नई दिल्ली। भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में एक महत्वपूर्ण और दूरगामी प्रभाव डालने वाला निर्णय 1988 में आज ही के दिन लिया गया था, जब देश में मतदान की न्यूनतम आयु 21 वर्ष से घटाकर 18 वर्ष करने के लिए संविधान संशोधन को आधिकारिक मंजूरी मिली। यह फैसला न केवल युवाओं को लोकतांत्रिक प्रक्रिया से जोड़ने की दिशा में एक बड़ा कदम था, बल्कि इससे भारतीय राजनीति और चुनावी व्यवस्था में भी व्यापक बदलाव आए।

जानिये क्यों जरूरी था यह बदलाव
स्वतंत्रता के बाद से ही भारत में मतदान की न्यूनतम आयु 21 वर्ष निर्धारित थी। उस समय यह माना जाता था कि 21 वर्ष की आयु तक व्यक्ति राजनीतिक और सामाजिक दृष्टि से अधिक परिपक्व हो जाता है। लेकिन समय के साथ देश की सामाजिक संरचना, शिक्षा प्रणाली और युवाओं की भूमिका में बड़ा बदलाव आया।
1980 के दशक तक आते-आते यह स्पष्ट होने लगा कि 18 से 21 वर्ष के बीच के युवा भी शिक्षा, रोजगार, सामाजिक आंदोलनों और राष्ट्रीय मुद्दों में सक्रिय भागीदारी निभा रहे हैं। ऐसे में उन्हें मतदान जैसे बुनियादी लोकतांत्रिक अधिकार से वंचित रखना तर्कसंगत नहीं माना गया।
61वां संविधान संशोधन अधिनियम
भारत में मतदान की आयु घटाने के लिए संविधान के अनुच्छेद 326 में संशोधन किया गया। यह संशोधन 61वां संविधान संशोधन अधिनियम, 1988 के रूप में जाना जाता है।
इस अधिनियम के तहत लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के चुनावों में मतदान की न्यूनतम आयु 21 वर्ष से घटाकर 18 वर्ष कर दी गई। इस संशोधन विधेयक को संसद के दोनों सदनों लोकसभा और राज्यसभा में आवश्यक बहुमत से पारित किया गया और तत्पश्चात राष्ट्रपति की मंजूरी प्राप्त हुई।
तत्कालीन राजनीतिक और सामाजिक माहौल
1988 का भारत कई स्तरों पर परिवर्तन के दौर से गुजर रहा था। देश में युवाओं की संख्या तेजी से बढ़ रही थी। शिक्षा का दायरा विस्तृत हो रहा था, छात्र संगठन और युवा मंच अधिक मुखर हो रहे थे।
राजनीतिक दलों को भी यह महसूस होने लगा था कि युवा वर्ग की आकांक्षाओं और विचारों को लोकतांत्रिक प्रक्रिया में स्थान देना जरूरी है। मतदान की आयु घटाने से युवाओं को न केवल अधिकार मिला, बल्कि उन्हें यह एहसास भी हुआ कि देश के भविष्य के निर्माण में उनकी राय महत्वपूर्ण है।
युवाओं को मिला लोकतांत्रिक सशक्तिकरण
मतदान की आयु 18 वर्ष करने से करोड़ों नए मतदाता भारतीय चुनावी प्रणाली से जुड़े। इससे चुनावों में मतदाता आधार का विस्तार हुआ| राजनीतिक दलों को युवाओं के मुद्दों पर ध्यान देना पड़ा। शिक्षा, रोजगार, खेल, तकनीक और सामाजिक न्याय जैसे विषय चुनावी एजेंडे में प्रमुखता से आने लगे युवाओं को यह अवसर मिला कि वे अपने प्रतिनिधियों का चुनाव स्वयं करें और नीतिगत निर्णयों को प्रभावित करें।
कई देशों में किया जा चुका था 18 वर्ष
भारत अकेला ऐसा देश नहीं था जिसने मतदान की आयु 18 वर्ष की। इससे पहले कई लोकतांत्रिक देशों जैसे अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस और कनाडा में भी मतदान की न्यूनतम आयु 18 वर्ष निर्धारित की जा चुकी थी। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यह मान्यता बन चुकी थी कि
18 वर्ष की आयु में व्यक्ति शिक्षा के महत्वपूर्ण चरण पूरे कर चुका होता है। कई कानूनी और सामाजिक जिम्मेदारियां निभाता है| राष्ट्र और समाज से जुड़े मुद्दों को समझने की क्षमता रखता है। भारत ने भी इसी वैश्विक लोकतांत्रिक सोच के अनुरूप यह कदम उठाया।
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चुनावी राजनीति पर क्या दिखा प्रभाव
इस संशोधन के बाद भारतीय चुनावी राजनीति में कई बदलाव देखने को मिले। युवा मतदाताओं को लुभाने के लिए नई रणनीतियाँ बनीं, छात्र राजनीति और युवा संगठनों की भूमिका बढ़ी। प्रचार अभियानों में युवा नेतृत्व और नई सोच को स्थान मिला, राजनीतिक दलों ने अपने घोषणापत्रों में युवाओं से जुड़े मुद्दों को अधिक गंभीरता से शामिल करना शुरू किया।
लेकिन इसके साथ कुछ चुनौतियाँ भी सामने आईं जिसमें पहली बार मतदान करने वाले युवाओं में राजनीतिक जागरूकता की कमी थी भावनात्मक या प्रभावशाली प्रचार से प्रभावित होने की आशंका थी।
ग्रामीण और दूरदराज़ क्षेत्रों में मतदाता शिक्षा की आवश्यकता
इन चुनौतियों को देखते हुए बाद के वर्षों में मतदाता जागरूकता कार्यक्रम, चुनाव आयोग की पहलें और शैक्षिक अभियानों को मजबूती दी गई।
चुनाव आयोग नें निभाई भूमिका
भारत के चुनाव आयोग ने नए युवा मतदाताओं को जोड़ने और उन्हें जागरूक बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसके अंतर्गत
- मतदाता सूची में नाम जोड़ने की प्रक्रिया को सरल बनाया गया|
- कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में जागरूकता अभियान चलाए गए|
- बाद के वर्षों में ईवीएम, वोटर आईडी और डिजिटल पहलें शुरू की गईं। इन प्रयासों का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि युवा मतदाता केवल संख्या में नहीं, बल्कि समझ और जिम्मेदारी के साथ मतदान करें। मतदान की आयु घटाने से भारतीय लोकतंत्र को नई ऊर्जा मिली।
- युवा वर्ग बदलाव का वाहक बना,नई सोच और प्रश्नों के साथ राजनीति में प्रवेश किया|
- सामाजिक न्याय, पारदर्शिता और विकास जैसे मुद्दों पर मुखर हुआ|
- यह कहा जा सकता है कि इस संशोधन ने लोकतंत्र को अधिक समावेशी और प्रतिनिधिक बनाया।
आज के संदर्भ में महत्व
आज, जब भारत विश्व का सबसे बड़ा युवा आबादी वाला देश है, 1988 का यह निर्णय और भी अधिक प्रासंगिक प्रतीत होता है। डिजिटल युग में युवा सूचनाओं तक तेजी से पहुँच रखते हैं। युवा सामाजिक और राजनीतिक बहसों में सक्रिय हैं। नीति निर्माण पर प्रभाव डालने की क्षमता रखते हैं।
मतदान का अधिकार उन्हें लोकतांत्रिक व्यवस्था में एक सशक्त भागीदार बनाता है।






