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स्विट्जरलैंड के दावोस में आयोजित विश्व आर्थिक मंच में ‘बोर्ड ऑफ पीस’ (शांति बोर्ड) हुआ लॉन्च  

स्विट्जरलैंड के दावोस में आयोजित विश्व आर्थिक मंच में 'बोर्ड ऑफ पीस' (शांति बोर्ड) हुआ लॉन्च  
नवजोत कौर सिद्धू
On: जनवरी 23, 2026 6:20 अपराह्न
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डॉनल्ड ट्रंप द्वारा दावोस (स्विट्जरलैंड) में ‘बोर्ड ऑफ पीस’ (शांति बोर्ड) का लॉन्च एक अत्यंत महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक वैश्विक घटना है। 22 जनवरी 2026 को विश्व आर्थिक मंच (WEF) के दौरान पेश किया गया यह चार्टर अंतरराष्ट्रीय कूटनीति की दिशा बदलने वाला माना जा रहा है।

क्या है बोर्ड ऑफ पीस (Board of Peace) 

यह एक नया अंतरराष्ट्रीय संगठन है जिसे अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने ‘विश्व में शांति और स्थिरता’ स्थापित करने के उद्देश्य से बनाया है। हालांकि इसकी शुरुआत गाजा में युद्धविराम के बाद वहां के पुनर्निर्माण और शासन की देखरेख के लिए की गई थी, लेकिन अब इसका दायरा बढ़ाकर पूरे विश्व की समस्याओं तक फैला दिया गया है।

  • चार्टर का स्वरूप –  इसे एक ऐसे चार्टर के रूप में पेश किया गया है जो संयुक्त राष्ट्र (UN) की धीमी और पारंपरिक कार्यप्रणाली के विकल्प के रूप में काम कर सके।
  • प्रशासनिक ढांचा –  ट्रंप खुद इस बोर्ड के ‘संस्थापक अध्यक्ष’ (Founding Chairman) हैं। इस बोर्ड में एक ‘कार्यकारी परिषद’ (Executive Council) है जिसमें जेरेड कुशनर, मार्को रूबियो और टोनी ब्लेयर जैसे नाम शामिल हैं।

क्यों बनाया इसे ट्रंप ने 

ट्रंप लंबे समय से संयुक्त राष्ट्र (UN) की प्रभावशीलता पर सवाल उठाते रहे हैं। उनके अनुसार-

UN की विफलता – ट्रंप का मानना है कि UN अंतरराष्ट्रीय संघर्षों (जैसे यूक्रेन-रूस या गाजा युद्ध) को रोकने में विफल रहा है।

प्रगतिशील और त्वरित निर्णय –  वे एक ऐसा मंच चाहते थे जो नौकरशाही में न फंसकर ‘प्रैग्मैटिक’ (व्यावहारिक) और परिणामोन्मुखी निर्णय ले सके।

अमेरिका का प्रभुत्व – इस बोर्ड के माध्यम से ट्रंप वैश्विक कूटनीति की कमान सीधे अपने हाथ में रखना चाहते हैं, जहाँ निर्णयों पर उनका वीटो (Veto) और अंतिम अधिकार हो।

कौन से देश शामिल हुए और किन्हें बुलाया गया

ट्रंप ने दुनिया के लगभग 60 देशों को इसमें शामिल होने का निमंत्रण भेजा था। दावोस में हुए समारोह के दौरान स्थितियाँ इस प्रकार रहीं|

शामिल होने वाले प्रमुख देश (कुल 35 देशों की सहमति):

  • मध्य पूर्व –  सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात (UAE), कतर, बहरीन, मिस्र, जॉर्डन और इजरायल।
  • एशिया और अन्य –  पाकिस्तान (पीएम शहबाज शरीफ व्यक्तिगत रूप से उपस्थित थे), तुर्की, इंडोनेशिया, वियतनाम, कजाकिस्तान, उज्बेकिस्तान।
  • यूरोप और अमेरिका –  हंगरी (विक्टर ओर्बन), अर्जेंटीना (जेवियर माइली), बेलारूस, अज़रबैजान, आर्मेनिया, पैराग्वे।

शामिल नहीं होने वाले या दूरी बनाने वाले देश

  • भारत – भारत को निमंत्रण दिया गया था, लेकिन भारत इस समारोह से दूर रहा। भारत ने अभी तक अपनी आधिकारिक स्थिति स्पष्ट नहीं की है कि वह इसका हिस्सा बनेगा या नहीं।
  • पश्चिमी शक्तियां – फ्रांस (इमैनुएल मैक्रों), ब्रिटेन, जर्मनी, इटली, नॉर्वे और स्वीडन ने इसमें शामिल होने से इनकार कर दिया। उनका तर्क है कि यह संगठन UN के सिद्धांतों के खिलाफ है।
  • चीन –  चीन ने इसे सिरे से खारिज करते हुए कहा कि UN ही वैश्विक व्यवस्था का केंद्र होना चाहिए।
  • रूस – पुतिन को निमंत्रण मिला है, लेकिन रूस अभी इस पर विचार कर रहा है।

बोर्ड की कार्यप्रणाली और सदस्यता की शर्तें

यह बोर्ड सामान्य संगठनों से अलग ‘पे-टू-प्ले’ (Pay-to-Play) मॉडल जैसा दिखता है:

  • बिलियन डॉलर की फीस – जो देश बोर्ड में ‘स्थायी सदस्यता’ (Permanent Membership) चाहते हैं, उन्हें शांति कोष के लिए 1 बिलियन डॉलर (करीब 8,300 करोड़ रुपये) का योगदान देना होगा।
  • कार्यकाल – जो देश पैसे नहीं देंगे, वे केवल 3 साल के लिए अस्थायी सदस्य बन सकते हैं।
  • ट्रंप का अधिकार – चार्टर के अनुसार, अध्यक्ष (ट्रंप) के पास किसी भी सदस्य को हटाने और किसी भी फैसले को पलटने का पूर्ण अधिकार है।

 इसके लाभ और देशों को मिलने वाला समर्थन

बोर्ड ऑफ पीस से जुड़ने वाले देशों को निम्नलिखित फायदे होने का दावा किया गया है-

  • आर्थिक निवेश –  बोर्ड से जुड़े देशों में बुनियादी ढांचे और पुनर्निर्माण के लिए अमेरिकी और अंतरराष्ट्रीय निजी निवेश को प्राथमिकता दी जाएगी।
  • सुरक्षा गारंटी – संकट के समय बोर्ड अपनी ‘इंटरनेशनल सिक्योरिटी फोर्स’ के माध्यम से सदस्य देशों की रक्षा और स्थिरता सुनिश्चित करेगा।
  • सीधा संवाद –  सदस्य देशों को सीधे अमेरिकी प्रशासन और दुनिया के सबसे शक्तिशाली व्यापारिक नेताओं (जैसे एलन मस्क, जो दावोस में मौजूद थे) तक पहुंच मिलेगी।
  • विवादों का निपटारा –  सीमा विवाद या आंतरिक संघर्षों में बोर्ड एक मध्यस्थ के रूप में कार्य करेगा, जो UN की तुलना में बहुत तेजी से समाधान देने का वादा करता है।

क्या यह संयुक्त राष्ट्र (UN) की जगह लेगा

ट्रंप ने दावोस में एक सवाल के जवाब में कहा था कि यह बोर्ड UN की जगह ले “सकता है” (It might)। हालांकि, आधिकारिक तौर पर उन्होंने कहा कि वे UN के साथ मिलकर काम करेंगे। लेकिन जिस तरह से चार्टर को डिजाइन किया गया है, उससे स्पष्ट है कि यह भविष्य में एक ‘समानांतर विश्व सरकार’ की तरह कार्य कर सकता है।

ट्रंप का ‘बोर्ड ऑफ पीस’ विश्व कूटनीति में एक बड़ा जुआ है। जहाँ एक तरफ पाकिस्तान और अरब देश इसके समर्थन में खड़े हैं, वहीं भारत और यूरोप जैसे पुराने लोकतंत्र फिलहाल “इंतजार करो और देखो” (Wait and Watch) की नीति अपना रहे हैं।

Swati Pandey

A versatile writer mainly works on trending news, daily updates from politics, business, crime, current affairs and entertainment.

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