वॉशिंगटन। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की मिलिट्री पॉलिसी एक बार फिर गंभीर सवालों के घेरे में है। इसकी वजह कोई बाहरी दुश्मन नहीं, बल्कि खुद व्हाइट हाउस से आ रहे उलझाने वाले और विरोधाभासी आदेश हैं। यूरोप में अमेरिकी सैनिकों की तैनाती और वापसी को लेकर जो असमंजस बना हुआ है, उससे अब खुद अमेरिकी रक्षा मंत्रालय (पेंटागन) के अधिकारी भी परेशान हो चुके हैं। रक्षा गलियारों से यह आवाजें उठने लगी हैं कि इन ढुलमुल फैसलों ने न केवल सेना की लॉन्ग-टर्म प्लानिंग को बिगाड़ दिया है, बल्कि टैक्सपेयर्स का करोड़ों डॉलर भी पानी में बहा दिया है। इस पूरी खींचतान का सबसे बुरा असर उन हजारों सैनिकों और उनके परिवारों पर पड़ रहा है, जो अचानक अनिश्चितता के भंवर में फंस गए हैं।ताजा जानकारी के मुताबिक, ट्रंप प्रशासन ने पहले यूरोप से एक बड़ी सैन्य टुकड़ी को वापस बुलाने का पूरा मन बना लिया था। जमीनी स्तर पर सैनिकों ने अपना बोरिया-बिस्तर समेटना भी शुरू कर दिया था। लेकिन तभी अचानक वॉशिंगटन से नया फरमान आ गया कि इन सैनिकों को पोलैंड या उसके आस-पास के देशों में भेजा जा सकता है। इस एक फैसले ने महीनों की कागजी और व्यावहारिक तैयारी पर पानी फेर दिया।
आखिरी मिनट के फैसलों से चरमराया लॉजिस्टिक्स
मिलिट्री एक्सपर्ट्स का साफ कहना है कि किसी बड़ी फौज का मूवमेंट कोई मजाक नहीं है, जिसे रातों-रात बदल दिया जाए। यह एक बेहद जटिल प्रक्रिया है। जब सेना चलती है, तो सिर्फ जवान नहीं जाते; उनके साथ भारी टैंक, बख्तरबंद गाड़ियां, मिसाइल डिफेंस सिस्टम, गोला-बारूद और रसद की एक बहुत बड़ी सप्लाई चेन होती है। इसके ट्रांसफर के लिए महीनों पहले से रूट और टाइमिंग तय की जाती है। ऐसे में जब आखिरी वक्त पर ऑर्डर पलटते हैं, तो पूरी व्यवस्था बिखर जाती है।मिसाल के तौर पर, पोलैंड के मिशन के लिए सेना के भारी-भरकम हथियार और साजो-सामान पहले ही भेजे जा चुके थे। अब जब उस योजना को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया है, तो उन करोड़ों डॉलर के उपकरणों को वापस सुरक्षित बेस पर लाना या कहीं और शिफ्ट करना सैन्य अफसरों के लिए जी का जंजाल बन गया है।
अमेरिकी जनता की जेब पर बेवजह की चपत
फौज की इस उठापटक में पैसा पानी की तरह बह रहा है। सैनिकों के मूवमेंट, जहाजों के ईंधन, अस्थाई ठिकानों की लीज और ट्रांसपोर्टेशन कॉन्ट्रैक्ट्स पर पहले ही भारी-भरकम फंड फूंका जा चुका था। अब प्लान बदलने से यह सारा पैसा एक झटके में डूब गया।फाइनेंशियल एक्सपर्ट्स बताते हैं कि जब किसी सैन्य ऑपरेशन को बीच में रोका या री-रूट किया जाता है, तो कॉन्ट्रैक्ट कैंसिलेशन फीस, स्टोरेज का एक्स्ट्रा चार्ज और दोबारा होने वाली री-पैकेजिंग का खर्च बजट को तबाह कर देता है। इस पूरे मिसमैनेजमेंट का सीधा बोझ अमेरिकी जनता को टैक्स के रूप में उठाना पड़ रहा है।
नाटो देशों में बढ़ा अविश्वास
ट्रंप के इन फैसलों की गूंज सिर्फ अमेरिका तक सीमित नहीं है। अटलांटिक पार नाटो के सहयोगी देश भी इस ढुलमुल रवैये से हैरान-परेशान हैं। यूरोप में अमेरिकी सेना की मौजूदगी को हमेशा से रूस के खिलाफ एक मजबूत ढाल माना जाता रहा है। ऐसे दौर में जब यूक्रेन युद्ध की वजह से पूरा यूरोप बेहद संवेदनशील समय से गुजर रहा है, अमेरिका की इस अनिश्चित नीति ने उसके दोस्तों के बीच ही भ्रम पैदा कर दिया है। जानकारों का मानना है कि इससे ग्लोबल स्टेज पर वॉशिंगटन की साख कमजोर हो रही है।
जर्मनी से सैनिकों की विदाई पर भी असमंजस
रिपोर्ट्स के अनुसार, जर्मनी में मौजूद अमेरिकी मिलिट्री बेस और वहां तैनात सैनिकों के भविष्य को लेकर भी व्हाइट हाउस लगातार कन्फ्यूजिंग सिग्नल दे रहा है। डिफेंस एक्सपर्ट्स ने चेतावनी दी है कि अगर जर्मनी से बड़े पैमाने पर सैनिकों को वापस अमेरिका शिफ्ट किया गया, तो उनके रहने, ट्रेनिंग और नए इंफ्रास्ट्रक्चर को खड़ा करने में ही कई अरब डॉलर का अतिरिक्त खर्च आएगा।जर्मनी में दशकों की मेहनत से जो वर्ल्ड-क्लास मिलिट्री बेस, अस्पताल और कॉलोनियां तैयार हुई हैं, उनका विकल्प अमेरिका के भीतर रातों-रात नहीं बन सकता। यह अदूरदर्शी फैसला सेना के बजट का गणित पूरी तरह बिगाड़ सकता है, जो पहले से ही वैश्विक चुनौतियों और आधुनिक हथियारों की खरीद के कारण भारी दबाव में है।
राष्ट्रीय सुरक्षा या राजनीतिक पैंतरेबाजी?
इस पूरे विवाद पर व्हाइट हाउस और ट्रंप समर्थकों का अपना तर्क है। उनका कहना है कि दुनिया के बदलते हालातों को देखते हुए सैन्य तैनाती की समय-समय पर समीक्षा करना जरूरी है, और वे सिर्फ अमेरिकी हितों को ध्यान में रखकर फैसले ले रहे हैं।इसके उलट, आलोचक और विपक्षी दल सीधे आरोप लगा रहे हैं कि सरकार की राष्ट्रीय सुरक्षा नीति में निरंतरता और स्पष्ट विजन की भारी कमी है। एक्सपर्ट्स का मानना है कि देश की सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर नीतियां स्थिर होनी चाहिए, क्योंकि बार-बार बदलते फैसले न केवल सेना का मनोबल तोड़ते हैं, बल्कि दुनिया भर में अमेरिका की रणनीतिक विश्वसनीयता पर भी गंभीर सवालिया निशान खड़े करते हैं।







