मताधिकार की आयु में संविधान के 61वें संशोधन-डेलीबार्ता। लोकतंत्र की मजबूती का सबसे बड़ा आधार नागरिकों का मतदान अधिकार है। भारत जैसे विशाल लोकतांत्रिक देश में यह अधिकार न केवल राजनीतिक भागीदारी का प्रतीक है, बल्कि सामाजिक चेतना और जिम्मेदारी का भी परिचायक है। आज भारत में 18 वर्ष की आयु पूरी करने वाला प्रत्येक नागरिक मतदान का अधिकार रखता है, लेकिन यह अधिकार हमेशा से ऐसा नहीं था। एक समय ऐसा भी था जब मतदान के लिए न्यूनतम आयु 21 वर्ष निर्धारित थी। वर्ष 1988 में संविधान के 61वें संशोधन अधिनियम के माध्यम से मताधिकार की उम्र 21 से घटाकर 18 वर्ष कर दी गई, जिसने भारतीय लोकतंत्र की दिशा और दशा दोनों को प्रभावित किया।
जानिये क्या थी आज़ादी के बाद मतदान की उम्र?
भारत को 15 अगस्त 1947 को स्वतंत्रता मिलने के बाद जब संविधान का निर्माण हुआ, तब मताधिकार की न्यूनतम आयु 21 वर्ष तय की गई थी। संविधान निर्माताओं का मानना था कि 21 वर्ष की आयु तक व्यक्ति मानसिक, सामाजिक और राजनीतिक रूप से परिपक्व हो जाता है तथा राष्ट्रहित में सही निर्णय ले सकता है। संविधान के अनुच्छेद 326 में यह स्पष्ट किया गया था कि लोकसभा और विधानसभा के चुनावों में वही नागरिक मतदान कर सकेगा, जिसने 21 वर्ष की आयु पूरी कर ली हो।
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बदलते समय के साथ उठा मताधिकार की उम्र घटाने का मुद्दा
1970 और 1980 के दशक में भारत का सामाजिक और राजनीतिक परिदृश्य तेजी से बदल रहा था। शिक्षा का स्तर बढ़ रहा था, युवाओं में राजनीतिक जागरूकता आ रही थी और वे आंदोलनों के माध्यम से अपनी भागीदारी दर्ज करा रहे थे।
यह थे प्रमुख कारण जो बनें बहस का आधार
18 से 21 वर्ष के नौकरी, युवा पढ़ाई और सामाजिक आंदोलनों में सक्रिय थे। विवाह, सेना में भर्ती, करदायित्व और ड्राइविंग लाइसेंस जैसे अधिकार 18 वर्ष में मिल जाते थे। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कई लोकतांत्रिक देशों में मतदान की उम्र 18 वर्ष थी,युवाओं की बढ़ती जनसंख्या को लोकतांत्रिक प्रक्रिया से जोड़ने की आवश्यकता थी।
61वाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 1988
लंबी बहस और विचार-विमर्श के बाद तत्कालीन राजीव गांधी सरकार ने मतदान की उम्र घटाने का प्रस्ताव रखा। संसद में संशोधन का प्रस्ताव वर्ष 1988 में संसद में संविधान (61वाँ संशोधन) विधेयक पेश किया गया। इस विधेयक का उद्देश्य अनुच्छेद 326 में संशोधन कर मतदान की न्यूनतम आयु 21 से घटाकर 18 वर्ष करना था।
सर्वसम्मति से पारित हुआ यह विधेयक
लोकसभा और राज्यसभा दोनों सदनों में व्यापक चर्चा के बाद इस विधेयक को भारी बहुमत से पारित किया गया। इसके बाद राष्ट्रपति की स्वीकृति मिलने पर यह संविधान (61वाँ संशोधन) अधिनियम, 1988 बन गया।
1989 से लागू हुआ नया मताधिकार नियम
हालांकि संशोधन अधिनियम 1988 में पारित हुआ, लेकिन इसका व्यावहारिक क्रियान्वयन 1989 के आम चुनावों से हुआ। पहली बार 18 से 21 वर्ष के युवाओं को लोकसभा चुनाव में मतदान का अधिकार मिला।
सरकार के क्या थे तर्क,क्यों घटाई गई मतदान की उम्र?
सरकार ने संशोधन के पक्ष में कई महत्वपूर्ण तर्क रखे जिसमें युवा शक्ति को लोकतंत्र से जोड़ना,भारत की जनसंख्या में युवाओं की संख्या सबसे अधिक है। उन्हें मतदान का अधिकार देकर लोकतांत्रिक प्रक्रिया में सक्रिय भागीदार बनाना आवश्यक था।
शिक्षा और सूचना क्रांति के चलते 18 वर्ष के युवा राजनीतिक मुद्दों को समझने लगे थे। अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, जापान जैसे देशों में मतदान की उम्र पहले से ही 18 वर्ष थी।
कम उम्र में मतदान का अधिकार मिलने से युवाओं में सामाजिक और राष्ट्रीय जिम्मेदारी का विकास होता है। हालांकि अधिकांश राजनीतिक दल और समाज का बड़ा वर्ग संशोधन के पक्ष में था, फिर भी कुछ आपत्तियाँ सामने आईं। जैसे 18 वर्ष के युवाओं में राजनीतिक परिपक्वता की कमी,भावनात्मक और प्रचार से प्रभावित होने की आशंका,गलत निर्णय से लोकतंत्र पर असर। लेकिन समय के साथ ये आशंकाएँ काफी हद तक निराधार साबित हुईं।
61वें संशोधन का भारतीय लोकतंत्र पर प्रभाव
संशोधन के बाद करोड़ों नए युवा मतदाता चुनावी प्रक्रिया से जुड़े। युवाओं को ध्यान में रखकर घोषणापत्र, रोजगार, शिक्षा और तकनीक जैसे मुद्दे प्रमुख बने। इस बदलाव ने युवा नेताओं के उभार को भी प्रोत्साहित किया। और लोकतांत्रिक प्रक्रिया अधिक समावेशी और प्रतिनिधित्वपूर्ण बनी।
चुनाव आयोग की महत्वपूर्ण भूमिका
मतदाताओं की संख्या बढ़ने के साथ भारत निर्वाचन आयोग की जिम्मेदारी भी बढ़ गई।
- मतदाता सूची में युवाओं का नाम जोड़ना
- जागरूकता अभियान चलाना
- स्कूल-कॉलेजों में मतदाता शिक्षा कार्यक्रम,
इन प्रयासों से युवा मतदाताओं की भागीदारी धीरे-धीरे बढ़ी।
आज के दौर में 18 वर्ष का मताधिकार कितना प्रभावी?
आज सोशल मीडिया, डिजिटल प्लेटफॉर्म और 24×7 सूचना के युग में युवा पहले से कहीं अधिक जागरूक हैं। हालांकि मतदान प्रतिशत अभी भी अपेक्षा से कम है, लेकिन युवाओं की राजनीतिक भागीदारी लगातार बढ़ रही है संविधान का 61वाँ संशोधन भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में एक ऐतिहासिक और दूरदर्शी निर्णय था। मताधिकार की उम्र 21 से घटाकर 18 वर्ष करना केवल एक संवैधानिक बदलाव नहीं, बल्कि युवा भारत पर विश्वास का प्रतीक था।
आज जब देश “युवा भारत” की बात करता है, तो यह संशोधन उसकी नींव साबित होता है। आने वाले समय में यदि युवा अपने मताधिकार का सजगता से उपयोग करें, तो भारतीय लोकतंत्र और अधिक मजबूत, पारदर्शी और उत्तरदायी बन सकता है।







