नई दिल्ली।भारत की विदेश नीति के केंद्र में पिछले एक दशक से ‘चाबहार’ शब्द केवल एक बंदरगाह नहीं, बल्कि मध्य एशिया तक पहुँचने का एक सपना रहा है। लेकिन आज दिल्ली के सत्ता के गलियारों से जो खबरें छनकर आ रही हैं, वे इस सपने के थोड़ा धुंधलाने या शायद उसकी दिशा बदलने की ओर इशारा कर रही हैं। चर्चा आम है कि भारत चाबहार बंदरगाह के संचालन की सीधी जिम्मेदारी अब किसी ईरानी इकाई को सौंपने की तैयारी में है। यह खबर जितनी रणनीतिक है, उतनी ही पेचीदा भी।
एक सपना जो समंदर से शुरू हुआ
भारत के लिए चाबहार कभी भी महज एक बंदरगाह नहीं था। यह एक सपना था—पाकिस्तान के रास्ते को दरकिनार कर सीधे अफगानिस्तान और मध्य एशिया के बाजारों में प्रवेश करने का। जब भारत ने ईरान के सिस्तान-बलूचिस्तान प्रांत में इस पोर्ट को बनाने का जिम्मा लिया, तो इसे पाकिस्तान के ग्वादर पोर्ट (जिसे चीन बना रहा है) के जवाब के तौर पर देखा गया।सालों तक भारत ने यहाँ पैसा लगाया, क्रेनें भेजीं और पोर्ट को वर्किंग कंडीशन में लाया। लेकिन कूटनीति की दुनिया में जैसा दिखता है, वैसा हमेशा होता नहीं। पिछले कुछ समय से अंतरराष्ट्रीय राजनीति के समीकरण इतनी तेजी से बदले हैं कि भारत को अपनी रणनीति पर फिर से गौर करना पड़ रहा है।
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दवाब या कुछ और ?
दरअसल भारत सरकार ने एक प्रस्ताव तैयार किया है, जिसके तहत इंडिया पोर्ट्स ग्लोबल लिमिटेड (IPGL) की चाबहार परियोजना में मौजूद हिस्सेदारी ईरान की किसी संस्था को दी जा सकती है। यह हिस्सेदारी इंडिया पोर्ट्स ग्लोबल चाबहार फ्री ज़ोन (IPGCFZ) में है, जो इस पोर्ट के संचालन का अहम हिस्सा है।इस कदम का मकसद यह बताया जा रहा है कि परियोजना चलती रहे, लेकिन भारत सीधे तौर पर संचालन से जुड़ा न रहे। इससे भारत पर संभावित अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों का असर कम हो सकता है।
सुरक्षा की चिंताएं
पश्चिम एशिया के मौजूदा हालात भी इस फैसले के पीछे एक बड़ी वजह हैं। इजरायल-हमास युद्ध और लाल सागर में हूतियों के हमलों ने समुद्री व्यापार को बेहद जोखिम भरा बना दिया है। ईरान और इजरायल के बीच बढ़ते तनाव ने इस पूरे क्षेत्र को बारूद के ढेर पर खड़ा कर दिया है।ऐसी स्थिति में, चाबहार जैसे रणनीतिक स्थान पर अपनी सीधी मौजूदगी रखना भारत के लिए एक बड़ा सुरक्षा जोखिम भी हो सकता है। अगर कल को वहां कोई अप्रिय घटना होती है, तो भारत सीधे तौर पर विवाद में घसीटा जा सकता है। अपनी हिस्सेदारी किसी स्थानीय इकाई को सौंपकर भारत इस खतरे की आंच से खुद को बचा सकता है।
बजट में ही छिपे थे संकेत ?
हालिया केंद्रीय बजट में चाबहार को लेकर जो चुप्पी दिखी, उसने कई कूटनीतिक विशेषज्ञों के कान खड़े कर दिए थे। पहले जहाँ इस प्रोजेक्ट के लिए बड़ी राशि आवंटित होती थी, इस बार वहाँ ‘सावधानी’ ज्यादा और ‘निवेश’ कम नजर आया।यह साफ इशारा था कि भारत अब यहाँ बड़े निवेश के बजाय केवल इतना ही पैसा लगाना चाहता है जिससे उसका कब्जा बना रहे, लेकिन नुकसान न्यूनतम हो। सरकार का यह रवैया एक ऐसी ‘वेट एंड वॉच’ नीति की ओर ले जा रहा है, जहाँ हम अपनी जगह छोड़ना नहीं चाहते, पर उसे बचाने के लिए अपना हाथ भी नहीं जलाना चाहते।
तो क्या चाबहार की कहानी खत्म हो जाएगी ?
इसका जवाब है बिल्कुल नहीं।भारत पूरी तरह से चाबहार से बाहर कभी नहीं होगा। भारत ने इस बंदरगाह के जरिए इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर (INSTC) का जो सपना देखा है, वह रूस और यूरोप तक पहुँचने का सबसे छोटा रास्ता है। भारत केवल अपनी भूमिका को ‘सक्रिय संचालक’ से बदलकर ‘रणनीतिक भागीदार’ के रूप में ढाल रहा है।भविष्य में अगर अमेरिका और ईरान के संबंध सुधरते हैं, या ईरान पर से प्रतिबंध हटते हैं, तो भारत फिर से अपना नियंत्रण वापस ले सकता है। यह एक तरह का ‘पॉज बटन’ दबाना है ताकि सिस्टम क्रैश न हो।
चाबहार पोर्ट की कहानी भारत की बढ़ती महत्वाकांक्षाओं और वैश्विक बाधाओं के बीच के संघर्ष की कहानी है। यह बदलाव हमें यह सिखाता है कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में कुछ भी स्थायी नहीं होता—न दोस्त, न दुश्मन और न ही रणनीतियां। भारत का यह कदम एक ‘सुरक्षित निकास’ नहीं, बल्कि एक ‘चतुर बदलाव’ है। चाबहार की धड़कनें चलती रहेंगी, बस अब उसे चलाने वाला हाथ बदल जाएगा।भारत का यह फैसला कमजोरी की निशानी नहीं, बल्कि बदलती दुनिया के साथ कदम से कदम मिलाकर चलने की एक कला है। चाबहार आज भी भारत का है, बस उसका अंदाज अब नया होगा।







