ग्रीनलैंड (Greenland) को लेकर वर्तमान में जो वैश्विक तनाव उत्पन्न हुआ है, वह अंतरराष्ट्रीय राजनीति के एक नए और गंभीर अध्याय की ओर इशारा कर रहा है। डेनमार्क के इस स्वायत्त क्षेत्र पर अमेरिका और यूरोपीय देशों के बीच बढ़ते मतभेदों ने इसे दुनिया के सबसे गर्म भू-राजनीतिक केंद्रों में से एक बना दिया है।
यूरोपीय देश ग्रीनलैंड में अपनी सेना क्यों भेज रहे हैं?
यूरोपीय देशों द्वारा ग्रीनलैंड में अपने सैनिकों (भले ही वे संख्या में कम हों) को भेजने के पीछे कई महत्वपूर्ण कूटनीतिक और रणनीतिक कारण हैं
संप्रभुता की सुरक्षा – डेनमार्क ग्रीनलैंड की रक्षा के लिए जिम्मेदार है। अमेरिकी प्रशासन द्वारा ग्रीनलैंड को “खरीदने” या “अधिग्रहण” करने की इच्छा जताए जाने के बाद, यूरोपीय देशों ने डेनमार्क की क्षेत्रीय अखंडता का समर्थन करने के लिए यह कदम उठाया है।
प्रतीकात्मक प्रतिरोध – 1, 2 या 15 सैनिकों की यह संख्या सैन्य युद्ध के लिए नहीं, बल्कि एक ‘राजनीतिक संदेश’ देने के लिए है। यह दर्शाता है कि यूरोप ग्रीनलैंड को अकेला नहीं छोड़ेगा और किसी भी एकतरफा अमेरिकी कार्रवाई का सामूहिक विरोध करेगा।
नाटो (NATO) की प्रासंगिकता – ग्रीनलैंड नाटो के सुरक्षा घेरे में आता है। यदि अमेरिका (जो खुद नाटो का नेतृत्व करता है) किसी नाटो सदस्य की जमीन पर दावा करता है, तो यह गठबंधन की बुनियादी नींव को हिला देता है। यूरोप यह संदेश दे रहा है कि सुरक्षा केवल अमेरिका के भरोसे नहीं छोड़ी जा सकती।
खनिज और संसाधन – ग्रीनलैंड में ‘रेयर अर्थ एलिमेंट्स’ (दुर्लभ खनिज) का भंडार है, जो भविष्य की तकनीक और चिप्स बनाने के लिए अनिवार्य हैं। यूरोप नहीं चाहता कि इन पर केवल अमेरिका का एकाधिकार हो।
कितने सैनिक भेजे हैं अब तक किन-किन देशों ने
यूरोपीय देशों ने एक ‘रैपिड रिस्पॉन्स’ और ‘ऑपरेशन आर्कटिक एंड्योरेंस’ (Operation Arctic Endurance) के तहत अपने सैनिकों को तैनात करना शुरू किया है
| देश | सैनिकों की संख्या | मुख्य कार्य |
| फ्रांस | लगभग 15 | ये माउंटेन इन्फैंट्री (पहाड़ी युद्ध विशेषज्ञ) हैं जो ‘नूक’ (Nuuk) में तैनात हैं। |
| जर्मनी | 13 | यह एक टोही (Reconnaissance) टीम है जो सुरक्षा व्यवस्था का जायजा ले रही है। |
| स्वीडन | 3 (अधिकारी) | डेनमार्क के साथ सैन्य अभ्यास की योजना बनाने के लिए। |
| नार्वे | 2 | भविष्य के सहयोग और मैपिंग के लिए भेजे गए विशेषज्ञ। |
| ब्रिटेन | 1 | एक सैन्य अधिकारी को सैन्य समूह में ‘एंबेडेड’ किया गया है। |
| नीदरलैंड | 1 | एक नौसैनिक अधिकारी को समन्वय के लिए भेजा गया है। |
नोट – डेनमार्क स्वयं अपनी सैन्य उपस्थिति को लगातार बढ़ा रहा है और उसने अपने कई लड़ाकू विमान और जहाज वहां तैनात किए हैं।
अमेरिका के पास वहां कितने सैनिक हैं और मिलेगा उसे क्या फायदा
ग्रीनलैंड में अमेरिका की स्थिति यूरोपीय देशों की तुलना में कहीं अधिक मजबूत और पुरानी है।
- सैनिकों की संख्या – अमेरिका के पास ग्रीनलैंड के थुले एयर बेस (Pituffik Space Base) पर स्थायी रूप से सैकड़ों सैनिक और तकनीकी कर्मचारी तैनात हैं। इसके अलावा, अमेरिका के पास वहां अत्याधुनिक ‘मिसाइल डिफेंस अर्ली वार्निंग सिस्टम’ है।
- अपेक्षाकृत तुलना – जहां यूरोप ने अभी मात्र 30-40 विशेषज्ञ भेजे हैं, वहीं अमेरिका के पास वहां पहले से ही रणनीतिक बुनियादी ढांचा और भारी सैन्य उपकरण मौजूद हैं।
अमेरिका को होने वाले फायदे
- राष्ट्रीय सुरक्षा – अमेरिका का मानना है कि यदि वह ग्रीनलैंड को नियंत्रित नहीं करता, तो भविष्य में चीन या रूस वहां अपना प्रभाव बढ़ा सकते हैं, जो अमेरिका के लिए सीधा खतरा होगा।
- आर्कटिक मार्ग – बर्फ पिघलने के साथ आर्कटिक में नए समुद्री रास्ते खुल रहे हैं। ग्रीनलैंड पर नियंत्रण का मतलब है वैश्विक व्यापार के नए रास्तों पर कब्जा।
- संसाधन – अमेरिका की नजर वहां के सोने, हीरे और सबसे महत्वपूर्ण ‘यूरेनियम’ व ‘लीथियम’ पर है।
राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप – ग्रीनलैंड राष्ट्रीय सुरक्षा के कारण चाहते हैं हासिल करना
इस सैन्य तैनाती से किसको क्या फायदा और नुकसान क्या
यह स्थिति एक दोधारी तलवार की तरह है|
फायदे
- डेनमार्क/ग्रीनलैंड को – उन्हें यह आश्वासन मिलता है कि पूरा यूरोप उनके साथ खड़ा है। इससे अमेरिका पर कूटनीतिक दबाव बढ़ता है।
- यूरोप को – यूरोप ने पहली बार अमेरिका को यह दिखाया है कि वह अपनी सुरक्षा के लिए केवल वाशिंगटन पर निर्भर नहीं है।
नुकसान
- नाटो (NATO) में दरार – सबसे बड़ा नुकसान नाटो गठबंधन को हो सकता है। यदि अमेरिका और उसके यूरोपीय सहयोगी इस मुद्दे पर आपस में भिड़ते हैं, तो इसका सीधा फायदा रूस और चीन को होगा।
- स्थानीय लोगों को डर – ग्रीनलैंड के निवासी (Inuit) अपनी शांतिप्रिय जीवनशैली के लिए जाने जाते हैं। वहां सेनाओं का जमावड़ा स्थानीय संस्कृति और पर्यावरण के लिए खतरा पैदा कर सकता है।
- आर्थिक अस्थिरता – इस विवाद के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजारों में अनिश्चितता पैदा हो सकती है, विशेषकर आर्कटिक क्षेत्र में होने वाले निवेश को लेकर।
ग्रीनलैंड में इन 1, 2 या 15 सैनिकों का पहुंचना किसी बड़े युद्ध की शुरुआत नहीं, बल्कि एक ‘डिप्लोमैटिक चेकमेट’ (कूटनीतिक शह-मात) की कोशिश है। यूरोप यह स्पष्ट कर रहा है कि 21वीं सदी में किसी भी देश की जमीन को सैन्य दबाव या पैसों के दम पर नहीं बदला जा सकता।







