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India-Russia Defense Pact: Approval of RELOS Military Logistic Support Agreement

RELOS (Reciprocal Exchange of Logistic Support)
नवजोत कौर सिद्धू
On: दिसम्बर 3, 2025 5:18 अपराह्न
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भारत और रूस के बीच रक्षा सहयोग दशकों से मजबूत रहा है, और वर्ष 2025 में इस साझेदारी ने एक और अहम मुकाम हासिल किया। रूस की संसद ‘स्टेट डूमा’ ने भारत-रूस सैन्य लॉजिस्टिक सपोर्ट समझौता यानी RELOS (Reciprocal Exchange of Logistic Support) को औपचारिक मंज़ूरी दे दी है। यह कदम न केवल दोनों देशों की रक्षा-रणनीति को नई दिशा देता है, बल्कि भविष्य के वैश्विक समीकरणों में भी इसका गहरा प्रभाव देखने को मिलेगा।

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भारत-रूस संबंधों में ऐतिहासिक गहराई

भारत और रूस (पूर्व सोवियत संघ) के संबंध हमेशा विश्वास और रणनीतिक सहयोग पर आधारित रहे हैं।

  • 1971 की भारत-सोवियत शांति एवं मैत्री संधि ने इन रिश्तों को अभूतपूर्व मजबूती दी।
  • रक्षा, अंतरिक्ष, ऊर्जा और विज्ञान के क्षेत्र में दोनों देशों ने वर्षों से एक-दूसरे का साथ दिया है।
  • भारत की सैन्य शक्ति का बड़ा भाग रूसी उपकरणों पर आधारित है — चाहे वह फाइटर जेट हों, सबमरीन हों या मिसाइल सिस्टम।

ऐसे में RELOS समझौते का मिलना स्वाभाविक रूप से रिश्तों को और मजबूत बनाता है।

RELOS समझौता क्या है?

RELOS का पूरा नाम है Reciprocal Exchange of Logistic Support — यानी पारस्परिक लॉजिस्टिक सपोर्ट का आदान-प्रदान।

इस समझौते के तहत:

  • दोनों देशों की नौसेना, वायुसेना और थलसेना एक-दूसरे के सैन्य अड्डों का उपयोग कर सकेंगी।
  • ईंधन भरने, मरम्मत, मेंटेनेंस, भोजन, उपकरण और लॉजिस्टिक सेवाएं साझा की जा सकेंगी।
  • जहाज, पनडुब्बियां, विमान और सैन्य कर्मियों के आवागमन में सुविधा मिलेगी।

यह प्रणाली ठीक उसी तरह है जैसे भारत ने अमेरिका, फ्रांस, ऑस्ट्रेलिया और जापान जैसे देशों के साथ समझौते किए हैं।

भारत को क्या लाभ होगा?

RELOS समझौता भारत को कई सामरिक और रणनीतिक लाभ प्रदान करेगा।

1. आर्कटिक और यूरोपीय क्षेत्र में रणनीतिक पहुँच बढ़ेगी

रूस के पास उत्तर में विशाल आर्कटिक क्षेत्र और प्रशांत महासागर के कई महत्वपूर्ण बंदरगाह हैं। भारत अब इन क्षेत्रों तक आसानी से पहुंच सकेगा — जो भविष्य की ऊर्जा सुरक्षा और सैन्य रणनीति के लिए जरूरी है।

2. भारतीय नौसेना की Indo-Pacific उपस्थिति मजबूत होगी

भारत अब रूसी बेस का उपयोग करके

  • लंबी दूरी पर गश्त
  • एंटी-पाइरेसी ऑपरेशन
  • संयुक्त अभ्यास

और अन्य सामरिक गतिविधियों को बेहतर ढंग से अंजाम दे सकेगा।

3. रक्षा अभियानों में लागत और समय की बचत

जहाँ पहले भारतीय जहाज़ों और विमानों को लंबा रास्ता तय करना पड़ता था, वहीं अब लॉजिस्टिक सपोर्ट रूस के बेस से आसानी से मिल सकेगा।
इससे सैन्य संसाधनों की आयु भी बढ़ेगी और खर्च घटेगा।

4. रूस के साथ सैन्य अभ्यास और टेक्नोलॉजी साझेदारी आसान होगी

संयुक्त सैन्य अभ्यास (जैसे INDRA Exercise) अब ज्यादा बड़े पैमाने पर आयोजित किए जा सकेंगे।
साथ ही, रक्षा टेक्नोलॉजी में साझेदारी और को-प्रोडक्शन के रास्ते भी खुलेंगे।

रूस को क्या लाभ होगा?

रूस भी इससे कम लाभ नहीं उठाएगा।

  • रूस हिंद महासागर क्षेत्र में अपनी रणनीतिक उपस्थिति मजबूत कर सकेगा।
  • भारतीय बंदरगाहों का उपयोग करके रूस अफ्रीका और दक्षिण एशिया तक अपनी पहुंच और प्रभाव बढ़ा सकेगा।
  • भारत के साथ व्यापार और ऊर्जा सहयोग भी इससे मजबूत होगा।

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वैश्विक राजनीति में RELOS का महत्व

भारत-रूस RELOS ऐसे समय में सामने आया है जब दुनिया में

  • अमेरिका-चीन प्रतिद्वंद्विता,
  • यूक्रेन युद्ध,
  • पश्चिमी देशों के रूस पर प्रतिबंध

जैसे मुद्दों ने भू-राजनीतिक परिस्थितियों को बदल दिया है।

यह समझौता इन परिस्थितियों में तीन बड़े संदेश देता है:

1. भारत अपनी रणनीतिक स्वायत्तता बनाए हुए है

भारत पश्चिमी देशों के साथ भी जुड़े समझौते करता है और रूस के साथ भी — यह भारत की स्वतंत्र विदेश नीति का प्रतीक है।

2. रूस के लिए भारत एक विश्वसनीय साझेदार है

भारत रूस के लिए एशिया में और हिंद महासागर में सबसे बड़ा संतुलन साझेदार बन गया है।

3. एशिया-यूरोप कॉरिडोर में नई शक्ति बन रहा है भारत

यह समझौता आने वाली वैश्विक शक्ति संरचना में भारत की भूमिका को और मजबूत करता है।

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चुनौतियाँ और संभावित विवाद

हर समझौते के साथ चुनौतियाँ भी होती हैं—

1. पश्चिमी देशों की प्रतिक्रियाएँ

अमेरिका और यूरोपीय देशों के कुछ रणनीतिक समूह इसे रूस के पक्ष में भारत का झुकाव मान सकते हैं।

2. रूस-चीन संबंध और भारत का समीकरण

रूस आज चीन का बड़ा साझेदार है। भारत को यह सुनिश्चित करना होगा कि इस समझौते से कोई संवेदनशील सैन्य जानकारी अप्रत्यक्ष रूप से चीन तक न पहुँचे।

3. भारत की रक्षा निर्भरता

भारत को यह भी ध्यान रखना होगा कि वह रूसी हार्डवेयर पर अपनी निर्भरता को धीरे-धीरे कम करे और घरेलू रक्षा निर्माण को बढ़ावा दे।

निष्कर्ष

भारत-रूस RELOS समझौता ऐतिहासिक, सामरिक और भविष्य-निर्माणकारी है।

यह न केवल दोनों देशों के बीच रक्षा और लॉजिस्टिक सहयोग को गति देगा, बल्कि हिंद महासागर से लेकर आर्कटिक तक भारत की रणनीतिक उपस्थिति को मजबूत करेगा।

वैश्विक राजनीति में बदलते समीकरणों के बीच यह समझौता भारत की रणनीतिक स्वायत्तता, साझीदारियों की विविधता, और दीर्घकालिक रक्षा योजनाओं का प्रतीक है।

आने वाले वर्षों में यह सहयोग दोनों देशों को नए आर्थिक, सुरक्षा और राजनीतिक लाभ देने में सक्षम होगा, और भारत-रूस दोस्ती को एक नई ऊंचाई पर ले जाएगा।

Pradeep Pandey

A versatile writer mainly works on politics, business, crime, current affairs and entertainment.

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