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सर्दी जाते समय क्यों आती है हल्की उदासी

सर्दी जाते समय क्यों आती है हल्की उदासी
नवजोत कौर सिद्धू
On: फ़रवरी 1, 2026 7:11 अपराह्न
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सर्दी का जाना केवल मौसम का बदलाव नहीं है, बल्कि यह एक मनोवैज्ञानिक और जैविक प्रक्रिया भी है। जब कड़कड़ाती ठंड खत्म होती है और वसंत की दस्तक होती है, तो कई लोग एक अजीब सी ‘हल्की उदासी’ या खालीपन महसूस करते हैं।

इसे अक्सर “Reverse Seasonal Affective Disorder” या सामान्य भाषा में “Spring Melancholy” कहा जाता है। आइए इस भावना के पीछे के वैज्ञानिक, मनोवैज्ञानिक और सांस्कृतिक कारणों को विस्तार से समझते हैं।

जैविक और हार्मोनल कारण (The Biological Shift)

हमारा शरीर बाहरी वातावरण के साथ तालमेल बिठाने के लिए रसायनों का उपयोग करता है। मौसम बदलने पर इनमें असंतुलन पैदा होता है|

  • मेलाटोनिन और सेरोटोनिन –  सर्दियों में अंधेरा जल्दी होने के कारण शरीर अधिक ‘मेलाटोनिन’ (नींद का हार्मोन) बनाता है। जैसे ही दिन बड़े होने लगते हैं, शरीर को इस बदलाव के साथ तालमेल बिठाने में समय लगता है, जिससे थकान और मूड खराब हो सकता है।
  • सर्कैडियन रिदम (Biological Clock) –  सूरज की रोशनी के समय में अचानक बदलाव हमारी आंतरिक घड़ी को अस्त-व्यस्त कर देता है। यह बिल्कुल ‘जेट लैग’ जैसा महसूस हो सकता है।

मनोवैज्ञानिक पहलू 

मनोवैज्ञानिक रूप से, सर्दी हमें ‘हाइबरनेशन’ या सुकून भरी सुस्ती की अनुमति देती है।

सुरक्षा का भाव –  रजाई, गर्म कपड़े और घर के अंदर रहने का सुकून एक तरह का ‘सुरक्षा कवच’ प्रदान करता है। सर्दी जाने का मतलब है उस सुरक्षा कवच का हटना और बाहर की भागदौड़ वाली दुनिया में वापस लौटना।

अधूरे संकल्प –  नए साल (जनवरी) के जोश में जो वादे खुद से किए जाते हैं, फरवरी-मार्च आते-आते उनके पूरा न होने का अहसास ‘विफलता की उदासी’ लेकर आता है।

सामाजिक दबाव और ‘फोमो’ 

वसंत और खिलती धूप को अक्सर ‘खुशी’ और ‘ऊर्जा’ का प्रतीक माना जाता है।

जब बाहर सब कुछ चमक रहा हो और लोग सक्रिय हो रहे हों, लेकिन आप अंदर से वैसा महसूस न कर रहे हों, तो यह अलगाव की भावना पैदा करता है। इसे ‘Contrast Effect’ कहते हैं बाहर की अत्यधिक चमक आपके अंदर के हल्के अंधेरे को और गहरा दिखाती है।

सांस्कृतिक और दार्शनिक जुड़ाव

साहित्य और कविताओं में सर्दी के जाने को अक्सर ‘विदाई’ से जोड़ा गया है।

ठहराव का अंत – सर्दी ठहराव का प्रतीक है, जबकि वसंत बदलाव का। इंसान स्वभाव से बदलाव से डरता है।

पुरानी यादें – धूप की हल्की तपिश अक्सर बचपन की उन दोपहरों की याद दिलाती है जो अब बीत चुकी हैं, जिससे ‘नॉस्टैल्जिया’ (Nostalgia) पैदा होता है।

इस उदासी से निपटने के सरल उपाय

उपायविवरण 
धूप का सेवनसुबह की 10-15 मिनट की धूप विटामिन-D और मूड को बेहतर करती है। 
नियमित व्यायामयह एंडोर्फिन (Happy Hormones) रिलीज करने में मदद करता है। 
स्वीकार्यता यह समझना जरूरी है कि मौसम की तरह मूड का बदलना भी प्राकृतिक है। 
हाइड्रेशनबढ़ते तापमान के साथ शरीर में पानी की कमी भी चिड़चिड़ापन पैदा करती है। 

सर्दी जाते समय होने वाली यह उदासी संकेत है कि आपका शरीर और मन प्रकृति के साथ गहरे स्तर पर जुड़े हुए हैं। यह कोई बीमारी नहीं, बल्कि एक ‘संक्रमण काल’ (Transition phase) है। जैसे ही वसंत की हरियाली स्थायी होगी, यह अहसास भी स्वतः ही स्फूर्ति में बदल जाएगा।

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Dr Pankaj Sharma

fitness coach and writer mainly work on sports, fitness, Religious, foreign news, and technology

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