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दहकता लेबनान अडिग इजरायल- युद्धविराम के बीच ‘कयामत’ का मंजर

दहकता लेबनान अडिग इजरायल- युद्धविराम के बीच 'कयामत' का मंजर
नवजोत कौर सिद्धू
On: अप्रैल 9, 2026 3:38 अपराह्न
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पश्चिम एशिया के नक्शे पर इस समय सबसे ज्यादा धुआं लेबनान और इज़राइल की सीमाओं से उठ रहा है। दुनिया भले ही अमेरिका और ईरान के बीच हुए पाकिस्तान-प्रायोजित युद्धविराम की चर्चा कर रही हो, लेकिन लेबनान की सरजमीं पर यह ‘शांति’ एक क्रूर मजाक से ज्यादा कुछ नहीं लगती। लेबनान का दक्षिण हिस्सा और इजरायल का उत्तरी मोर्चा इस समय एक ऐसे भीषण युद्ध की गिरफ्त में है, जिसने दशकों पुराने जख्मों को फिर से हरा कर दिया है। जहाँ एक तरफ इजरायली लड़ाकू विमान लेबनानी रिहायशी इलाकों को खंडहर में तब्दील कर रहे हैं,वहीं दूसरी ओर हिजबुल्लाह के रॉकेटों ने इजरायल के भीतर भी खौफ का साया फैला रखा है।

इजरायल का रुख: ‘सुरक्षा से कोई समझौता नहीं’

इजरायल की सैन्य रणनीति इस बार पहले से कहीं अधिक आक्रामक और निर्णायक नजर आ रही है। तेल अवीव का स्पष्ट तर्क है कि वह तब तक पीछे नहीं हटेगा जब तक कि उसकी उत्तरी सीमा से हिजबुल्लाह का खतरा पूरी तरह समाप्त नहीं हो जाता। इजरायली रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका-ईरान के बीच हुआ युद्धविराम उनके लिए बाध्यकारी नहीं है, क्योंकि इसमें हिजबुल्लाह के निशस्त्रीकरण की कोई ठोस गारंटी नहीं दी गई है।

यही कारण है कि ‘सीजफायर’ के दावों के बीच भी इजरायली आर्टिलरी लेबनान के लितानी नदी के पार तक गोलाबारी कर रही है। इजरायल इस युद्ध को केवल आत्मरक्षा के तौर पर नहीं, बल्कि अपने अस्तित्व की लड़ाई के तौर पर पेश कर रहा है।

लेबनान की तबाही: ‘पेरिस ऑफ मिडिल ईस्ट’ अब खंडहर

कभी मध्य पूर्व का पेरिस कहा जाने वाला लेबनान आज मलबे के ढेर पर सिसक रहा है। इजरायली हवाई हमलों ने केवल सैन्य ठिकानों को ही नहीं, बल्कि लेबनान की नागरिक बुनियादी संरचना को भी तहस-नहस कर दिया है। बेरुत के दक्षिणी उपनगरों में गिरी मिसाइलें चीख-चीख कर कह रही हैं कि युद्ध की कीमत हमेशा आम इंसान को चुकानी पड़ती है। स्थानीय अस्पतालों की स्थिति भयावह है; बिजली की कमी और दवाओं के अभाव में घायल दम तोड़ रहे हैं। लेबनान सरकार की बेबसी का आलम यह है कि वह न तो अपनी सीमाओं की रक्षा कर पा रही है और न ही अपने बेघर हुए नागरिकों को छत मुहैया करा पा रही है।

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हिजबुल्लाह का पलटवार: युद्ध के नए समीकरण

इजरायल की ताकत के सामने हिजबुल्लाह ने भी ‘गोरिल्ला वॉरफेयर’ और उन्नत ड्रोन तकनीक का सहारा लिया है। लेबनान के पहाड़ों से दागे जा रहे रॉकेट इजरायल के ‘आयरन डोम’ (Iron Dome) को चुनौती दे रहे हैं। हिजबुल्लाह का दावा है कि उसके पास अभी भी हथियारों का ऐसा जखीरा है जो महीनों तक इजरायली शहरों को निशाना बना सकता है। अविश्वास की स्थिति यह है कि जब भी शांति की बात होती है, सीमा पार से एक नया रॉकेट हमला वार्ता की मेज को पलट देता है। यह केवल दो सेनाओं की जंग नहीं, बल्कि विचारधाराओं और क्षेत्रीय प्रभुत्व का वह टकराव है जिसमें लेबनान की आम जनता पिस रही है।

विस्थापन का महासंकट: घर से बेघर होती जिंदगी

लेबनान-इजरायल मोर्चे पर जारी इस संघर्ष ने एक दशक का सबसे बड़ा मानवीय संकट खड़ा कर दिया है। दक्षिणी लेबनान के गांवों से लाखों लोग उत्तर की ओर पलायन कर रहे हैं। सड़कों पर गाड़ियों का लंबा काफिला, सिर पर गृहस्थी का सामान लादे पैदल चलते बुजुर्ग और सहमे हुए बच्चे—ये तस्वीरें किसी भी पत्थर दिल को पिघला सकती हैं। दूसरी ओर, उत्तरी इजरायल के कस्बों से भी हजारों लोगों को विस्थापित किया गया है, जो अब होटलों या अस्थाई शिविरों में रहने को मजबूर हैं। युद्ध ने दोनों तरफ की आम जनता से उनकी शांति और सुकून छीन लिया है।

कूटनीति की विफलता: समझौतों में छुपा विरोधाभास

अंतरराष्ट्रीय कूटनीति इस मोर्चे पर पूरी तरह विफल साबित हुई है। संयुक्त राष्ट्र के प्रस्तावों और अंतरराष्ट्रीय अपीलों के बावजूद, युद्ध का मैदान छोटा होने के बजाय फैलता जा रहा है। अमेरिका और ईरान के बीच हुआ समझौता इस मोर्चे पर इसलिए बेअसर है क्योंकि इसमें स्थानीय ‘स्टेकहोल्डर्स’ (हिजबुल्लाह और इजरायली सरकार) की सीधी भागीदारी नहीं है। जब तक इजरायल और लेबनान के बीच की सीमा पर कोई स्थायी सैन्य समाधान या अंतरराष्ट्रीय निगरानी तंत्र विकसित नहीं होता, तब तक ‘युद्धविराम’ महज एक शब्द बनकर रह जाएगा।

वैश्विक अर्थव्यवस्था और लेबनानी मोर्चे का असर

इजरायल-लेबनान के बीच बढ़ती जंग ने भू-राजनीतिक अस्थिरता को चरम पर पहुंचा दिया है। यदि यह संघर्ष लेबनान की सीमाओं को पार कर सीरिया या जॉर्डन तक फैलता है, तो यह पूरे वैश्विक व्यापार मार्ग को प्रभावित करेगा। भूमध्य सागर में बढ़ते नौसैनिक जमावड़े ने मालवाहक जहाजों के लिए जोखिम बढ़ा दिया है। दुनिया भर के बाजार इस तनाव को भांप रहे हैं, जिससे न केवल तेल बल्कि अनाज और अन्य आवश्यक वस्तुओं की कीमतों में भी उछाल की आशंका है।

शांति की राह पर बिछी बारूदी सुरंगें

पश्चिम एशिया का भविष्य आज लेबनान की जलती हुई गलियों में तय हो रहा है। इजरायल और लेबनान के बीच का यह संघर्ष केवल दो देशों की सीमा का विवाद नहीं है, बल्कि यह अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की विफलता का प्रतीक है। केवल बयानबाजियों से शांति नहीं आएगी; इसके लिए ठोस धरातल पर कड़वे फैसले लेने होंगे। फिलहाल के हालात तो यही संकेत दे रहे हैं कि आने वाली रातें और भी खौफनाक होने वाली हैं, क्योंकि शांति के कबूतरों से ज्यादा यहाँ लड़ाकू विमानों की आवाज़ बुलंद है।

Swati Pandey

A versatile writer mainly works on trending news, daily updates from politics, business, crime, current affairs and entertainment.

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