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वैशाख अमावस्या कब है 2026? तिथि पूजा विधि अनुष्ठान और महत्व पूरी जानकारी

वैशाख अमावस्या कब है 2026? तिथि पूजा विधि अनुष्ठान और महत्व पूरी जानकारी
नवजोत कौर सिद्धू
On: अप्रैल 8, 2026 1:45 अपराह्न
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वैशाख मास की अमावस्या जिसे उत्तर भारत के कई हिस्सों में ‘सतुआई अमावस्या’ के नाम से जाना जाता है हिंदू धर्म में एक अत्यंत पवित्र और आध्यात्मिक तिथि मानी गई है। वर्ष 2026 में यह तिथि 17 अप्रैल, शुक्रवार को पड़ रही है।

​इस पर्व का संबंध न केवल दान-पुण्य से है बल्कि यह बदलते मौसम के साथ खान-पान में आने वाले बदलाव और पितरों की शांति के लिए भी विशेष महत्व रखता है।

वैशाख अमावस्या (सतुआई) 2026 –  तिथि एवं शुभ मुहूर्त

​हिंदू पंचांग के अनुसार वैशाख अमावस्या की तिथि का विवरण निम्नलिखित है

  • दिनांक – 17 अप्रैल 2026
  • दिन –  शुक्रवार
  • अमावस्या तिथि प्रारंभ – 17 अप्रैल 2026 को प्रातः काल से।
  • अमावस्या तिथि समाप्त –  17 अप्रैल 2026 की देर रात तक।

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विशेष – चूंकि अमावस्या तिथि 17 अप्रैल को सूर्योदय के समय व्याप्त रहेगी और पूरे दिन चलेगी, इसलिए व्रत, स्नान और दान के सभी कार्य इसी दिन संपन्न किए जाएंगे।

‘सतुआई अमावस्या’ का अर्थ और महत्व

अर्थ

‘सतुआई’ शब्द ‘सत्तू’ से बना है। वैशाख का महीना भीषण गर्मी की शुरुआत का प्रतीक है। इस समय चने, जौ और मकई से बना सत्तू शरीर को शीतलता प्रदान करता है। धार्मिक दृष्टि से इस दिन सत्तू का सेवन और दान करने के कारण इसे सतुआई अमावस्या कहा जाता है।

महत्व

  • पितृ दोष से मुक्ति –  यह दिन पितरों के तर्पण और श्राद्ध के लिए सर्वश्रेष्ठ माना जाता है।
  • ग्रह शांति – शनि देव का जन्म भी अमावस्या तिथि को माना जाता है, अतः शनि दोष निवारण के लिए यह उत्तम दिन है।
  • परोपकार का संदेश –  इस दिन जलपात्र (घड़ा), पंखा और सत्तू का दान करने से अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है।

​ सतुआई अमावस्या व्रत एवं पूजा विधि

​इस दिन भक्तजन अपनी मनोकामना की पूर्ति और परिवार की सुख-शांति के लिए व्रत रखते हैं।

​प्रातः काल की विधि

  • ब्रह्म मुहूर्त में स्नान – संभव हो तो गंगा या किसी पवित्र नदी में स्नान करें। यदि घर पर हैं तो पानी में थोड़ा गंगाजल मिलाकर स्नान करें।
  • सूर्य अर्घ्य – तांबे के लोटे में जल, लाल फूल और अक्षत डालकर भगवान सूर्य को अर्घ्य दें।
  • संकल्प –  हाथ में जल लेकर व्रत और दान का संकल्प लें।

मुख्य पूजा विधि

  • ​भगवान विष्णु और शिव जी की पूजा का इस दिन विशेष विधान है।
  • ​पीले फूल, फल और चंदन से श्री हरि का पूजन करें।
  • ​इस दिन सत्तू का भोग भगवान को अवश्य लगाएं।

पितरों के लिए विशेष अनुष्ठान (पितृ तर्पण)

​अमावस्या तिथि पितरों को समर्पित होती है। यदि आपकी कुंडली में पितृ दोष है या परिवार में अशांति रहती है, तो निम्नलिखित कार्य अवश्य करें

  • तर्पण – दक्षिण दिशा की ओर मुख करके काले तिल, जल और कुशा से पितरों को जल अर्पित करें।
  • पिंडदान – यदि संभव हो तो गया या किसी तीर्थ स्थान पर पिंडदान कराएं।
  • पंचबलि भोग – भोजन बनाने के बाद पांच अंश निकालें  गाय, कुत्ता, कौआ, देव और चींटी के लिए।
  • पीपल पूजा –  अमावस्या के दिन पीपल के वृक्ष में पितरों का वास माना जाता है। जल में दूध और तिल मिलाकर पीपल की जड़ में अर्पित करें और सरसों के तेल का दीपक जलाएं।

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सतुआई अमावस्या पर दान का विधान

​वैशाख की गर्मी को देखते हुए इस अमावस्या पर ‘शीतल वस्तुओं’ के दान पर जोर दिया गया है

  • मिट्टी का घड़ा – पानी से भरा हुआ नया घड़ा दान करना सबसे बड़ा पुण्य माना जाता है।
  • सत्तू –  सत्तू और गुड़ का दान करें।
  • छाता और पंखा –  धूप से बचने के लिए हाथ वाला पंखा या छाता दान करें।
  • जूते-चप्पल –  राहगीरों या जरूरतमंदों को जूते-चप्पल दान करने से राहु-केतु के दोष शांत होते हैं।

 इस दिन क्या न करें (वर्जनाएं)

  • तामसिक भोजन – लहसुन, प्याज, मांस या मदिरा का सेवन बिल्कुल न करें।
  • कलह-  घर में वाद-विवाद न करें, इससे पितर रुष्ट होते हैं।
  • नाखून और बाल –  अमावस्या के दिन बाल कटवाना या नाखून काटना वर्जित माना गया है।
  • सुनसान जगह – देर रात किसी सुनसान स्थान या श्मशान की ओर न जाएं, क्योंकि इस दिन नकारात्मक ऊर्जा सक्रिय रहती है।

विशेष उपाय – सुख-समृद्धि के लिए

  • धन लाभ के लिए –  शाम के समय घर के ईशान कोण (उत्तर-पूर्व) में गाय के घी का दीपक जलाएं। बत्ती में थोड़ी केसर या हल्दी डालें।
  • शनि दोष निवारण –  चूंकि यह शुक्रवार को है, अतः लक्ष्मी पूजन के साथ-साथ पीपल के नीचे तिल के तेल का दीपक जलाना शनि की साढ़ेसाती और ढैय्या में राहत दिलाता है।
  • आरोग्य के लिए –  इस दिन शिव चालीसा का पाठ करें और महामृत्युंजय मंत्र का जाप करें।

17 अप्रैल 2026 की वैशाख अमावस्या आपके जीवन में आध्यात्मिक शुद्धि लाने का एक महान अवसर है। सत्तू का सेवन और दान न केवल धार्मिक परंपरा है बल्कि यह आयुर्वेद की दृष्टि से भी स्वास्थ्यवर्धक है। पितरों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने और दान-पुण्य के माध्यम से अपने भाग्य को संवारने के लिए इस दिन का विधिपूर्वक पालन करें।

“ॐ पितृभ्य: नम:”

Dr Pankaj Sharma

fitness coach and writer mainly work on sports, fitness, Religious, foreign news, and technology

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