बाद धर्म या तुष्टिकरण के आधार पर बनाई गई ‘ओबीसी-ए’ और ‘ओबीसी-बी’ की इस दोहरी व्यवस्था को कानूनी चुनौतियों का सामना करना पड़ा है।
- कोटे का संकुचन – चूंकि कोर्ट ने 2010 के बाद जोड़ी गई लगभग 77 उप-जातियों जिनमें अधिकांश मुस्लिम समुदाय से थीं का दर्जा रद्द कर दिया इसलिए व्यावहारिक रूप से ओबीसी सूची से एक बड़ा हिस्सा बाहर हो गया। इसके परिणामस्वरूप जो कोटा पहले व्यापक स्तर पर 17% तक विस्तारित था वह अब केवल उन मूल और प्रामाणिक रूप से पिछड़ी जातियों तक सीमित रह गया है जो पहले से इस कोटे का हिस्सा थीं जो लगभग 7% के दायरे में आती हैं ।
- केवल 66 जातियों को मान्यता – नई छानबीन और कानूनी मापदंडों के बाद अब केवल लगभग 66 जातियों को ही पूर्ण रूप से वैध ओबीसी कोटे के योग्य माना जा रहा है। ये वे जातियां हैं जो मुख्य रूप से हिंदू पिछड़े समुदायों और कुछ ऐसी मूल जातियों से संबंधित हैं जिनका पिछड़ापन पूरी तरह साबित हो चुका है।
मुख्य जातियां जिन्हें मिलेगा लाभ
नई व्यवस्था के तहत जिन 66 समुदायों या जातियों को मुख्य रूप से इस कोटे का लाभ मिलेगा वे वे हैं जो 2010 से पहले से ही सूची में शामिल थीं या जिनका चयन पूरी तरह गैर-धार्मिक और संवैधानिक मानदंडों के आधार पर हुआ है। इनमें प्रमुख रूप से निम्नलिखित वर्ग शामिल हैं
- गोप, सदगोप और अहीर – पारंपरिक रूप से पशुपालन और कृषि से जुड़े समुदाय।
- कुर्मी और महतो – जंगल महल और ग्रामीण बंगाल के प्रमुख कृषक और सामाजिक रूप से पिछड़े वर्ग।
- कुंभकार, मोदक और स्वर्णकार – पारंपरिक कारीगर, मिट्टी के बर्तन बनाने वाले और छोटे व्यवसायी वर्ग जो आर्थिक और सामाजिक रूप से पिछड़े हैं।
- तंतुवाय और जुलाहा (हिंदू) – पारंपरिक बुनकर समुदाय।
- राजबंशी और कपाली (ओबीसी श्रेणी के तहत आने वाले अंश) – उत्तरी और दक्षिणी बंगाल के कुछ विशिष्ट क्षेत्रीय पिछड़े वर्ग।
इन जातियों को लाभ मिलने का मुख्य कारण यह है कि इनके पिछड़ेपन के ऐतिहासिक और सामाजिक प्रमाण मौजूद हैं जिन्हें अदालत या आयोग ने खारिज नहीं किया है।
विषय से जुड़ी महत्वपूर्ण और निष्पक्ष जानकारी
इस पूरे घटनाक्रम को समझने के लिए कुछ अन्य महत्वपूर्ण पहलुओं को जानना आवश्यक है
- पुरानी नौकरियों पर असर नहीं – कलकत्ता हाई कोर्ट ने अपने फैसले में यह साफ किया था कि जिन लोगों ने इस कोटे (2010 के बाद वाले) के तहत पहले ही सरकारी नौकरियां प्राप्त कर ली हैं या दाखिला ले लिया है उनकी नौकरियां या सीटें सुरक्षित रहेंगी। यह बदलाव केवल नई नियुक्तियों और दाखिलों पर लागू होगा।
- राज्य सरकार का रुख – पश्चिम बंगाल की वर्तमान तृणमूल कांग्रेस (TMC) सरकार ने इस फैसले का कड़ा विरोध किया है और इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। राज्य सरकार का तर्क है कि यह फैसला राज्य के अधिकारों में हस्तक्षेप है और इससे लाखों पिछड़े लोगों का हक मारा जाएगा।
- राजनीतिक नैरेटिव – भारतीय जनता पार्टी (BJP) और केंद्र सरकार की एजेंसियां इसे “तुष्टिकरण की राजनीति के खिलाफ एक जीत” और “असली ओबीसी पिछड़े हिंदुओं और मूल निवासियों के अधिकारों की बहाली” के रूप में पेश कर रही हैं। उनका आरोप है कि पिछली सरकार ने वोट बैंक के लिए बांग्लादेशी प्रवासियों और सामान्य वर्ग के लोगों को जबरन ओबीसी सूची में डाल दिया था।
पश्चिम बंगाल का ओबीसी आरक्षण विवाद देश में आरक्षण नीति और धर्म के बीच के संबंधों की एक बड़ी नजीर बन गया है। जहां नई व्यवस्था के तहत केवल 66 प्रामाणिक जातियों को सुरक्षित करके कोटे को अधिक पारदर्शी और संवैधानिक बनाने का दावा किया जा रहा है वहीं सुप्रीम कोर्ट में लंबित अपील इस व्यवस्था के भविष्य को तय करेगी। फिलहाल यह कदम राज्य की राजनीति और सामाजिक समीकरणों को बदलने में एक बड़ी भूमिका निभा रहा है।







