व्यापारभारतविदेशी समाचारखेलजीवन शैलीराजनीतिधर्मभौगोलिकसेलिब्रेटीज़शिक्षास्वास्थ्य

तेहरान की सड़कों पर उबाल- जब खामोशी टूट गई- शाह जिंदाबाद के लगे नारे

तेहरान की सड़कों पर उबाल- जब खामोशी टूट गई- शाह जिंदाबाद के लगे नारे
नवजोत कौर सिद्धू
On: जनवरी 10, 2026 12:33 अपराह्न
Follow Us:

तेहरान की सर्द सुबहें आमतौर पर ट्रैफिक, चाय की दुकानों और भागती ज़िंदगी से भरी होती हैं, लेकिन इन दिनों राजधानी की सड़कों पर एक अलग ही बेचैनी तैर रही है। ईरान की आर्थिक बदहाली, गिरती मुद्रा, बढ़ती महंगाई और बेरोज़गारी ने आम लोगों के धैर्य की अंतिम सीमा तोड़ दी है। यही कारण है कि तेहरान समेत देश के कई बड़े शहरों में लोग सड़कों पर उतर आए। शुरुआत छोटे समूहों से हुई, पर कुछ ही दिनों में यह विरोध जनसैलाब में बदल गया।

लोगों के चेहरों पर गुस्सा था, आवाज़ों में थकान और नारों में वर्षों की दबी हुई पीड़ा। बाजार बंद होने लगे, यातायात थम गया और सरकारी इमारतों के आसपास भारी भीड़ जमा होने लगी। यह केवल महंगाई के खिलाफ़ विरोध नहीं था, बल्कि उस व्यवस्था के खिलाफ़ एक खुली चुनौती थी, जिसने जनता को लंबे समय तक चुप रहने पर मजबूर किया।

इन प्रदर्शनों में सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि भीड़ में “शाह ज़िंदाबाद” जैसे नारे भी सुनाई देने लगे। यह नारा केवल अतीत की याद नहीं था, बल्कि वर्तमान सत्ता के प्रति गहरे असंतोष का प्रतीक बन चुका था। कई लोगों के लिए यह नारा पुराने राजशाही शासन की वापसी की इच्छा नहीं, बल्कि मौजूदा हालात से उपजी हताशा की अभिव्यक्ति था।

तेहरान की गलियों में चलते हुए यह साफ़ महसूस किया जा सकता था कि यह आंदोलन किसी एक वर्ग तक सीमित नहीं है। इसमें युवा थे, बुज़ुर्ग थे, महिलाएँ थीं, छात्र थे और वे लोग भी थे, जिनकी ज़िंदगी की सारी पूंजी अब केवल उम्मीद बनकर रह गई है।

शहरों से उठती एक ही आवाज़: व्यवस्था से असंतोष

तेहरान के अलावा इस्फ़हान, शीराज़, करमानशाह, तबरीज़, क़ोम और मशहद जैसे कई शहरों में भी हालात कुछ अलग नहीं रहे। हर शहर में विरोध का स्वर अलग तरीके से गूंजा, लेकिन भाव एक ही था—हम अब और चुप नहीं रहेंगे। कहीं लोग सड़कों पर बैठ गए, कहीं दुकानों के शटर गिर गए और कहीं सरकारी दफ्तरों के बाहर नारे गूंजने लगे।

ईरान की अर्थव्यवस्था लंबे समय से दबाव में है। अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों, आंतरिक प्रशासनिक चुनौतियों और सीमित रोज़गार अवसरों ने आम आदमी की कमर तोड़ दी है। युवाओं के लिए डिग्री होने के बावजूद नौकरी मिलना सपना बन चुका है। परिवारों का बजट रोज़मर्रा की ज़रूरतों में ही खत्म हो जाता है। इसी हताशा ने लोगों को सड़कों पर ला खड़ा किया।

इन प्रदर्शनों में “शाह ज़िंदाबाद” के नारे केवल एक राजनीतिक संदेश नहीं थे, बल्कि यह संकेत थे कि लोग अब पुराने और नए, दोनों विकल्पों पर सोचने को मजबूर हो चुके हैं। कुछ लोग इसे अतीत की ओर लौटने की चाह मानते हैं, तो कुछ इसे वर्तमान सत्ता के प्रति अविश्वास का प्रतीक मानते हैं।

भीड़ में कई चेहरे ऐसे भी थे, जो खुलकर कुछ बोलना नहीं चाहते थे, लेकिन उनकी आंखें बहुत कुछ कह रही थीं। वे जानते थे कि यह विरोध केवल आज की बात नहीं है, बल्कि यह आने वाले समय की दिशा तय कर सकता है। कई जगहों पर सुरक्षा बलों और प्रदर्शनकारियों के बीच तनाव भी देखने को मिला। कहीं हल्की झड़पें हुईं, कहीं लोगों को तितर-बितर किया गया, और कहीं कुछ समय के लिए हालात पूरी तरह नियंत्रण से बाहर होते दिखाई दिए।

“शाह ज़िंदाबाद” से आगे: ईरान का भविष्य किस ओर

इन प्रदर्शनों ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है—क्या ईरान केवल आर्थिक सुधार चाहता है या वह अपने राजनीतिक और सामाजिक ढांचे में भी बदलाव की तलाश में है। सड़कों पर उठती आवाज़ें अब सिर्फ़ रोटी और रोज़गार तक सीमित नहीं रहीं, बल्कि आज़ादी, सम्मान और बेहतर भविष्य की मांग बन चुकी हैं।

युवा पीढ़ी विशेष रूप से इस आंदोलन की आत्मा बनकर उभरी है। उनके लिए यह केवल विरोध नहीं, बल्कि अपने अस्तित्व की लड़ाई है। वे उस ईरान को देखना चाहते हैं, जहाँ विचार व्यक्त करना अपराध न हो, जहाँ अवसर सीमित लोगों तक न सिमटे हों और जहाँ भविष्य केवल वादों पर नहीं, बल्कि ठोस उम्मीदों पर टिका हो।

“शाह ज़िंदाबाद” जैसे नारे इस बात का संकेत देते हैं कि जनता अब इतिहास के हर पन्ने को फिर से देखने लगी है। वे यह तुलना कर रहे हैं कि किस दौर में क्या बेहतर था और किस दौर ने उन्हें क्या दिया। यह तुलना भले ही सभी को स्वीकार्य न हो, लेकिन यह साफ़ दिखाती है कि मौजूदा हालात ने लोगों को गहराई से सोचने पर मजबूर कर दिया है।

ईरान के इन प्रदर्शनों में एक खास बात यह भी रही कि लोग डर के बावजूद बाहर आए। वे जानते थे कि इसका अंजाम आसान नहीं होगा, फिर भी उन्होंने चुप्पी को तोड़ना ज़रूरी समझा। यह साहस ही इस आंदोलन की सबसे बड़ी ताकत बन गया।

आज ईरान की सड़कों पर जो गूंज सुनाई दे रही है, वह केवल नारों की आवाज़ नहीं है, बल्कि वह एक समाज की आत्मा की पुकार है। यह पुकार बताती है कि बदलाव की इच्छा अब दबाई नहीं जा सकती। चाहे यह आंदोलन किस दिशा में जाए, लेकिन इतना तय है कि इसने ईरान के राजनीतिक और सामाजिक इतिहास में एक नया अध्याय जोड़ दिया है।तेहरान की सड़कों से उठी यह आवाज़ अब पूरे देश में फैल चुकी है। यह आवाज़ न केवल वर्तमान से सवाल कर रही है, बल्कि भविष्य से भी जवाब मांग रही है। ईरान आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है, जहाँ हर कदम उसके आने वाले कल को तय करेगा। और शायद यही कारण है कि सड़कों पर गूंजते नारे अब केवल विरोध नहीं, बल्कि इतिहास लिखने की कोशिश बन चुके हैं।

Dr Pankaj Sharma

fitness coach and writer mainly work on sports, fitness, Religious, foreign news, and technology

Join WhatsApp

Join Now

Join Telegram

Join Now

Leave a Comment