भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन ISRO ने अपने महत्वाकांक्षी गगनयान मिशन Gaganyaan Mission की दिशा में एक और ऐतिहासिक मील का पत्थर पार कर लिया है। हाल ही में किए गए ड्रोग पैराशूट Drogue Parachutes के सफल परीक्षण ने भारत के पहले मानवयुक्त अंतरिक्ष मिशन की सुरक्षा और तकनीकी मजबूती को सिद्ध कर दिया है।

गगनयान भारत का पहला मानव अंतरिक्ष उड़ान कार्यक्रम है। इसका उद्देश्य तीन अंतरिक्ष यात्रियों गगननॉट्स के एक दल को 400 किलोमीटर की निचली पृथ्वी कक्षा LEO में भेजना और उन्हें सुरक्षित रूप से वापस धरती पर लाना है। इस मिशन की सफलता भारत को अमेरिका रूस और चीन के बाद चौथा ऐसा देश बना देगी जिसने स्वतंत्र रूप से मानव को अंतरिक्ष में भेजा है।
किसी भी अंतरिक्ष मिशन का सबसे चुनौतीपूर्ण हिस्सा री-एंट्री Re-entry यानी वायुमंडल में वापसी और सुरक्षित लैंडिंग होता है। यहीं पर पैराशूट प्रणाली की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है।
ड्रोग पैराशूट क्या हैं
ड्रोग पैराशूट आकार में मुख्य पैराशूट से छोटे होते हैं लेकिन इनका काम बेहद कठिन होता है। जब गगनयान का क्रू मॉड्यूल Crew Module अंतरिक्ष से लौटते समय पृथ्वी के वायुमंडल में प्रवेश करता है तो इसकी गति हजारों किलोमीटर प्रति घंटा होती है।
ड्रोग पैराशूट के मुख्य कार्य
गति कम करना यह अत्यधिक उच्च वेग से गिर रहे मॉड्यूल की गति को इतना कम कर देता है कि मुख्य पैराशूट सुरक्षित रूप से खुल सकें। स्थिरता प्रदान करना वायुमंडलीय घर्षण और हवा के दबाव के कारण मॉड्यूल हवा में डगमगा सकता है। ड्रोग पैराशूट इसे एक निश्चित दिशा में स्थिर Stabilize रखने में मदद करते हैं। क्रमबद्ध तैनाती यह एक बहु-चरणीय पैराशूट प्रणाली का हिस्सा हैं जो यह सुनिश्चित करती है कि अंतरिक्ष यात्री बिना किसी झटके के सुरक्षित रूप से समुद्र में लैंड Splashdown करें।
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सफल परीक्षण का विवरण
ISRO ने यह परीक्षण तिरुवनंतपुरम स्थित विक्रम साराभाई अंतरिक्ष केंद्र VSSC के माध्यम से चंडीगढ़ के टर्मिनल बैलिस्टिक अनुसंधान प्रयोगशाला TBRL में रेल ट्रैक रॉकेट स्लेज RTRS सुविधा पर आयोजित किया।
परीक्षण की प्रक्रिया
मोर्टार-आधारित तैनाती ड्रोग पैराशूट को तैनात करने के लिए पायरो-आधारित मोर्टार डिवाइस का उपयोग किया गया। यह एक छोटा विस्फोट होता है जो पैराशूट को मॉड्यूल से बाहर फेंकता है। सिमुलेशन परीक्षण के दौरान उन परिस्थितियों को दोहराया गया जो क्रू मॉड्यूल को वास्तविक री-एंट्री के दौरान झेलनी पड़ेंगी।
विभिन्न कोण
इसे विभिन्न कोणों और हवा के दबाव की स्थितियों में परखा गया ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि किसी भी आपात स्थिति में यह विफल न हो।
गगनयान की पैराशूट प्रणाली की जटिलता
गगनयान मिशन में केवल एक पैराशूट नहीं बल्कि 10 पैराशूटों का एक जटिल नेटवर्क काम करता है।
- 2 एपेक्स कवर सेपरेशन पैराशूट ये सबसे पहले खुलते हैं जो मॉड्यूल के ऊपरी हिस्से को हटाते हैं।
- 2 ड्रोग पैराशूट ये मॉड्यूल की गति को कम और स्थिर करते हैं।
- 3 पायलट पैराशूट ये मुख्य पैराशूट को खींचकर बाहर निकालते हैं।
- 3 मुख्य पैराशूट ये विशाल पैराशूट अंत में मॉड्यूल को सुरक्षित गति लगभग 7-8 मीटर प्रति सेकंड पर लाते हैं।
ड्रोग पैराशूट का तकनीकी महत्व
ड्रोग पैराशूट को विशेष कोनिकल रिबन Conical Ribbon डिजाइन में बनाया गया है। इसमें छोटे-छोटे छेद या गैप होते हैं जो हवा को पार होने देते हैं जिससे पैराशूट फटने से बच जाता है और अत्यधिक तनाव को सहन कर सकता है। ड्रोग पैराशूट आकार में छोटे होते हैं लेकिन बहुत मजबूत सामग्री से बने होते हैं।
गगनयान मिशन की वर्तमान प्रगति
इसरो ने गगनयान के लिए कई महत्वपूर्ण मील के पत्थर पार कर लिए हैं| LVM3 रॉकेट का मानवीकरण इसरो का सबसे भारी रॉकेट LVM3 अब मानव मिशन के लिए तैयार किया जा चुका है। क्रू एस्केप सिस्टम CES किसी भी आपात स्थिति में अंतरिक्ष यात्रियों को रॉकेट से सुरक्षित दूर ले जाने वाली प्रणाली का सफल परीक्षण। व्योममित्र Vyommitra एक महिला रोबोट जो वास्तविक मानव मिशन से पहले अंतरिक्ष में जाकर वहां के हालातों का जायजा लेगी।
सुरक्षा मानक और चुनौतियां
अंतरिक्ष मिशन में सबसे बड़ी चुनौती वापसी Re-entry होती है। जब मॉड्यूल पृथ्वी के वातावरण में आता है तो तापमान 2000°C तक पहुँच सकता है। थर्मल शील्ड मॉड्यूल की बाहरी सतह को जलने से बचाने के लिए विशेष हीट शील्ड लगाई गई है। रिडंडेंसी Redundancy यदि एक पैराशूट विफल हो जाता है तो दूसरा बैकअप के रूप में काम करता है। सुरक्षा के लिए इसरो ने फेल-सेफ Fail-Safe तकनीक का इस्तेमाल किया है।
भविष्य की योजना – मिशन का रोडमैप
मानवरहित मिशन Unmanned Missions पहले दो या तीन मिशन बिना इंसानों के होंगे ताकि सभी प्रणालियों की जांच की जा सके। मानव मिशन Manned Mission 2025 के अंत या 2026 तक भारत अपने अंतरिक्ष यात्रियों को भेजने की योजना बना रहा है।






