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अरावली पहाड़ियाँ पर घमासान: विकास की आड़ में प्रकृति के विनाश के आरोप, उत्तर भारत में क्यों भड़क रहे हैं प्रदर्शन…?

अरावली पहाड़ियाँ
नवजोत कौर सिद्धू
On: दिसम्बर 23, 2025 3:54 अपराह्न
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अरावली पहाड़ियाँ एक बार फिर देश की राजनीति, पर्यावरण और जनआंदोलन के केंद्र में हैं। उत्तर भारत के कई राज्यों—खासतौर पर राजस्थान, हरियाणा, दिल्ली और उत्तर प्रदेश—में इन पहाड़ियों को लेकर लगातार प्रदर्शन हो रहे हैं। कहीं किसान सड़क पर उतर रहे हैं, तो कहीं पर्यावरण कार्यकर्ता धरना दे रहे हैं। सवाल यह है कि आखिर अरावली को लेकर ऐसा क्या हो रहा है कि यह मुद्दा जनआक्रोश का कारण बन गया है।

अरावली पहाड़ियाँ

अरावली पहाड़ियाँ: पर्यावरणीय ढाल पर खतरा

अरावली पर्वतमाला दुनिया की सबसे प्राचीन पर्वत श्रृंखलाओं में से एक मानी जाती है। यह राजस्थान से शुरू होकर हरियाणा और दिल्ली होते हुए गुजरात तक फैली हुई है। अरावली का महत्व केवल भौगोलिक नहीं, बल्कि पर्यावरणीय संतुलन के लिहाज से बेहद अहम है। यह पर्वतमाला थार मरुस्थल को पूर्व की ओर फैलने से रोकने में प्राकृतिक दीवार का काम करती है। साथ ही, यह भूजल recharge, जैव विविधता संरक्षण और वायु गुणवत्ता बनाए रखने में भी बड़ी भूमिका निभाती है।

पिछले कुछ वर्षों में अरावली क्षेत्र में खनन, रियल एस्टेट परियोजनाएं, सड़क निर्माण और औद्योगिक विस्तार तेज़ी से बढ़ा है। खासकर हरियाणा और राजस्थान के सीमावर्ती इलाकों में अवैध खनन और पहाड़ियों को समतल करने की शिकायतें लंबे समय से सामने आती रही हैं। पर्यावरणविदों का कहना है कि इससे जंगल नष्ट हो रहे हैं, जल स्रोत सूख रहे हैं और दिल्ली-NCR जैसे क्षेत्रों में प्रदूषण और गर्मी बढ़ रही है।

इसी पृष्ठभूमि में जब सरकारों द्वारा कुछ नीतिगत बदलाव या ढील दिए जाने की खबरें सामने आती हैं, तो लोगों में यह आशंका गहराने लगती है कि अरावली को “विकास” के नाम पर खत्म किया जा रहा है। यही डर आज के प्रदर्शनों की सबसे बड़ी वजह बन रहा है।

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सरकारी नीतियाँ और कानूनी विवाद

अरावली को लेकर विवाद का एक बड़ा कारण अलग-अलग राज्यों की नीतियाँ और कानूनी व्याख्याएँ भी हैं। कई जगह यह सवाल उठता रहा है कि अरावली क्षेत्र को “वन भूमि” माना जाए या “गैर-वन भूमि”। इस परिभाषा के बदलते ही वहां निर्माण और खनन की अनुमति का रास्ता खुल जाता है।

कुछ समय पहले हरियाणा और राजस्थान में ऐसे प्रस्ताव सामने आए, जिनमें अरावली के कुछ हिस्सों को पर्यावरणीय प्रतिबंधों से बाहर रखने या नियमों में ढील देने की बात कही गई। सरकारों का तर्क था कि इससे विकास परियोजनाओं को गति मिलेगी और रोजगार के अवसर बढ़ेंगे। लेकिन पर्यावरण समूहों और स्थानीय लोगों ने इसे अरावली को कमजोर करने की कोशिश बताया।
कई मामलों में यह मुद्दा अदालतों तक भी पहुंचा है। सुप्रीम कोर्ट और नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल पहले ही अरावली क्षेत्र में खनन और अनियंत्रित निर्माण पर सख्त रुख दिखा चुके हैं। इसके बावजूद जब-जब नीतियों में बदलाव की चर्चा होती है, तब-तब लोगों को लगता है कि न्यायिक आदेशों की भावना को दरकिनार किया जा रहा है। इसी असमंजस और अविश्वास के चलते विरोध-प्रदर्शन तेज़ हो जाते हैंl

स्थानीय लोगों और भविष्य की चिंता

अरावली को लेकर हो रहे प्रदर्शनों में केवल पर्यावरण कार्यकर्ता ही नहीं, बल्कि स्थानीय ग्रामीण, किसान और आदिवासी समुदाय भी बड़ी संख्या में शामिल हैं। इन लोगों की आजीविका सीधे तौर पर जंगल, पहाड़ियों और पानी के स्रोतों पर निर्भर करती है। जब खनन होता है या पहाड़ काटे जाते हैं, तो सबसे पहले इन्हीं समुदायों पर असर पड़ता है।

ग्रामीणों का कहना है कि पहले जहां कुएं और तालाब साल भर भरे रहते थे, अब वे सूखने लगे हैं। खेती के लिए पानी की कमी बढ़ रही है और पशुपालन मुश्किल होता जा रहा है। इसके अलावा, जंगलों के कटने से जंगली जानवरों का आवास खत्म हो रहा है, जिससे मानव-वन्यजीव संघर्ष भी बढ़ रहा है।

प्रदर्शनकारियों की एक बड़ी चिंता भविष्य की पीढ़ियों को लेकर भी है। उनका मानना है कि अगर आज अरावली को नहीं बचाया गया, तो आने वाले समय में उत्तर भारत को गंभीर पर्यावरणीय संकट का सामना करना पड़ेगा। दिल्ली-NCR में बढ़ता प्रदूषण, घटता भूजल स्तर और अत्यधिक तापमान इसी का संकेत माना जा रहा है।

इसीलिए इन प्रदर्शनों में अक्सर “विकास बनाम विनाश” की बहस देखने को मिलती है। लोग यह सवाल उठा रहे हैं कि क्या अल्पकालिक आर्थिक लाभ के लिए इतने बड़े प्राकृतिक संरक्षक को दांव पर लगाना सही है। उनका संदेश साफ है—विकास जरूरी है, लेकिन वह प्रकृति को खत्म करके नहीं होना चाहिए।

कुल मिलाकर, अरावली पहाड़ियों को लेकर उत्तर भारत में हो रहे प्रदर्शन केवल एक क्षेत्रीय मुद्दा नहीं हैं, बल्कि यह पर्यावरण, नीति और आम नागरिक के भविष्य से जुड़ा सवाल बन चुके हैं। जब तक सरकारें, उद्योग और समाज मिलकर संतुलित समाधान की दिशा में नहीं बढ़ते, तब तक अरावली का यह विवाद और आंदोलन यूं ही गूंजता रहेगा।

Dr Pankaj Sharma

fitness coach and writer mainly work on sports, fitness, Religious, foreign news, and technology

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