नई दिल्ली |पश्चिम एशिया में युद्ध के बादलों और गहराते तनाव के बीच वैश्विक शांति के लिए भारत की अहमियत अचानक बढ़ गई है। ईरान ने स्पष्ट संकेत दिए हैं कि यदि भारत इस क्षेत्र में तनाव कम करने और शांति स्थापित करने के लिए कोई कूटनीतिक पहल करता है, तो तेहरान उसका न केवल स्वागत करेगा, बल्कि उसमें सकारात्मक सहयोग भी देगा। यह बयान ऐसे समय में आया है जब नई दिल्ली में ब्रिक्स देशों के विदेश मंत्रियों की महत्वपूर्ण बैठक चल रही है और पूरी दुनिया की नजरें भारत के अगले कदम पर टिकी हैं।
ईरान का बड़ा बयान और भारत पर भरोसा
ब्रिक्स बैठक में हिस्सा लेने आए ईरान के उप विदेश मंत्री काजेम गरीबाबादी ने भारतीय अधिकारियों से मुलाकात के बाद मीडिया से बातचीत में भारत की जमकर सराहना की। गरीबाबादी ने कहा कि भारत दुनिया के उन गिने-चुने देशों में शामिल है जिसकी बात सभी पक्ष सुनते हैं। उन्होंने कहा कि भारत की संतुलित विदेश नीति और उसका बढ़ता वैश्विक प्रभाव उसे एक आदर्श मध्यस्थ बनाता है। ईरानी मंत्री ने इस बात पर जोर दिया कि भारत का किसी भी एक पक्ष की ओर झुकाव न होना ही उसकी सबसे बड़ी ताकत है। उन्होंने उम्मीद जताई कि भारत अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर क्षेत्र में स्थिरता बहाल करने की दिशा में सक्रिय भूमिका निभाएगा।
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ब्रिक्स बैठक में साझा बयान पर फंसा पेंच
नई दिल्ली में आयोजित ब्रिक्स बैठक के एजेंडे में पश्चिम एशिया का मुद्दा सबसे ऊपर रहा। बैठक में रूस, चीन, ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका और ईरान के प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया। हालांकि सूत्रों के मुताबिक बैठक के बाद जारी होने वाले साझा घोषणापत्र को लेकर सदस्य देशों के बीच लंबी खींचतान देखने को मिली। बताया जा रहा है कि एक प्रभावशाली सदस्य देश साझा बयान में कुछ ऐसी भाषा शामिल कराना चाहता था जिसे ईरान के खिलाफ माना जा सकता है। ईरान ने इस पर कड़ा ऐतराज जताते हुए कहा कि यह समय किसी एक देश को निशाना बनाने का नहीं बल्कि सामूहिक रूप से शांति की अपील करने का है। भारत इस गतिरोध को सुलझाने और एक ऐसा मसौदा तैयार करने में जुटा है जो सभी को स्वीकार्य हो और जिससे क्षेत्रीय शांति का सकारात्मक संदेश जाए।
भारत का संतुलित रुख और रणनीतिक मजबूरी
भारत अब तक इस संकट पर फूंक-फूंक कर कदम रखने की नीति पर चल रहा है। इसके पीछे कई रणनीतिक और आर्थिक कारण छिपे हैं। भारत के इजराइल के साथ रक्षा और तकनीक के क्षेत्र में मजबूत संबंध हैं, तो वहीं ईरान के साथ चाबहार बंदरगाह और ऊर्जा सुरक्षा को लेकर रणनीतिक साझेदारी है। इसके अलावा सऊदी अरब और यूएई जैसे खाड़ी देशों में रहने वाले लाखों भारतीय और वहां से आने वाला निवेश भारत की प्राथमिकता है। भारत अपनी जरूरत का अधिकांश कच्चा तेल इसी क्षेत्र से मंगाता है। इन्हीं वजहों से भारत किसी एक पक्ष के साथ खड़े होने के बजाय संवाद पर जोर दे रहा है।
पाकिस्तान की विफलता और भारत का बढ़ता कद
हाल के समय में पाकिस्तान ने भी अमेरिका और ईरान के बीच मध्यस्थ बनने की नाकाम कोशिश की थी, लेकिन अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने उसे गंभीरता से नहीं लिया। भारत ने इस पर कड़ा रुख अपनाते हुए पहले ही साफ कर दिया था कि वह किसी बिचौलिए या दलाल की भूमिका नहीं निभाएगा। विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान द्वारा सीधे तौर पर भारत से उम्मीद जताना यह साबित करता है कि पाकिस्तान की तुलना में भारत की साख कहीं अधिक मजबूत और विश्वसनीय है। भारत की छवि एक ऐसे जिम्मेदार राष्ट्र की है जो केवल अपने हित नहीं बल्कि वैश्विक स्थिरता की बात करता है। इसी कारण तेहरान ने भारत को एक प्रभावशाली और निष्पक्ष देश के रूप में मान्यता दी है।
सक्रिय कूटनीति की बढ़ती संभावनाएं
अभी तक भारत सरकार ने ईरान के इस प्रस्ताव पर कोई औपचारिक मुहर नहीं लगाई है। विदेश मंत्रालय का रुख अब भी यही है कि सभी पक्षों को संयम बरतना चाहिए और अंतरराष्ट्रीय कानूनों का पालन करना चाहिए। हालांकि कूटनीतिक गलियारों में यह चर्चा तेज है कि भारत आने वाले दिनों में बैक-चैनल डिप्लोमेसी के जरिए इजराइल, अमेरिका और ईरान के शीर्ष नेतृत्व से संपर्क साध सकता है। भारत की कोशिश होगी कि युद्ध की आग को और फैलने से रोका जाए ताकि वैश्विक अर्थव्यवस्था और विशेष रूप से समुद्री व्यापार मार्ग सुरक्षित रहें। ईरान ने भी भारतीय जहाजों को सुरक्षित रास्ता देने का भरोसा दिलाकर भारत के प्रति अपने नरम रुख का संकेत दे दिया है।
शांति स्थापना में भारत के लिए बड़ी चुनौती
राजनयिक मामलों के जानकारों का कहना है कि भारत के लिए यह एक अग्निपरीक्षा जैसा समय है। यदि भारत सफलतापूर्वक मध्यस्थता करता है तो यह 21वीं सदी की वैश्विक राजनीति में भारत की सबसे बड़ी कूटनीतिक जीत होगी। लेकिन इजराइल और ईरान की पुरानी दुश्मनी के बीच कोई बीच का रास्ता निकालना कांटों भरी राह पर चलने जैसा कठिन कार्य है। फिलहाल पूरी दुनिया की नजरें भारत के अगले कदम पर बनी हुई हैं।







