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बैगा जनजाति: ‘जंगलियों का जंगली’ कहे जाने वाले लोग, जिनका जीवन आज भी जंगल की सांसों से जुड़ा है

बैगा जनजाति: ‘जंगलियों का जंगली
नवजोत कौर सिद्धू
On: दिसम्बर 23, 2025 3:45 अपराह्न
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भारत की आदिवासी संस्कृति जितनी विविध है, उतनी ही रहस्यमयी भी। घने जंगलों, पहाड़ियों और नदियों के बीच रहने वाली कुछ जनजातियां आज भी आधुनिक दुनिया से लगभग अछूती हैं। ऐसी ही एक जनजाति है बैगा जनजाति, जिसे अक्सर ‘जंगलियों का जंगली’ कहा जाता है। यह नाम उन्हें ताने के रूप में नहीं, बल्कि उनके अत्यंत प्राकृतिक, जंगल-आधारित और आत्मनिर्भर जीवन-शैली के कारण मिला है। बैगा लोग प्रकृति के इतने निकट रहते हैं कि उनका जीवन, खान-पान, पहनावा और सोच जंगल से अलग करके देखी ही नहीं जा सकती। खास बात यह है कि बैगा जनजाति गोंड जनजाति को अपना बड़ा भाई मानती है और दोनों के बीच सांस्कृतिक और सामाजिक रिश्ता बेहद गहरा रहा है।

बैगा जनजाति: ‘जंगलियों का जंगली

जंगल और प्रकृति से जुड़ा अनोखा जीवन

बैगा जनजाति मुख्य रूप से मध्य भारत के क्षेत्रों जैसे मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड और उत्तर प्रदेश के कुछ हिस्सों में पाई जाती है। ये लोग घने जंगलों और पहाड़ी इलाकों में रहते हैं, जहां आज भी सड़क, बिजली और आधुनिक सुविधाएं सीमित हैं। बैगा खुद को जंगल का रक्षक मानते हैं। उनका विश्वास है कि जंगल सिर्फ रहने की जगह नहीं, बल्कि माता के समान है, जिसे नुकसान पहुंचाना पाप है।

बैगा परंपरागत रूप से ‘बेवर’ या झूम खेती से जुड़े रहे हैं, जिसमें जंगल के छोटे हिस्से को साफ कर सीमित समय के लिए खेती की जाती है और फिर उस जमीन को प्रकृति के हवाले कर दिया जाता है। उनका मानना है कि जमीन को बार-बार जोतना धरती माता को घायल करने जैसा है। यही कारण है कि वे हल चलाकर खेती करने से भी परहेज करते रहे हैं। यही सोच उन्हें अन्य जनजातियों से अलग बनाती है और शायद इसी कारण उन्हें ‘जंगलियों का जंगली’ कहा जाता है, क्योंकि वे प्रकृति के नियमों में किसी भी तरह का हस्तक्षेप नहीं चाहते।

खान-पान और पहनावे में दिखती है अलग पहचान

बैगा जनजाति का खान-पान पूरी तरह जंगल पर आधारित है। इनके भोजन में कंद-मूल, जंगली फल, महुआ, चिरौंजी, कोदो-कुटकी जैसे मोटे अनाज और जंगल से मिलने वाली सब्जियां शामिल होती हैं। मांसाहार भी इनके भोजन का हिस्सा है, लेकिन वह भी शिकार की पारंपरिक और सीमित पद्धतियों से जुड़ा होता है। भोजन पकाने के तरीके बेहद साधारण होते हैं, जिनमें मसालों का प्रयोग कम और प्राकृतिक स्वाद अधिक होता है।

पहनावे की बात करें तो बैगा पुरुष और महिलाएं आज भी अपनी पारंपरिक वेशभूषा में नजर आते हैं। पुरुष आमतौर पर कम कपड़े पहनते हैं, जो जंगल में काम करने के लिए सुविधाजनक होते हैं, जबकि महिलाएं सादे लेकिन रंगीन कपड़े पहनती हैं। बैगा महिलाओं के शरीर पर बने पारंपरिक टैटू उनकी पहचान का अहम हिस्सा हैं। ये टैटू सिर्फ सजावट नहीं, बल्कि सामाजिक स्थिति, परिवार और धार्मिक विश्वासों से जुड़े होते हैं। उनका मानना है कि मृत्यु के बाद शरीर के साथ केवल टैटू ही जाते हैं, इसलिए यही असली आभूषण हैं।

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गोंड को मानते हैं बड़ा भाई, गहरी सांस्कृतिक कड़ी

बैगा और गोंड जनजातियों का रिश्ता बेहद पुराना और गहरा है। बैगा लोग गोंड को अपना बड़ा भाई मानते हैं और कई सामाजिक-धार्मिक मामलों में गोंड परंपराओं का सम्मान करते हैं। ऐतिहासिक रूप से गोंड जनजाति राजनीतिक और सामाजिक रूप से अधिक संगठित रही, जबकि बैगा जंगलों में रहकर प्रकृति-केंद्रित जीवन जीते रहे। इसी कारण दोनों के बीच एक तरह का संरक्षण और मार्गदर्शन का संबंध बना।

धार्मिक मान्यताओं में भी दोनों जनजातियों के बीच समानताएं मिलती हैं। बैगा लोग प्रकृति-पूजक हैं। वे पहाड़, नदी, पेड़ और जंगल की आत्माओं की पूजा करते हैं। उनके देवता अमूर्त होते हैं और पूजा-पाठ सरल लेकिन आस्था से भरा होता है। बीमारी या प्राकृतिक आपदा के समय बैगा ओझा या गुनिया की भूमिका अहम होती है, जो जड़ी-बूटियों और पारंपरिक ज्ञान के जरिए इलाज करता है। इस पारंपरिक चिकित्सा ज्ञान के लिए बैगा जनजाति दूर-दूर तक जानी जाती है।

आज के दौर में बैगा जनजाति आधुनिकता के दबाव से जूझ रही है। शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार की कमी उनके सामने बड़ी चुनौती है। हालांकि सरकार और सामाजिक संगठनों द्वारा उन्हें मुख्यधारा से जोड़ने की कोशिशें की जा रही हैं, लेकिन बैगा समाज अपनी पहचान और परंपराओं को खोने से डरता भी है। उनका संघर्ष यही है कि विकास हो, लेकिन जंगल और संस्कृति की कीमत पर नहीं।

कुल मिलाकर, बैगा जनजाति भारत की उस आदिवासी विरासत का हिस्सा है, जो हमें प्रकृति के साथ संतुलन में जीने की सीख देती है। उन्हें ‘जंगलियों का जंगली’ कहना शायद आधुनिक नजरिए से आसान है, लेकिन हकीकत में वे जंगल, धरती और जीवन के सबसे पुराने और गहरे रिश्ते के सच्चे प्रतिनिधि हैं।

Dr Pankaj Sharma

fitness coach and writer mainly work on sports, fitness, Religious, foreign news, and technology

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