भारत भूमि वीर-प्रसवा रही है जिसने समय-समय पर ऐसे महापुरुषों को जन्म दिया है जिन्होंने अपने रक्त से स्वतंत्रता की गाथा लिखी। इन्हीं महापुरुषों में शीर्ष स्थान पर आते हैं मेवाड़ मुकुट वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप। हिंदू पंचांग के अनुसार वर्ष 2026 में महाराणा प्रताप की 486वीं जयंती 17 जून 2026 दिन बुधवार को अत्यंत श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाई जाएगी।
यद्यपि अंग्रेजी कैलेंडर (ग्रेगोरियन कैलेंडर) के अनुसार उनका जन्म 9 मई 1540 को हुआ था लेकिन भारत विशेषकर राजस्थान और उत्तरी राज्यों में उनकी जयंती पारंपरिक हिंदू कैलेंडर के आधार पर ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को मनाई जाती है।
शुभ मुहूर्त और तिथि का समय (वर्ष 2026)
वर्ष 2026 में ज्येष्ठ शुक्ल तृतीया तिथि के प्रारंभ और समापन का समय इस प्रकार है
- तृतीया तिथि का प्रारंभ- 16 जून 2026 को मध्यरात्रि के बाद 12-52 AM बजे (यानी तकनीकी रूप से 17 जून की शुरुआत)।
- तृतीया तिथि का समापन- 17 जून 2026 को रात्रि 09-38 PM बजे।
- उदयातिथि के अनुसार- 17 जून 2026 को पूरे दिन यह उत्सव मनाया जाएगा।
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प्रारंभिक जीवन और पारिवारिक पृष्ठभूमि
महाराणा प्रताप का जन्म 9 मई 1540 को राजस्थान के ऐतिहासिक कुंभलगढ़ दुर्ग में हुआ था। उनके पिता महाराणा उदय सिंह द्वितीय मेवाड़ के शासक थे और उनकी माता का नाम रानी जयवंता बाई था। बचपन में महाराणा प्रताप को स्थानीय भील जनजाति के लोग प्यार से ‘कीका’ कहकर पुकारते थे।
जयवंता बाई एक अत्यंत स्वाभिमानी और धार्मिक महिला थीं जिन्होंने प्रताप को बचपन से ही रामायण, महाभारत और राष्ट्रप्रेम की शिक्षा दी। यही कारण था कि बचपन से ही प्रताप के मन में मातृभूमि के प्रति अगाध प्रेम और स्वाभिमान का बीज अंकुरित हो गया था।
राज्याभिषेक और भीषण चुनौतियाँ
सन 1572 में महाराणा उदय सिंह के निधन के बाद मेवाड़ की परिस्थितियां अत्यंत जटिल थीं। मुगलों का प्रभाव बढ़ रहा था और चित्तौड़गढ़ पहले ही मुगलों के अधीन हो चुका था। प्रताप के सौतेले भाई जगमाल को गद्दी सौंपने की योजना थी लेकिन मेवाड़ के सामंतों और जनता ने प्रताप की योग्यता को देखते हुए 28 फरवरी 1572 को गोगुंदा में उनका राज्याभिषेक किया।
जब महाराणा प्रताप ने सत्ता संभाली तब उनके पास न तो कोई बड़ा महल था और न ही कोई बड़ी सेना। अकबर अपनी विस्तारवादी नीति के तहत पूरे भारत को अपने अधीन करना चाहता था। उसने महाराणा प्रताप को झुकाने के लिए चार शिष्टमंडल (जलाल खान, मानसिंह, भगवान दास और टोडरमल) भेजे लेकिन प्रताप ने स्पष्ट कर दिया कि वे मेवाड़ की संप्रभुता से कभी समझौता नहीं करेंगे और किसी विदेशी आक्रांता के सामने सिर नहीं झुकाएंगे।
हल्दीघाटी का ऐतिहासिक युद्ध (1576)
भारतीय इतिहास का सबसे भीषण और अविस्मरणीय युद्ध 18 जून 1576 को हल्दीघाटी के मैदान में लड़ा गया। एक तरफ अकबर की विशाल अनुशासित सेना थी जिसका नेतृत्व आमेर के राजा मानसिंह कर रहे थे, और दूसरी तरफ महाराणा प्रताप की छोटी सी सेना थी जिसमें भील सरदार राणा पूंजा के नेतृत्व में भील योद्धा और कुछ वफादार राजपूत शामिल थे। इस युद्ध में अफगान सेनापति हकीम खान सूरी ने भी प्रताप का साथ दिया था जो उनकी धर्मनिरपेक्ष सोच को दर्शाता है।
इस युद्ध में महाराणा प्रताप ने अदम्य साहस का परिचय दिया। उन्होंने मुगलों के छक्के छुड़ा दिए। हालांकि रणनीतिक कारणों और मुगलों की भारी संख्या के कारण प्रताप को जंगलों की ओर रुख करना पड़ा लेकिन मुगलों के हाथ न तो महाराणा प्रताप आए और न ही वे मेवाड़ पर पूर्ण अधिकार कर पाए।
स्वामीभक्त ‘चेतक’ और ‘झाला मान’ का बलिदान
हल्दीघाटी का युद्ध महाराणा प्रताप के पराक्रम के साथ-साथ उनके घोड़े चेतक की वफादारी के लिए भी अमर है। जब युद्ध क्षेत्र में महाराणा प्रताप संकट में घिरे थे तब उनके सादृश्य दिखने वाले झाला मान (मानसिंह झाला) ने महाराणा का मुकुट स्वयं पहनकर मुगलों को भ्रमित किया और वीरगति प्राप्त की।
इसी बीच घायल चेतक ने अपने स्वामी की जान बचाने के लिए 26 फीट लंबे बरसाती नाले को एक छलांग में पार कर लिया और सुरक्षित स्थान पर ले जाने के बाद अपने प्राण त्याग दिए। आज भी चेतक की समाधि हल्दीघाटी में बनी हुई है।
जंगलों का जीवन और मेवाड़ की वापसी (दिवेर का युद्ध)
हल्दीघाटी के बाद महाराणा प्रताप ने महलों का त्याग कर दिया। उन्होंने प्रतिज्ञा ली थी कि
“जब तक मेवाड़ पूरी तरह स्वतंत्र नहीं हो जाता, वे न तो सोने-चांदी के बर्तनों में भोजन करेंगे और न ही कोमल शय्या पर सोएंगे।”
उन्होंने अपने परिवार के साथ जंगलों में दिन बिताए जहाँ उन्हें कई बार घास की रोटियाँ तक खानी पड़ीं। भामाशाह नामक एक देशभक्त दानवीर ने अपनी संपूर्ण संपत्ति महाराणा के चरणों में अर्पित कर दी जिससे 25,000 सैनिकों का 12 वर्ष तक का खर्च उठाया जा सकता था।
इस वित्तीय सहायता के बल पर महाराणा ने पुनः सेना गठित की और सन 1582 में दिवेर के युद्ध में मुगलों को करारी शिकस्त दी। इसे ‘मेवाड़ का मैराथन’ भी कहा जाता है। धीरे-धीरे प्रताप ने चित्तौड़गढ़ और मांडलगढ़ को छोड़कर पूरे मेवाड़ को दोबारा स्वतंत्र करा लिया और चावंड को अपनी नई राजधानी बनाया।
19 जनवरी 1597 को एक शिकार के दौरान लगी गंभीर चोटों के कारण इस महान महानायक ने चावंड में अंतिम सांस ली। महाराणा प्रताप केवल एक राजा नहीं बल्कि स्वाभिमान, स्वतंत्रता, और राष्ट्रभक्ति की जीती-जागती मिसाल हैं। 17 जून 2026 को मनाई जाने वाली उनकी यह जयंती हमें याद दिलाती है कि परिस्थितियां चाहे कितनी भी विषम क्यों न हों अपने देश और आत्मसम्मान की रक्षा के लिए कभी समझौता नहीं करना चाहिए। उनका जीवन आज के युवाओं के लिए राष्ट्र निर्माण की राह में एक महान प्रेरणास्रोत है।







