अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ता यह कूटनीतिक गतिरोध केवल दो देशों की आपसी खींचतान नहीं है, बल्कि यह वैश्विक राजनीति के उस नासूर की तरह है जो रह-रहकर पूरी दुनिया की शांति को खतरे में डाल देता है। हाल ही में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के विरुद्ध जो मोर्चा खोला है, उसने न केवल वाशिंगटन और तेहरान के पुराने जख्मों को हरा कर दिया है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के गलियारों में भी बेचैनी बढ़ा दी है। ट्रंप का यह दावा कि ईरान पिछले 47 वर्षों से अमेरिका को गुमराह कर रहा है, केवल एक राजनीतिक बयान नहीं बल्कि एक गहरे अविश्वास की अभिव्यक्ति है जो 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद से ही दोनों देशों के बीच कायम है,डोनाल्ड ट्रंप ने अपने हालिया संबोधन में ईरान की विदेश नीति को ‘छल का दस्तावेज’ करार दिया है। उनका तर्क है कि तेहरान ने पिछले चार दशकों से अधिक समय से दुनिया की आंखों में धूल झोंकने का काम किया है।
ट्रंप के अनुसार, ईरान की रणनीति हमेशा से दोहरे मापदंडों पर आधारित रही है, जहाँ वह राजनयिक मंचों पर शांति और सहयोग की बात करता है, लेकिन जमीन पर उसकी गतिविधियां विस्तारवादी और आक्रामक होती हैं। ट्रंप ने सीधे तौर पर पूर्ववर्ती ओबामा प्रशासन की उदारवादी नीतियों को इस मौजूदा संकट का जिम्मेदार ठहराया है। उनका मानना है कि 2015 के परमाणु समझौते के माध्यम से ईरान को जो भारी-भरकम आर्थिक राहत दी गई, उसने उसे जिम्मेदार राष्ट्र बनाने के बजाय और अधिक दुस्साहसी बना दिया,ट्रंप के इन तीखे हमलों के जवाब में ईरान ने भी कड़ा रुख अख्तियार किया है।
तेहरान ने स्पष्ट किया है कि वह अमेरिका की ‘धौंस और दबाव’ की नीति के आगे घुटने नहीं टेकेगा। ईरानी नेतृत्व का मानना है कि अमेरिका एक संप्रभु राष्ट्र के रूप में ईरान के विकास को पचा नहीं पा रहा है और प्रतिबंधों के जरिए उसे पंगु बनाना चाहता है। ईरान का तर्क है कि वह किसी भी अंतरराष्ट्रीय संधि का उल्लंघन नहीं कर रहा है, बल्कि अमेरिका ही वह देश है जिसने बार-बार अंतरराष्ट्रीय प्रतिबद्धताओं को तोड़ा है। तेहरान ने साफ कर दिया है कि जब तक अमेरिका धमकी की भाषा बंद नहीं करता और लगाए गए प्रतिबंधों को वापस नहीं लेता, तब तक सार्थक बातचीत की कोई गुंजाइश नहीं है।
परमाणु कार्यक्रम बना विवाद की जड़
इस विवाद के केंद्र में जो सबसे जटिल मुद्दा है, वह है ईरान का परमाणु कार्यक्रम। वाशिंगटन की खुफिया एजेंसियों और नीति निर्माताओं को यह पक्का यकीन है कि ईरान शांतिपूर्ण उद्देश्यों की आड़ में परमाणु बम विकसित करने की दिशा में तेजी से बढ़ रहा है। अमेरिका की मांग है कि ईरान अपने यूरेनियम संवर्धन कार्यक्रम को पूरी तरह ठप करे और अपने परमाणु ठिकानों के दरवाजे अंतरराष्ट्रीय निरीक्षकों के लिए पूरी तरह खोल दे। दूसरी ओर, ईरान इस मांग को अपनी संप्रभुता में दखल मानताहै। उसका कहना है कि एक स्वतंत्र देश के रूप में उसे बिजली उत्पादन और कैंसर जैसी बीमारियों के इलाज के लिए चिकित्सा अनुसंधान हेतु परमाणु तकनीक विकसित करने का पूरा अधिकार है। यह तकनीकी गतिरोध अब एक ऐसी जिद में बदल चुका है जहाँ दोनों पक्ष खुद को सही साबित करने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार दिख रहे हैं।
read more :
- ऐतिहासिक फैसला – अमेरिकी
- हॉर्मुज़ के मुहाने पर ट्रंप का ‘प्रोजेक्ट फ्रीडम’
- ट्रंप ने ईरान का प्रस्ताव ठुकराया वार्ता पर संकट गहराया
घरेलू राजनीति और सत्ता का संतुलन
इस पूरे विवाद में दोनों देशों की आंतरिक राजनीति भी एक बड़ी भूमिका निभा रही है। अमेरिका में चुनावी सरगर्मी तेज हो रही है और डोनाल्ड ट्रंप अपनी छवि एक ऐसे ‘लौह पुरुष’ के रूप में गढ़ना चाहते हैं जो अमेरिकी हितों के लिए दुनिया के किसी भी तानाशाह या विरोधी देश से लोहा ले सकता है। ईरान को निशाना बनाकर वह अपने रूढ़िवादी मतदाता आधार को मजबूत करना चाहते हैं। वहीं, ईरान के भीतर भी सत्ता प्रतिष्ठान इस बाहरी दबाव और प्रतिबंधों को अपनी जनता के सामने एक ‘विदेशी षड्यंत्र’ के रूप में पेश कर रहा है, ताकि बढ़ती महंगाई और बेरोजगारी से जनता का ध्यान भटकाया जा सके और राष्ट्रवाद के नाम पर उन्हें एकजुट रखा जा सके।
भविष्य की राह
अंततः, अमेरिका और ईरान के बीच का यह संकट एक ऐसी मोड़ पर खड़ा है जहाँ से पीछे हटना दोनों के लिए अपनी राजनीतिक साख को दांव पर लगाने जैसा है। धमकियों, आरोपों और आर्थिक प्रतिबंधों के इस चक्र ने कूटनीतिक संवाद के लिए बहुत कम जगह छोड़ी है। वर्तमान में जिस तरह की बयानबाजी हो रही है, वह किसी समाधान की ओर ले जाने के बजाय अनिश्चितता की खाई को और गहरा कर रही है।
यदि अंतरराष्ट्रीय समुदाय और संयुक्त राष्ट्र ने समय रहते हस्तक्षेप नहीं किया और दोनों पक्षों को बातचीत की मेज पर लाने का कोई ठोस रोडमैप तैयार नहीं किया, तो पश्चिम एशिया की यह अनिश्चितता जल्द ही एक ऐसे वैश्विक संकट का रूप ले लेगी जिससे उबरना पूरी दुनिया के लिए कठिन होगा। आने वाले महीनों में वैश्विक नेताओं की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होगी, क्योंकि केवल समझदारी और संयम ही इस जलते हुए क्षेत्र को शांत कर सकते हैं।







