भारत और यूरोपीय संघ (EU) के बीच होने वाला यह रक्षा और सुरक्षा समझौता न केवल द्विपक्षीय संबंधों के लिए, बल्कि वैश्विक भू-राजनीति के लिए भी एक ऐतिहासिक मोड़ है। जनवरी 2026 में दिल्ली में आयोजित होने वाला यह शिखर सम्मेलन भारत की विदेश नीति की एक बड़ी जीत माना जा रहा है।
भारत-EU शिखर सम्मेलन 2026 – मुख्य विवरण
- तारीख – यह शिखर सम्मेलन 27 जनवरी 2026 को नई दिल्ली में आयोजित किया जाएगा।
- विशेष संदर्भ – यूरोपीय परिषद के अध्यक्ष एंटोनियो कोस्टा और यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन भारत के 77वें गणतंत्र दिवस (26 जनवरी) के अवसर पर मुख्य अतिथि के रूप में शामिल होंगे। इसके ठीक अगले दिन 16वां भारत-EU शिखर सम्मेलन होगा।
- हस्ताक्षरकर्ता – इस ऐतिहासिक समझौते पर भारत की ओर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और यूरोपीय संघ की ओर से उर्सुला वॉन डेर लेयेन तथा एंटोनियो कोस्टा हस्ताक्षर करेंगे।
सुरक्षा और रक्षा समझौते का स्वरूप (SDP)
यूरोपीय संघ ने भारत के साथ जिस Security and Defence Partnership (SDP) को मंजूरी दी है, वह इसे केवल एक ‘व्यापारिक गुट’ से हटाकर भारत का एक ‘रणनीतिक रक्षा साझेदार’ बनाता है।
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सुरक्षा की दृष्टि से मुख्य बिंदु
- वर्गीकृत जानकारी का साझाकरण (SOIA) – दोनों पक्ष ‘Security of Information Agreement’ पर बातचीत शुरू करेंगे। इससे भारत और यूरोपीय देश एक-दूसरे के साथ अत्यंत गोपनीय रक्षा और खुफिया जानकारी साझा कर सकेंगे।
- इंटरऑपरेबिलिटी – भारत और यूरोपीय संघ की सेनाओं के बीच बेहतर तालमेल के लिए संयुक्त अभ्यास और लॉजिस्टिक्स सहयोग बढ़ाया जाएगा।
- SAFE कार्यक्रम – भारतीय रक्षा कंपनियों को यूरोपीय संघ के €150 अरब के ‘Security Action for Europe’ (SAFE) फंड तक पहुंच मिल सकती है, जो रक्षा नवाचार के लिए उपयोग किया जाता है।
आतंकवादियों पर कैसे गिरेगी गाज
यह समझौता आतंकवाद के खिलाफ भारत की ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति को वैश्विक मजबूती प्रदान करता है।
- आतंकवाद का वित्तपोषण रोकना – दोनों पक्ष FATF (Financial Action Task Force) के ढांचे के भीतर आतंकवादियों को मिलने वाली फंडिंग के रास्तों को ब्लॉक करने के लिए रीयल-टाइम डेटा साझा करेंगे।
- सीमा पार आतंकवाद पर कड़ा रुख – यूरोपीय संघ ने पहली बार स्पष्ट रूप से सीमा पार आतंकवाद की निंदा करते हुए भारत के रुख का समर्थन किया है। अब भारत, लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद जैसे संगठनों के खिलाफ यूरोपीय देशों में कानूनी और प्रतिबंधात्मक कार्रवाई के लिए दबाव बना सकेगा।
- साइबर और ऑनलाइन कट्टरपंथ – आतंकवादियों द्वारा इंटरनेट के माध्यम से फैलाए जा रहे कट्टरपंथ को रोकने के लिए ‘यूरोपोल’ (Europol) और भारतीय जांच एजेंसियां (जैसे NIA और CBI) मिलकर काम करेंगी।
- खुफिया तंत्र का एकीकरण – आतंकियों की आवाजाही और उनके ठिकानों की जानकारी अब ब्रसेल्स और दिल्ली के बीच और तेजी से साझा होगी।
भारत को होने वाले प्रमुख लाभ
भारत के लिए यह समझौता कई मायनों में गेम-चेंजर साबित होगा|
- तकनीकी हस्तांतरण (Tech Transfer) – भारत को फ्रांस, जर्मनी और स्वीडन जैसे देशों से अत्याधुनिक रक्षा तकनीक प्राप्त करने में आसानी होगी, जिससे ‘मेक इन इंडिया’ को बढ़ावा मिलेगा।
- मुक्त व्यापार समझौता (FTA) – रक्षा सौदे के साथ ही बहुप्रतीक्षित FTA पर भी मुहर लगने की संभावना है, जिससे भारतीय निर्यातकों को 27 यूरोपीय देशों के विशाल बाजार तक मुफ्त पहुंच मिलेगी।
- चीन पर निर्भरता कम करना – हिंद-प्रशांत क्षेत्र (Indo-Pacific) में चीन के बढ़ते प्रभाव को देखते हुए यह समझौता भारत को एक मजबूत समुद्री सुरक्षा कवच प्रदान करता है।
- श्रमिक गतिशीलता (Mobility) – भारतीय पेशेवरों और छात्रों के लिए यूरोपीय संघ में वीजा और काम करने की शर्तों को आसान बनाने के लिए एक ‘मोबिलिटी एग्रीमेंट’ भी इस सम्मेलन का हिस्सा है।
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भारत के लिए यह क्यों जरूरी था?
- रणनीतिक स्वायत्तता – रूस-यूक्रेन युद्ध और बदलती वैश्विक व्यवस्था के बीच भारत केवल एक गुट पर निर्भर नहीं रहना चाहता। EU के साथ रक्षा समझौता भारत की निर्भरता को विविध (Diversify) बनाता है।
- हिंद-प्रशांत सुरक्षा – भारत चाहता है कि हिंद महासागर में नियम-आधारित व्यवस्था बनी रहे। EU की नौसैनिक उपस्थिति (Operation Atalanta) के साथ जुड़कर भारत अपनी समुद्री सीमाओं को अधिक सुरक्षित कर सकता है।
- आर्थिक सुरक्षा – यूरोपीय संघ भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार है। सुरक्षा संबंधों के मजबूत होने से निवेश का माहौल और बेहतर होता है।
दिल्ली में होने वाला यह शिखर सम्मेलन भारत और यूरोपीय संघ के रिश्तों को “व्यापार से विश्वास” (Trade to Trust) की ओर ले जाएगा। आतंकवाद के खिलाफ वैश्विक एकजुटता और रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की दिशा में यह समझौता भारत के लिए एक मील का पत्थर साबित होगा।







